डिप्लोमैटिक डिफ़रेंस: जब महाशक्ति ने बीजिंग के सोफे पर आत्मसमर्पण किया दुनिया के सबसे बड़े डील मेकर और अमेरिका फर्स्ट के स्वघोषित ध्वजवाहक डोनाल्ड ट्रंप जब बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में कदम रख रहे थे, तो दुनिया को लगा था कि शायद कोई नई इबारत लिखी जाएगी। लेकिन, जब तस्वीरें और खबरें सामने आईं, तो लगा कि इबारत तो लिखी गई, मगर वह जीत की नहीं, बल्कि एक अजीबोगरीब कूटनीतिक सरेंडर की कहानी थी। स्रोत बताते हैं कि ट्रंप साहब ने चीन से निकलते ही जो पहला काम किया, वह था अपने फोन और लैपटॉप को कचरे के डिब्बे में फेंकना। यह एक ऐसी विडंबना है जहाँ एक सुपरपावर के प्रतिनिधि अपनी ही तकनीक और सुरक्षा पर इतना अविश्वास करते हैं कि उन्हें अपने उपकरणों को नष्ट करना पड़ता है। बॉडी लैंग्वेज: झुके हुए कंधे और बॉस की मुस्कान एक पुरानी कहावत है, तस्वीरें हजार शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। बीजिंग की बैठकों के दौरान ट्रंप की बॉडी लैंग्वेज किसी शक्तिशाली राष्ट्र के प्रमुख की कम, और किसी परीक्षा में फेल होकर प्रिंसिपल के कमरे में बैठे छात्र की अधिक लग रही थी। जब शी जिनपिंग और ट्रंप मीडिया के सामने आए, तो वह दृश्य कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। जहाँ जिनपिंग सोफे पर हाथ फैलाकर पूरी तरह रिलैक्स और मुस्कुराहट के साथ बैठे थे, वहीं ट्रंप के कंधे आगे की तरफ झुके हुए थे और हाथ दोनों घुटनों के बीच दबे थे।यह केवल बैठने का तरीका नहीं था, बल्कि यह मनोवैज्ञानिक दबाव का प्रतीक था। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति गहरे तनाव में होता है और हार का डर उसे सता रहा होता है, तो उसका शरीर इसी तरह सिकुड़ जाता है। व्यंग्य यह है कि जिस ट्रंप ने अमेरिका को ग्रेट बनाने का वादा किया था, वह जिनपिंग की एक मुस्कान के सामने कूटनीतिक रूप से स्लिम होते नजर आए। पतनशील राष्ट्र का तमगा और ट्रंप की अद्भुत व्याख्या इस यात्रा का सबसे तीखा मोड़ तब आया जब शी जिनपिंग ने ट्रंप के सामने ही अमेरिका को डिक्लाइनिंग नेशन (पतनशील राष्ट्र) कह दिया। सामान्यतः, किसी देश के स्वाभिमानी नेता के लिए यह अपमान असहनीय होता, लेकिन ट्रंप की प्रतिक्रिया ने कूटनीतिक इतिहास में हास्य का एक नया अध्याय जोड़ दिया। ट्रंप ने इस अपमान को न केवल स्वीकार किया, बल्कि इसकी एक ऐसी व्याख्या पेश की जो उनकी तार्किक क्षमता पर सवाल उठाती है। ट्रंप ने तर्क दिया कि जिनपिंग का इशारा मौजूदा दौर पर नहीं, बल्कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के चार साल के नुकसान की ओर था। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर यहाँ तक लिख दिया कि जिनपिंग 100% सही थे जब उन्होंने अमेरिका को पतनशील कहा, क्योंकि उनका मतलब स्लीपी जो से था। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई आपके घर को कूड़ाघर कहे और आप मुस्कुराकर कहें, बिल्कुल सही, मेरे पड़ोसी ने पिछले साल यहाँ कचरा फेंका था। व्यंग्य की पराकाष्ठा यह है कि ट्रंप ने दो साल पहले तक अमेरिका को पतनशील राष्ट्र माना, मगर वर्तमान में जिनपिंग द्वारा कही गई बात को अतीत का आईना बताकर खुद को दिलासा दिया। जबकि हकीकत यह है कि अमेरिका वर्तमान में महंगाई, गिरती रेटिंग और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों (ईरान-इजराइल) के बोझ तले दबा हुआ है। थसीडिडीज ट्रैप और वैचारिक चेतावनी जिनपिंग ने केवल शब्दों से हमला नहीं किया, बल्कि ट्रंप को थसीडिडीज ट्रैप (Thucydides Trap) की चेतावनी भी दे डाली। यह एक ऐसी अवधारणा है जहाँ एक उभरती हुई शक्ति (चीन) स्थापित शक्ति (अमेरिका) को चुनौती देती है, जिसका परिणाम अक्सर युद्ध होता है। जिनपिंग का यह कहना कि दुनिया एक नए मोड़ पर है और सदी के बड़े बदलाव हो रहे हैं, इस बात का स्पष्ट संकेत था कि वे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से चली आ रही अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को अब स्वीकार नहीं करते। व्यापार, एलन मस्क और खाली हाथ ट्रंप अपने साथ टीम कुक और एलन मस्क जैसे दिग्गज कारोबारियों को लेकर गए थे ताकि व्यापार और आर्थिक रिश्तों को पटरी पर लाया जा सके। उम्मीद थी कि ‘बिजनेस मैन’ ट्रंप कोई बड़ी डील लेकर लौटेंगे, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोई भी ठोस मुद्दा या उपलब्धि सामने नहीं आई। बल्कि, चीन ने ताइवान के मुद्दे पर अपनी रेड लाइन खींच दी और साफ कह दिया कि अगर अमेरिका ने टांग अड़ाई तो रिश्ते पूरी तरह बिगड़ सकते हैं। ट्रंप, जो अपने सुर बदलने के लिए जाने जाते हैं, चीन में जिनपिंग को महान नेता और अद्भुत दोस्त बताते नहीं थक रहे थे, जबकि बदले में उन्हें केवल जलालत ही नसीब हुई। सुरक्षा का डर: कचरे में डिजिटल अमेरिका सबसे हास्यास्पद स्थिति तब बनी जब अमेरिकी डेलीगेशन के फोन और लैपटॉप कचरे के डिब्बे के हवाले कर दिए गए। अमेरिकी सुरक्षा कर्मियों को डर था कि चीन ने इन उपकरणों में जासूसी के उपकरण या सॉफ्टवेयर लगा दिए होंगे। डेलीगेशन के सदस्य चीन जाते समय अपने असली फोन घर छोड़ गए थे और अस्थायी फोन का इस्तेमाल कर रहे थे। यह स्थिति वैश्विक महाशक्ति के रूप में अमेरिका के गिरते आत्मविश्वास को दर्शाती है। जो देश अपनी साइबर सुरक्षा का दावा करता है, उसे चीन की धरती पर कदम रखते ही अपने लैपटॉप से डर लगने लगता है। यह न केवल चीन की साइबर धाक को प्रमाणित करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि अमेरिका किस कदर चीन के प्रति असुरक्षा की भावना से भरा हुआ है। निष्कर्ष: एक अधूरा एक्सरे इस पूरी यात्रा का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि जो ट्रंप भारत जैसे देशों को अक्सर कूटनीतिक रूप से लताड़ते रहते हैं, वे बीजिंग के दरबार में खुद लतड़ खाकर लौटे हैं। जिनपिंग ने अमेरिका को उसकी औकात (पतनशील राष्ट्र) दिखाई, उसकी रेड लाइन तय की (ताइवान), और उसके राष्ट्रपति को तनावपूर्ण बॉडी लैंग्वेज में रहने को मजबूर किया। अंत में, ट्रंप का यह दौरा कूटनीतिक सफलता से ज्यादा एक कॉमेडी ऑफ एरर्स बन गया, जहाँ एक तरफ महाशक्ति की तकनीक कचरे के डिब्बे में पड़ी थी, और दूसरी तरफ उसका स्वाभिमान बाइडन के कार्यकाल’ वाली व्याख्या के पीछे छिपने की कोशिश कर रहा था। यह दौरा यह साबित करने के लिए काफी था कि कूटनीति केवल हुंकार भरने से नहीं, बल्कि मेज पर अपनी धमक बनाए रखने से चलती है जिसमें इस बार ट्रंप पूरी तरह नाकाम रहे। इस छायाचित्र में डोनाल्ड ट्रम्प गुपचुप याने चुराकर शी जिन पिंग की नोटबुक खोलकर देखते हुये। यह तो समझना चाहिए था देखने से पहले की उसमे जो कुछ लिखा होगा वह चीनी भाषा में होगा। वाह रे ट्रम्प ….. Kanthak Suryatal Post Views: 592 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation भारतीय टीव्ही पत्रकारिता: एका ३० वर्षांच्या तरुण मृताची शोकांतिका! अमीरां सोबत गळाभेट आणि भारतातील शेख देशद्रोही;आणि जमिनीवरचा गिग संघर्ष