मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव: बहरीन पर हमले से टूटी शांति वार्ता और युद्ध की बढ़ती आशंका मध्य पूर्व एक बार फिर वैश्विक राजनीति और सुरक्षा चिंताओं का केंद्र बन गया है। पिछले कुछ महीनों में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। जहां एक ओर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ताओं और संभावित समझौते की चर्चाएं चल रही थीं, वहीं दूसरी ओर सैन्य मोर्चे पर घटनाक्रम लगातार अधिक खतरनाक होते जा रहे थे। हाल की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा हो चुका है कि शांति की उम्मीदें कमजोर पड़ती जा रही हैं। तनाव की शुरुआत तब और तेज हुई जब अमेरिका ने ईरान के रणनीतिक महत्व वाले कई ठिकानों पर दबाव बढ़ाना शुरू किया। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के तटीय क्षेत्रों, रडार नेटवर्क और ड्रोन संचालन केंद्रों को निशाना बनाने की रणनीति अपनाई। खर्ग आइलैंड, बंदर अब्बास, केश्म और सिरिक जैसे क्षेत्रों का नाम विशेष रूप से सामने आया। खर्ग आइलैंड ईरान के तेल निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है, इसलिए वहां किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई को तेहरान ने अपनी आर्थिक सुरक्षा पर सीधा हमला माना। इसी दौरान अमेरिकी नेतृत्व की ओर से संकेत दिए गए कि ईरान के साथ एक संभावित समझौता तैयार किया जा रहा है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और समझौता लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुका है। ट्रंप के अनुसार केवल औपचारिक हस्ताक्षर बाकी थे। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आशा जगाई कि वर्षों से चले आ रहे तनाव में कमी आ सकती है। लेकिन यह आशावाद अधिक समय तक नहीं टिक सका। कुछ ही दिनों बाद ट्रंप के सुर पूरी तरह बदल गए। उन्होंने ईरान पर वार्ता के दौरान बेईमानी करने का आरोप लगाया और कहा कि तेहरान भरोसेमंद नहीं है। दूसरी ओर ईरान ने भी अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए कहा कि किसी अंतिम समझौते पर सहमति नहीं बनी थी। इसके साथ ही ईरान ने अमेरिका के सामने अपनी 14 प्रमुख मांगें रख दीं, जिन्होंने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया। ईरान की पहली मांग तत्काल और स्थायी युद्धविराम की थी। इसके अलावा उसने अपनी संप्रभुता के सम्मान, अमेरिकी हस्तक्षेप की समाप्ति, क्षेत्रीय नौसैनिक नाकाबंदी हटाने और पड़ोसी क्षेत्रों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी जैसी शर्तें रखीं। सबसे महत्वपूर्ण मांगों में होरमुज जलडमरूमध्य के संचालन पर ईरानी नियंत्रण की बहाली, तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटाना तथा ईरान की जब्त संपत्तियों को वापस करना शामिल था। इन मांगों में सबसे अधिक चर्चा उस प्रस्ताव की हुई जिसमें ईरान ने पुनर्निर्माण और क्षतिपूर्ति के लिए लगभग 300 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता की मांग की। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उसके मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों, जैसे हिजबुल्लाह और हूती समूहों, को किसी भी वार्ता का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा। अमेरिका के लिए इन शर्तों को स्वीकार करना बेहद कठिन माना गया। जब वार्ताओं का माहौल पहले से ही तनावपूर्ण था, तभी समुद्री सुरक्षा को लेकर नए विवाद सामने आने लगे। होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कई जहाजों पर हमलों और ड्रोन गतिविधियों के आरोप लगाए गए। अमेरिका ने ईरान पर क्षेत्रीय समुद्री मार्गों को अस्थिर करने का आरोप लगाया, जबकि ईरान ने इन आरोपों को निराधार बताया। इस बीच वैश्विक तेल बाजार में भी चिंता बढ़ने लगी क्योंकि दुनिया के एक बड़े हिस्से का ऊर्जा व्यापार इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। कूटनीतिक गतिरोध के समानांतर सैन्य गतिविधियां भी तेज हो रही थीं। ईरान ने बार-बार चेतावनी दी कि यदि उसके रणनीतिक हितों या परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाया गया तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर किसी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ईरान ने बहरीन में स्थित एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य रडार स्टेशन पर हमला करने का दावा किया। यह हमला बहरीन के सबसे ऊंचे स्थान जबल अद-दुखान, जिसे “धुएं वाला पहाड़” भी कहा जाता है, पर स्थित अमेरिकी एआर-327 प्रारंभिक चेतावनी रडार के विरुद्ध बताया गया। यह रडार समुद्र तल से लगभग 134 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित है और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी निगरानी नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। एआर-327 रडार को ब्रिटिश रक्षा कंपनी BAE Systems द्वारा विकसित किया गया है। यह एक लंबी दूरी की त्रि-आयामी निगरानी प्रणाली है, जिसकी क्षमता लगभग 450 से 470 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसका उपयोग हवाई गतिविधियों की निगरानी, मिसाइलों की प्रारंभिक पहचान और सामरिक चेतावनी प्रदान करने के लिए किया जाता है। विशेष रूप से यह होरमुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री मार्गों पर नजर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईरान द्वारा जारी किए गए दावों के अनुसार, हमले के बाद रडार परिसर से धुएं के बड़े गुबार उठते देखे गए। विभिन्न ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) विश्लेषकों ने भी उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरों और वीडियो की जांच की। इन तस्वीरों में रडार परिसर के आसपास आग और धुएं के संकेत दिखाई देने की बात कही गई। हालांकि अमेरिका और बहरीन की ओर से तत्काल किसी बड़े नुकसान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई, लेकिन तस्वीरों ने इस घटना को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि हमले में बैलिस्टिक मिसाइलों या शाहिद-136 जैसे आत्मघाती ड्रोन का उपयोग किया गया हो सकता है। यदि ऐसा हुआ हो, तो यह केवल एक सैन्य प्रतिष्ठान पर हमला नहीं बल्कि अमेरिकी निगरानी और मिसाइल रक्षा नेटवर्क को चुनौती देने का प्रयास माना जाएगा। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, एआर-327 जैसे रडार सिस्टम किसी भी क्षेत्रीय रक्षा ढांचे की आंख और कान होते हैं। ऐसे में इनके निष्क्रिय होने से प्रारंभिक चेतावनी क्षमता प्रभावित हो सकती है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसकी कार्रवाई केवल एक रडार स्टेशन तक सीमित नहीं थी। उसने क्षेत्र में मौजूद अन्य अमेरिकी ठिकानों, जिनमें शेख ईसा एयरबेस और अमेरिकी पांचवीं फ्लीट से जुड़े प्रतिष्ठान शामिल बताए गए, पर भी कार्रवाई करने का दावा किया। ईरान ने इसे अमेरिका की पूर्व सैन्य कार्रवाइयों के जवाब में किया गया “रिटेलिएटरी स्ट्राइक” अर्थात जवाबी हमला बताया। अमेरिकी पांचवीं फ्लीट खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती है। इसका मुख्यालय बहरीन में स्थित है और इसका दायित्व फारस की खाड़ी, अरब सागर, लाल सागर तथा आसपास के समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा बनाए रखना है। एआर-327 रडार इसी व्यापक सुरक्षा नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसलिए इस पर किसी भी प्रकार का सफल हमला सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान राजनीतिक बयानबाजी भी लगातार तीखी होती गई। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान बातचीत की मेज से पीछे हट रहा है, जबकि ईरान ने कहा कि अमेरिका उसकी वैध सुरक्षा चिंताओं को समझने के बजाय दबाव की नीति अपना रहा है। दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप इतने बढ़ गए कि किसी भी संभावित समझौते की संभावना कमजोर दिखाई देने लगी। आज स्थिति यह है कि मध्य पूर्व एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। एक ओर कूटनीतिक वार्ताएं लगभग ठप पड़ चुकी हैं, दूसरी ओर सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं। होरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा, तेल आपूर्ति, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सैन्य ठिकाने और आर्थिक प्रतिबंध जैसे मुद्दे दोनों देशों के बीच गहरे विवाद का कारण बने हुए हैं। बहरीन के जबल अद-दुखान पर स्थित अमेरिकी रडार स्टेशन पर कथित हमला और उसके बाद बढ़ी राजनीतिक तथा सैन्य बयानबाजी यह दर्शाती है कि ईरान-अमेरिका संबंध एक अत्यंत खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुके हैं। जहां ईरान अपनी रणनीतिक क्षमता और जवाबी कार्रवाई की शक्ति प्रदर्शित करना चाहता है, वहीं अमेरिका क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति और प्रभाव बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों पक्ष संवाद का रास्ता चुनते हैं या फिर यह टकराव पूरे क्षेत्र को एक व्यापक संघर्ष की ओर ले जाता है। वर्तमान परिस्थितियों में मध्य पूर्व की स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा दोनों ही गंभीर परीक्षा के दौर से गुजर रही हैं। युद्ध विराम को लेकर ईरान की 14 शर्ते तत्काल और स्थायी युद्धविराम – लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम लागू किया जाए। ईरान की संप्रभुता का सम्मान – अमेरिका लिखित रूप में आश्वासन दे कि वह ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त की जाए – अरब सागर और आसपास के क्षेत्रों में लगी नाकाबंदी 30 दिनों के भीतर हटाई जाए। अमेरिकी सैनिकों की वापसी – ईरान के पड़ोसी क्षेत्रों से अमेरिकी सैन्य बलों को हटाया जाए। होरमुज जलडमरूमध्य को खोला जाए – ईरानी प्रबंधन के तहत 30 दिनों के भीतर सामान्य नौवहन बहाल किया जाए। तेल एवं पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं – ईरान को अपने निर्यात राजस्व तक पूर्ण पहुंच मिले। 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज – कथित युद्ध एवं प्रतिबंधों से हुए नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक सहायता दी जाए। परमाणु मुद्दों पर 60 दिन की वार्ता – अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए निर्धारित समयसीमा तय की जाए। परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के प्रति प्रतिबद्धता की मान्यता – ईरान के इस दावे को स्वीकार किया जाए कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। वार्ता के दौरान यथास्थिति बनाए रखी जाए – अमेरिका नई सैन्य तैनाती या नए प्रतिबंध न लगाए। जप्त ईरानी संपत्तियों की रिहाई – लगभग 24 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियां वापस की जाएं। स्वतंत्र निगरानी तंत्र का गठन – समझौते के पालन की निगरानी के लिए एक निष्पक्ष व्यवस्था बनाई जाए। अंतिम वार्ता से पहले कुछ शर्तों का पालन – संपत्तियों की आंशिक वापसी और प्रतिबंधों में ढील के बाद ही अंतिम वार्ता शुरू हो। मिसाइल कार्यक्रम और सहयोगी संगठनों को वार्ता से बाहर रखा जाए – ईरान के मिसाइल कार्यक्रम तथा उसके क्षेत्रीय सहयोगी समूहों को बातचीत का विषय न बनाया जाए। Kanthak Suryatal Post Views: 691 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation महाराष्ट्र सरकारचा मोठा निर्णय : पेट्रोल-डिझेलच्या किरकोळ खरेदीवर तात्पुरती मर्यादा जागतिक बालकामगार विरोधी दिनानिमित्त जनजागृती रॅली ; दोन 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