वर्तमान में पश्चिम बंगाल एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसे लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन और जंगल राज का उदय कहा जा सकता है। स्रोतों के अनुसार, बंगाल में हो रही राजनीतिक हिंसा ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हैं। राज्य में विपक्ष के नेताओं को न केवल निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि उनके घरों को जलाने, लूटने और व्यवस्थित तरीके से उन्हें शारीरिक नुकसान पहुँचाने की खबरें सामने आ रही हैं। यह स्थिति केवल छिटपुट झड़पों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राज्य की मशीनरी और पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व पर जानलेवा हमले बंगाल की राजनीति में हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन वर्तमान स्थिति में जिस तरह से शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया जा रहा है, वह अभूतपूर्व है। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी पर एक सुनियोजित साजिश के तहत जानलेवा हमला किया गया। इस हमले में भाजपा के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के शामिल होने के आरोप लगे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस हमले के ठीक 12 घंटे बाद, एक और वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी पर पुलिस की मौजूदगी में हमला किया गया। वीडियो साक्ष्यों के आधार पर यह देखा गया है कि जब कल्याण बनर्जी प्रदर्शन कर रहे थे, तब वहां भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस मौजूद थी, फिर भी उन पर पथराव हुआ और उनके सिर को निशाना बनाया गया। विश्लेषकों का कहना है कि यह हिंसा केवल स्थानीय स्तर की झड़प नहीं है, बल्कि उन सांसदों को चुप कराने की एक विस्तृत योजना का हिस्सा है जो संसद में मुखर होकर बोलते हैं।
पुलिस की संदिग्ध भूमिका और पक्षपात स्रोतों के अनुसार, पश्चिम बंगाल की पुलिस अब एक निष्पक्ष जांच एजेंसी के बजाय सरकार की एक शाखा या राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के रूप में कार्य करती दिख रही है। अभिषेक बनर्जी पर हमले के मामले में, पुलिस ने उन असली हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया जो वीडियो में साफ तौर पर पथराव करते दिख रहे थे, बल्कि खानापूर्ति के लिए कुछ स्थानीय लोगों या टीएमसी समर्थकों को ही गिरफ्तार कर लिया। कपिल सिब्बल जैसे कानूनी विशेषज्ञों ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है कि पुलिस असली अपराधियों को संरक्षण दे रही है और यह पूरी हिंसा प्रायोजित प्रतीत होती है। यह आरोप लगाया गया है कि पुलिस को ऊपर से निर्देश हैं कि वे हिंसा के दौरान मूकदर्शक बने रहें या केवल एक पक्ष के खिलाफ कार्रवाई करें।
मानवाधिकारों का उल्लंघन: नग्न करके घुमाने की घटनाएं बंगाल से आने वाली सबसे विचलित करने वाली खबरों में से एक टीएमसी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के साथ किया जा रहा अमानवीय व्यवहार है। वरिष्ठ पत्रकारों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, उत्तर 24 परगना और हावड़ा जैसे जिलों में टीएमसी से जुड़े लोगों को नग्न करके या केवल अंतःवस्त्रों (कच्छे) में सार्वजनिक रूप से घुमाया गया है। यह कृत्य न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि मानवाधिकारों का भी गंभीर हनन है। पत्रकारों का कहना है कि पुलिस जानबूझकर ऐसी हरकतों को बढ़ावा दे रही है ताकि समाज में भय का माहौल पैदा किया जा सके और विपक्ष के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ा जा सके।
बुलडोजर न्याय का प्रवेश उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अब बंगाल में भी बुलडोजर राजनीति का प्रवेश हो चुका है। शुभेंदु अधिकारी की सरकार में बुलडोजर का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया जा रहा है जो या तो अल्पसंख्यक हैं या विपक्ष से जुड़े हैं। सूत्रों के मुताबिक, बिना किसी पूर्व नोटिस या कानूनी सुनवाई के मुस्लिम बस्तियों और रेलवे स्टेशनों के पास रहने वाले छोटे दुकानदारों (हॉकर्स) की संपत्तियों को गिराया जा रहा है। एक उदाहरण में बताया गया है कि दमदम जंक्शन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में, जब हॉकर्स के साथ बातचीत चल रही थी, तभी रात के अंधेरे में बुलडोजर लाकर उनकी दुकानों को तहस-नहस कर दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया कानून के शासन के बजाय ‘भय के साम्राज्य’ की स्थापना की ओर इशारा करती है।
अल्पसंख्यक समुदाय में व्याप्त भय बंगाल की लगभग 30% मुस्लिम आबादी वर्तमान में गहरे डर के साए में जी रही है। स्रोतों के अनुसार, दशकों से चली आ रही परंपराओं, जैसे ईद-उल-अजहा के दौरान दी जाने वाली कुर्बानी, पर इस बार कड़े प्रतिबंध और नोटिस देखे गए। डर का आलम यह था कि करोड़ों रुपये का पशु बाजार और त्योहारी व्यापार ठप हो गया क्योंकि लोग घरों से बाहर निकलने या उत्सव मनाने में असुरक्षित महसूस कर रहे थे मुस्लिम समुदाय के बुद्धिजीवियों और शिक्षकों का कहना है कि वे विरोध करने से भी डर रहे हैं क्योंकि उन्हें तत्काल गिरफ्तारी या उनके घरों पर बुलडोजर चलने का भय है। यह स्थिति सामाजिक ताने-बाने के टूटने और एक विशेष समुदाय को हाशिए पर धकेलने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है।
मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया भी इस संकट से अछूता नहीं है。 स्रोतों के अनुसार, बंगाल के कई बड़े अखबारों और टीवी चैनलों ने अपनी संपादकीय नीति बदल ली है और अब वे सरकार के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। पत्रकारों के बीच इतना भय है कि वे ज़मीनी हकीकत बताने के लिए लाइव प्रोग्राम में आने से भी कतरा रहे हैं। जो पत्रकार पहले सत्ता के प्रति आलोचनात्मक थे, वे अब या तो चुप हैं या पाला बदलकर नई सरकार को खुश करने में लगे हैं。 ऐसे में जनता तक सही जानकारी पहुँचना और भी कठिन हो गया है।
डबल इंजन सरकार और संवैधानिक संकट अभिषेक कुमार जैसे विश्लेषकों का तर्क है कि ‘डबल इंजन’ की सरकार होने के कारण अब राज्य में ‘चेक एंड बैलेंस’ (नियंत्रण और संतुलन) की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो गई है। पहले यदि राज्य सरकार कुछ गलत करती थी, तो केंद्र सरकार या केंद्रीय एजेंसियां हस्तक्षेप करती थीं, लेकिन अब केंद्र और राज्य में एक ही दल की सत्ता होने के कारण न्याय के सारे दरवाजे बंद होते दिख रहे हैं। इस स्थिति की तुलना 2002 के गुजरात से की गई है, जहाँ शासन और प्रशासन के बीच की सीमाएँ धुंधली हो गई थीं और हिंसा को संस्थागत रूप दे दिया गया था। बंगाल में भी अब पुलिस, प्रशासन और राजनीतिक कार्डर एक ही इकाई के रूप में कार्य करते नजर आ रहे हैं, जो लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है।
निष्कर्ष पश्चिम बंगाल वर्तमान में एक गंभीर मानवीय और राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है。 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीतने के बाद बदले की राजनीति को खत्म करने और बदलाव की राजनीति शुरू करने का आह्वान किया था, लेकिन धरातल पर इसके विपरीत दृश्य दिखाई दे रहे हैं। यदि राजनीतिक प्रतिशोध, बुलडोजर न्याय और मानवाधिकारों का उल्लंघन इसी तरह जारी रहा, तो बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं को फिर से जीवित करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। समाज में जो नफरत और डर का माहौल पैदा किया गया है, उसे ठीक करने में दशकों का समय लग सकता है。 यह समय केवल सत्ता के परिवर्तन का नहीं, बल्कि बंगाल की लोकतांत्रिक आत्मा को बचाने के संघर्ष का है।
