ट्रंप, खामनेई और ईरान की प्रतिरोध रणनीति
मध्य पूर्व की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर है जहां कल तक नेस्तनाबूद करने की बात करने वाले आज सम्मानित महसूस करने की बातें कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप, जो अपने पिछले कार्यकाल और हालिया बयानों में ईरान को पूरी तरह खत्म करने और उसकी संस्कृति तक को निशाना बनाने की धमकी दे रहे थे, अब ईरान के सर्वोच्च नेता मुस्तफा खामनेई से मिलने के लिए बेताब दिखाई दे रहे हैं। यह बदलाव न केवल ट्रंप की व्यक्तिगत राजनीति को दर्शाता है, बल्कि इस क्षेत्र में ईरान की बढ़ती सैन्य और रणनीतिक ताकत का भी प्रमाण है।
ट्रंप का विरोधाभास और ईरान का नेतृत्व
हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वे ईरान के सुप्रीम लीडर मुस्तफा खामनेई से मिलकर सम्मानित (Honored) महसूस करेंगे। यह बयान उस व्यक्ति की ओर से आया है जिसने पहले ही दिन मुस्तफा खामनेई के पिता इमाम खामनेई को शहीद करने का दावा किया था और यह प्रचार किया था कि ईरान अब हार की कगार पर है।
इस कूटनीतिक यू-टर्न के पीछे का एक बड़ा कारण ईरान के भीतर सत्ता का मजबूत ढांचा है। पहले पश्चिमी मीडिया में यह अफवाहें फैलाई गई थीं कि मुस्तफा खामनेई शायद जीवित नहीं हैं या गंभीर रूप से घायल हैं। हालांकि, अब यह स्पष्ट हो गया है कि ईरान की कमान पूरी तरह से उन्हीं के हाथों में है। ईरान की हर शर्त और कूटनीतिक संदेश मुस्तफा खामनेई के माध्यम से ही तय होता है। ट्रंप की यह नई “सम्मान” वाली भाषा दरअसल ईरान की इसी जमीनी हकीकत को स्वीकार करने की मजबूरी है।
क्षेत्रीय शक्तियों की गुप्त भूमिका और इज़राइल के अड्डे
यह युद्ध केवल ईरान और इज़राइल के बीच नहीं है, बल्कि इसमें कई अन्य क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, कुवैत और यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) ने इस संघर्ष में “आक्रामक तरीके” से हिस्सा लिया है। ईरान के राष्ट्रपति पजेशकियन ने दावा किया है कि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि यूएई पहले दिन से ही जंग में शामिल था।
इज़राइल ने ईरान को घेरने के लिए कई देशों में अपने गोपनीय सैन्य अड्डे बनाए थे। सीएनएन के विश्लेषण के अनुसार:
- अज़रबैजान: यहाँ मोसाद और आईडीएफ के एजेंटों ने उत्तरी ईरान पर हमला करने के लिए अड्डे बनाए थे।
- इराक: यहाँ ईरान पर हमलों और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए दो गुप्त सैन्य स्थल बनाए गए थे।
- यूएई: इज़राइल ने यहाँ ‘आयरन डोम’ एरियल डिफेंस सिस्टम तैनात किया था ताकि ईरान से आने वाले ड्रोंस और मिसाइलों को बीच में ही रोका जा सके।
- सोमालीलैंड: यहाँ से ईरान पर लंबी दूरी की मिसाइलें दागने के लिए मिलिट्री पोजीशन बनाई गई थी। दिलचस्प बात यह है कि सोमालीलैंड को इज़राइल ने मान्यता दी है, जबकि अमेरिका और अधिकांश अरब मुल्कों ने इसे मान्यता नहीं दी है।
इतने सारे मुल्कों (अमेरिका, इज़राइल, यूएई, अज़रबैजान, इराक का एक धड़ा, जर्मनी आदि) के सहयोग के बावजूद अगर अमेरिका और इज़राइल ईरान को निर्णायक रूप से नहीं हरा पाए, तो यह ईरान की प्रतिरोध क्षमता को साबित करता है।
ट्रंप की ओवररेटेड बयानबाजी और बाजार का खेल
डोनाल्ड ट्रंप के बयानों को अक्सर धरातल की सच्चाई के बजाय बाजार की हलचल से जोड़कर देखा जाता है। जब ट्रंप से उनके पुराने बयानों के बारे में पूछा गया—जैसे ईरान के पहाड़ों के नीचे से यूरेनियम निकाल लेने की बात—तो उन्होंने खुद स्वीकार किया कि वे बयान “ओवररेटेड” (बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए) थे। ट्रंप ने माना कि उनकी बातें अक्सर इस पर निर्भर करती हैं कि वे किस दिन और किस संदर्भ में बोल रहे हैं।
यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि ट्रंप के कड़े बयान अक्सर शेयर बाजार को नियंत्रित करने या मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए होते हैं, न कि किसी वास्तविक सैन्य योजना के लिए। इसके अलावा, ट्रंप और नेतन्याहू के बीच कथित गाली-गलौज की खबरें भी एक कूटनीतिक लीक (Tactical Leak) हो सकती हैं, जिसका उद्देश्य लेबनान में इज़राइल की स्थिति को मजबूत करना और एक अनुकूल सीजफायर की जमीन तैयार करना था।
लेबनान और हिजबुल्लाह का मोर्चा
लेबनान में सीजफायर के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, वह काफी जटिल है। लेबनान की वर्तमान सरकार और सेना को काफी हद तक अमेरिका समर्थित माना जाता है। इस सीजफायर का असली मकसद इज़राइल के हमलों को रोकना नहीं, बल्कि लेबनान की सेना को हिजबुल्लाह के खिलाफ खड़ा करना है। अमेरिका चाहता है कि हिजबुल्लाह के हथियार छीन लिए जाएं ताकि इज़राइल आसानी से दक्षिण लेबनान की जमीन पर कब्जा कर सके।
हालांकि, हिजबुल्लाह ने स्पष्ट किया है कि वे इस सीजफायर को स्वीकार नहीं करते हैं। हिजबुल्लाह के पास अब नए एफपीवी (FPV) ड्रोंस हैं, जिन्होंने इज़राइली सेना के लिए मुश्किलें पैदा कर दी हैं। इज़राइल को लगा था कि पेजर धमाकों और नेतृत्व की हत्या के बाद हिजबुल्लाह खत्म हो जाएगा, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है।
खुफिया युद्ध: हंडाला बनाम मोसाद
सीमाओं पर जारी लड़ाई के साथ-साथ एक गुप्त खुफिया युद्ध भी चल रहा है। हाल ही में तेल अवीव में एक कार विस्फोट में मोसाद के एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत हो गई। ईरान के हैकिंग ग्रुप ‘हंडाला’ ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है और दावा किया है कि वे मोसाद के अधिकारियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यह इस बात का संकेत है कि यदि इज़राइल ईरान के भीतर विस्फोट करवा सकता है, तो ईरान भी इज़राइल के सुरक्षित घेरों में घुसकर जवाब देने की क्षमता रखता है।
ईरान की शर्तें और शांति की संभावना
ट्रंप जल्द से जल्द एक समझौता करना चाहते हैं क्योंकि अमेरिका के भीतर इस युद्ध का विरोध बढ़ रहा है। लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी “बेकार की शर्त” पर हस्ताक्षर नहीं करेगा। ईरान की तीन प्रमुख शर्तें हैं:
- मध्य पूर्व में हर तरह की जंग का पूरी तरह खात्मा।
- अमेरिका द्वारा जब्त की गई ईरानी संपत्ति (Assets) की वापसी।
- होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से ईरान को टोल वसूलने का अधिकार।
ईरान का मानना है कि जब तक ये शर्तें नहीं मानी जातीं, तब तक सीजफायर या किसी भी समझौते (MoU) की बात करना व्यर्थ है।
निष्कर्ष
वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी मजबूरियों और अमेरिकी बाजार के हितों के कारण ईरान के साथ समझौता करने को बेताब हैं। हालांकि, इज़राइल इस समझौते के रास्ते में बाधा बना हुआ है। अंततः, यह ईरान की सैन्य शक्ति और उसकी रणनीतिक दृढ़ता ही है जिसने अब तक एक पूर्ण युद्ध को रोक रखा है। यदि ट्रंप का “पागलपन” अपनी सीमा पार करता है, तो युद्ध दोबारा शुरू हो सकता है, अन्यथा अमेरिका को ईरान की शर्तों पर ही शांति का रास्ता चुनना होगा।
