मध्य पूर्व में तनाव एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया है जहाँ कूटनीति के रास्ते बंद होते दिख रहे हैं और युद्ध के बादल और गहरे हो गए हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते को लेकर चल रही महत्वपूर्ण बातचीत अब पूरी तरह से रद्द होने की कगार पर है। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई है जब दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष ने एक नया मोड़ ले लिया है और शांति की उम्मीदें धूमिल होती जा रही हैं।
ईरान-अमेरिका वार्ता का स्थगन और अनुच्छेद 1 का उल्लंघन
ईरान और अमेरिका के बीच 28 और 29 जून को स्विट्जरलैंड में एक महत्वपूर्ण तकनीकी वार्ता होनी प्रस्तावित थी। हालाँकि, अब यह खबर निकलकर सामने आ रही है कि ईरानी वार्ताकार इस बैठक को पूरी तरह से रद्द करने पर विचार कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण पिछले कुछ दिनों में हुई सैन्य गतिविधियाँ हैं। सूत्रों के अनुसार, ईरान ने पहले एक टैंकर पर हमला किया, जिसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के द्वीपों पर हमले किए।
ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि अमेरिका के इन हमलों ने शांति समझौते के अनुच्छेद 1 (Article 1) का घोर उल्लंघन किया है। ईरान का मानना है कि जब समझौते के बुनियादी नियमों का ही पालन नहीं किया जा रहा है, तो वार्ता को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। ईरान ने घोषणा की है कि इस उल्लंघन के बाद 60 दिनों की शेष अवधि सहित सभी वार्ताओं को रोकना आवश्यक हो गया है। ईरानी पक्ष का यह भी कहना है कि अमेरिका के साथ बैठना अब उनके देश के साथ गद्दारी और उनके उसूलों के साथ समझौता करने जैसा होगा।
हॉटलाइन बंद करने और कूटनीतिक गतिरोध की स्थिति
तनाव इतना बढ़ चुका है कि ईरान अब अमेरिका के साथ स्थापित ‘हॉटलाइन’ व्यवस्था को भी पूरी तरह से बंद करने की तैयारी में है। ईरान के अधिकारियों का स्पष्ट रूप से कहना है कि जब वे बातचीत की मेज पर होते हैं, तब भी हमले होते हैं और जब बातचीत नहीं होती, तब भी हमले जारी रहते हैं। इससे ईरानी नेतृत्व में यह धारणा मजबूत हुई है कि अमेरिका वास्तव में शांति की राह पर नहीं चलना चाहता।
इस कूटनीतिक विफलता के पीछे केवल द्विपक्षीय मुद्दे नहीं हैं, बल्कि अन्य देशों के प्रयास भी विफल होते दिख रहे हैं। बताया गया है कि पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम मुल्कों ने भी इस विध्वंस को रोकने और मैत्री स्थापित करने की बहुत कोशिशें की थीं, लेकिन ये सभी प्रयास अब विफल होते नजर आ रहे हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: महाभारत और रश्मिरथी की प्रासंगिकता
वर्तमान संकट की तुलना महाभारत के प्रसंग और कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों से की जा रही है। जिस प्रकार भगवान कृष्ण पांडवों के दूत बनकर हस्तिनापुर की सभा में शांति का प्रस्ताव लेकर गए थे और दुर्योधन ने उसे ठुकरा दिया था, वैसी ही स्थिति आज वैश्विक पटल पर देखी जा रही है।
महाभारत के उस प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि पांडवों ने युद्ध टालने के लिए केवल पाँच गाँवों की मांग की थी, लेकिन दुर्योधन ने ‘सुई की नोक’ के बराबर भी जमीन देने से मना कर दिया था। वर्तमान संदर्भ में दुर्योधन की तुलना ट्रंप (या अमेरिकी नेतृत्व) से की जा रही है, जिन्होंने शांति के सभी ‘हित वचनों’ को अनसुना कर दिया है। ‘रश्मिरथी’ की वे कालजयी पंक्तियाँ आज के घटनाक्रम पर सटीक बैठती हैं:
“हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अंतिम संकल्प सुनाता हूँ। याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।“
ईरान ने भी अब इसी प्रकार का कड़ा रुख अपना लिया है और यह साफ कर दिया है कि अमेरिका का कोई भी हमला अब अनुत्तरित नहीं रहेगा。
इजराइल-लेबनान ढांचागत समझौता और हिजबुल्लाह का विरोध
मध्य पूर्व का दूसरा बड़ा मोर्चा लेबनान में खुला हुआ है। अमेरिका की मध्यस्थता में इजराइल और लेबनान के बीच संघर्ष समाप्ति के लिए एक ढांचागत समझौता (Framework Agreement) हुआ है। यह समझौता वाशिंगटन में हुई बातचीत के बाद तैयार किया गया था, जिसमें लेबनानी सेना के लिए एक समन्वय समूह और प्रायोगिक क्षेत्र स्थापित करने की बात कही गई है।
हालाँकि, इस समझौते को जमीन पर भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। हिजबुल्लाह ने इन वार्ताओं को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है। हिजबुल्लाह के समर्थकों का मानना है कि यह समझौता शांति का नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण का समझौता है। उनका तर्क है कि इजराइल इस प्रकार के समझौतों से कभी नहीं रुकेगा, विशेष रूप से तब जब उसने लेबनान के भीतर अपने सैन्य अभियान नहीं रोके हैं।
बेरूत की सड़कों पर कोहराम और विरोध प्रदर्शन
लेबनान और इजराइल के बीच हुए इस समझौते की खबर फैलते ही लेबनान की राजधानी बेरूत में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए। हिजबुल्लाह समर्थकों ने देर रात सड़कों पर उतरकर अमेरिका की मध्यस्थता वाले इस समझौते का विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने महत्वपूर्ण सड़कों, जैसे सलीम सलाम रोड और बेरुत हवाई अड्डे जाने वाले रास्तों को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया।
प्रदर्शन के दौरान निम्नलिखित स्थितियां देखी गईं:
- प्रदर्शनकारियों ने हिजबुल्लाह और ईरान के काले झंडे लहराए।
- सड़कों पर टायर जलाकर आगजनी की गई और मोटरसाइकिलों पर बड़े मार्च निकाले गए।
- लेबनानी सुरक्षा बलों को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए तैनात किया गया और कुछ इलाकों में आंसू गैस के गोलों का भी इस्तेमाल किया गया।
प्रदर्शनकारियों की मांग है कि इजराइल को लेबनान की जमीन से पूरी तरह बाहर निकलना चाहिए और उसकी सेना का एक भी जवान लेबनानी सीमा (जैसे लेतानी नदी तक) के भीतर नजर नहीं आना चाहिए। लेबनान के भीतर बहुत से लोग इस बात से नाराज हैं कि उनकी सरकार इजराइल के सामने झुक रही है。
निष्कर्ष: युद्ध की ओर बढ़ता क्षेत्र
वर्तमान स्थिति यह है कि एक तरफ ईरान ने शांति वार्ता को रद्द करने का संकेत दे दिया है क्योंकि अमेरिका ने सीजफायर और समझौतों के नियमों का उल्लंघन किया है। दूसरी तरफ, इजराइल और लेबनान के बीच जिस तथाकथित ‘पीस डील’ का दावा किया जा रहा है, वह लेबनान की जनता और हिजबुल्लाह के भारी विरोध के कारण विफल होती दिख रही है।
स्विट्जरलैंड की शांति वार्ता खटाई में पड़ने और होरमुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते सैन्य हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्य पूर्व में अब याचना का समय समाप्त हो गया है और रण (युद्ध) की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं। शांति के सभी तकनीकी और कूटनीतिक प्रयास अब अपने अंतिम बिंदु पर पहुँच चुके हैं, जहाँ से वापसी का रास्ता बेहद कठिन नजर आता है।
