यदि हाँ, तो बधाई हो! आप उन करोड़ों भारतीयों में से एक हैं जिन्हें मास्टरस्ट्रोक नामक लाइलाज बीमारी का पुराना अनुभव है। हमारे देश में ८ बजे का समय वह जादुई क्षण होता है जब एक फेवरेट आदमी टीवी पर प्रकट होता है और मित्रों कहते ही आपकी जेब में रखा कागज का टुकड़ा वास्तव में कागज ही रह जाता है। आजकल सोशल मीडिया की गलियों में फिर से एक अफवाह उड़ रही हैनोटबंदी २.०। हालांकि रिजर्व बैंक ने हाथ जोड़कर कहा है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला, लेकिन क्या पिछली बार सरकार ने मुहूर्त पूछकर बताया था?
काले धन की वह ऐतिहासिक सफलता
आपको याद ही होगा कि २०१६ में जब पहली बार दिव्य चक्षु खुले थे, तब बताया गया था कि नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, काला धन जमीन फाड़कर बाहर आ जाएगा और नकली नोटों का नामोनिशान मिट जाएगा। परिणाम क्या रहा? आंकड़ों के अनुसार, १५ लाख ४४ हजार करोड़ की मुद्रा में से १५ लाख ३१ हजार करोड़ (९९.३%) बैंकों में वापस आ गए। यानी काला धन इतना संस्कारी निकला कि उसने खुद को सफेद कपड़ों में बदलकर बैंक की लाइन में खड़ा कर लिया। सरकार काला धन पकड़ने में इतनी सफल रही कि अब समझ नहीं आ रहा कि पैसा काला था या सिस्टम ही थोड़ा धुंधला था। रही बात आतंकवाद की, तो पहलगाम की घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि आतंकवाद को शायद पता ही नहीं चला कि उसकी कमर टूट चुकी है।
चिप वाले नोट और विश्वगुरु की तकनीक
उस समय की यादें आज भी ताजा हैं जब हमारे देश की कुछ महान आत्माओं और टीवी एंकरों ने गुलाबी नोटों में ‘नैनो-टेक्नोलॉजी जीपीएस चिप’ ढूंढ निकाली थी। बताया गया था कि आप नोट को पाताल में भी गाड़ देंगे, तो मोदी जी ऊपर से ही सैटेलाइट के जरिए देख लेंगे कि आपके पास कितना माल है। ये नोट इतने क्रांतिकारी थे कि पूरी दुनिया भारत को विश्वगुरु मानने के लिए पलकें बिछाए बैठी थी। लेकिन १० साल बाद पता चला कि ये मास्टरस्ट्रोक वाले नोट तो बहुत ही सस्ती क्वालिटी के निकले, जो १० साल भी ढंग से नहीं चल पाए और अब इन्हें बदलने की नौबत आ गई है। रंग बदलने वाली स्याही (कलर शिफ्टिंग इंक), सुरक्षा धागा और माइक्रो-लैटरिंग जैसे सुरक्षा फीचर्स का ऐसा प्रचार हुआ था कि जैसे अब किसी का बाप भी नकली नोट नहीं बना पाएगा।
नकली नोटों का विकास
लेकिन साहब, नकली नोट छापने वाले भी तो आत्मनिर्भर भारत के नागरिक निकले (या शायद सीमा पार वाले)। आंकड़ों की माने तो २०२३ में ९१,१०५ नकली नोट पकड़े गए और २०२६ तक यह संख्या बढ़कर १,४१,००० के पार पहुंच गई है। २०१६ में जब १००० के नोट बंद हुए थे, तब जितने नकली नोट (१,४३,९९९) पकड़े गए थे, आज ५०० के नकली नोटों की संख्या लगभग उतनी ही (१,४४,१९७) पहुंच गई है। यानी हम घूम-फिरकर फिर उसी चौराहे पर खड़े हैं जहां १० साल पहले खड़े थे। आज भी हमारी अर्थव्यवस्था में ५०० के नोटों का वही दबदबा है जो २०१६ में १००० और ५०० के नोटों का था,कुल मुद्रा मूल्य का ८६%। जबकि हम अब डिजिटल इंडिया के युग में हैं और ऑनलाइन लेनदेन ज्यादा कर रहे हैं, फिर भी ५०० के नोटों की बाढ़ आई हुई है। क्या यह विकास नहीं है कि नकली नोट छापने वालों ने भी सरकारी आंकड़ों के साथ कदम से कदम मिला लिया है?
प्लास्टिक की मुद्रा और नया सपना
अब खबर आ रही है कि सरकार लेमिनेटेड या प्लास्टिक के नोट लाने पर विचार कर रही है। शायद इसलिए कि कागज वाले क्रांतिकारी नोट नकली नोटों की रेस में फेल हो गए हैं। तर्क यह दिया जा रहा है कि प्लास्टिक के नोट ज्यादा सुरक्षित होंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या अगली बार भी ८ बजे ही बताया जाएगा कि आज रात से ये कागजी नोट रद्दी हो जाएंगे? पिछली बार पाकिस्तान के दांत खट्टे करने का दावा किया गया था, लेकिन पाकिस्तान आज भी नकली नोट छापकर भेज रहा है और हम आज भी वही पुराने डर के साथ जी रहे हैं। सरकार के लक्षण देखकर पुराने जख्मों में दर्द होने लगता है। हालांकि हम अंतर्यामी नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से ५०० के नोटों का बाजार में सैलाब आया है और नकली नोटों की संख्या बढ़ी है, उसे देखकर लगता है कि सरकार फिर से कोई धमाका कर सकती है।
सावधानी ही बचाव है
नोटबंदी १.० ने हमें सिखाया कि बैंक की लाइन में लगना एक राष्ट्रीय खेल है। अब अगर नोटबंदी २.० आती है, तो कम से कम हमारे पास अनुभव तो होगा ही। वह काला धन जो पिछली बार सफेद हो गया था, उसे फिर से किसी नए रंग में बदलने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। आखिर विश्वगुरु बनने की राह में थोड़े-बहुत मास्टरस्ट्रोक तो सहने ही पड़ेंगे, चाहे उससे आतंकवाद खत्म हो या न हो, नकली नोटों की बाढ़ रुके या न रुके। इसलिए मित्रों, सावधान रहें, सुरक्षित रहें और ८ बजे के समाचारों से थोड़ा बचकर रहें, क्योंकि दुर्घटना से देर भली!
