अमृत काल का अनोखा विकास: कहीं सड़क नहीं तो हेलीकॉप्टर दे दो, कहीं तेल नहीं तो पैदल चल लो!

इक्कीसवीं सदी के उस न्यू इंडिया में, जहाँ विकास की गंगा इतनी तीव्र गति से बह रही है कि ज़मीन पर सड़कें कम पड़ गई हैं और पेट्रोल पंपों पर तेल की जगह केवल धैर्य मिल रहा है। आज हम उस महान भारत की सैर करेंगे जिसे डिजिटल इंडिया कहा जाता है, लेकिन जहाँ की हकीकत को देखने के लिए आपको एक्स-रे वाली नज़रों की ज़रूरत पड़ेगी। हमारे देश में एक तरफ तो यमुना एक्सप्रेसवे और मुंबई-दिल्ली कॉरिडोर जैसे चमचमाते रास्ते हैं जिस पर हम गर्व से सीना चौड़ा करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ बस्तर का वह सुदूर इलाका भी है जहाँ विकास अभी भी अपनी चप्पलें घिस रहा है।

सुकमा का हेलीकॉप्टर वाला समाजवाद

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का एक गाँव है मरुकी। यहाँ के आदिवासियों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक ऐसी चिट्ठी लिखी है, जिसे पढ़कर या तो आप हँसेंगे या फिर व्यवस्था की निर्लज्जता पर अपनी आँखों के आँसू पोंछेंगे। इन ग्रामीणों ने बड़ी ही विनम्रता और तीखे तंज के साथ सरकार से गुहार लगाई है कि, हुज़ूर, अगर आप पिछले १० साल से एक छोटी सी सड़क नहीं बना सकते, तो मेहरबानी करके पूरे गाँव को एक हेलीकॉप्टर ही दे दीजिए

सोचिए, क्या शानदार सोच है! जब १० साल से अधिकारी और कलेक्टर साहब के दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी केवल खोखले आश्वासन ही हाथ लगे हों, तो हेलीकॉप्टर मांगना ही सबसे तार्किक कदम लगता है। आखिर हम विश्वगुरु जो बनने जा रहे हैं! इन ग्रामीणों का कहना है कि १० साल पहले सड़क का काम शुरू तो हुआ था, लेकिन ठेकेदार महोदय पुलिया के गड्ढे खोदकर ऐसे गायब हुए जैसे जनता के अच्छे दिन। अब आलम यह है कि मानसून के दिनों में जब यह रास्ता बंद हो जाता है, तो गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीज़ों को खाट पर लादकर कई किलोमीटर तक मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।

यह है हमारा आधुनिक भारत, जहाँ हम मंगलयान की बात करते हैं, चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होने पर इतराते हैं, लेकिन एक बीमार महिला के लिए बांस की एम्बुलेंस ही एकमात्र सहारा होती है। सरकार मुफ्त राशन तो बांट रही है, लेकिन उस राशन को घर लाने के लिए आदिवासियों को ११ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है या फिर अपनी जेब से १०० रुपये का ट्रैक्टर किराया देना पड़ता है। क्या यही वह अमृत काल है जिसके ढोल हम पूरी दुनिया में पीट रहे हैं? या फिर यह निर्लज्जता का अमृत काल है? 

नेपाल का ‘पड़ोसी धर्म’ और हमारा संकट

इस संकट की एक बड़ी मज़ेदार वजह यह भी है कि नेपाल में पेट्रोल भारत के मुकाबले ३५ से ५० रुपये प्रति लीटर महंगा है। अब पड़ोसी धर्म निभाते हुए नेपाल के लोग सरहद पार करके भारतीय पंपों पर धावा बोल रहे हैं। नतीजा यह है कि हमारे अपने किसान और ट्रांसपोर्टर बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। जहाँ १५० लीटर डीजल चाहिए, वहाँ ५-१० लीटर देकर टरकाया जा रहा है। खेती और माल ढुलाई दोनों ही विकास की रफ़्तार की तरह ठप होने की कगार पर हैं।

ज्ञान बनाम कर्म: ९० के दशक की यादें

प्रधानमंत्री जी अक्सर टीवी पर आकर जनता को ज्ञान देते हैं कि सोना मत खरीदो, विदेश यात्रा मत करो और पेट्रोल संभलकर खर्च करो। यह सुनकर बड़ी हंसी आती है क्योंकि उनके अपने काफिले और चुनावी रैलियों में पेट्रोल ऐसे बहता है जैसे गंगा की धारा।

इतिहास के पन्ने पलटें तो १९९० में जब खाड़ी युद्ध के कारण तेल संकट आया था, तब वी.पी. सिंह की सरकार में वित्त मंत्री मधु दंडवते ने एक मिसाल पेश की थी। उन्होंने केंद्र सरकार के अधिकारियों के लिए रविवार को सरकारी वाहन का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया था और मंत्रियों के पेट्रोल कोटे में २०% की कटौती की थी। उन्होंने खुद से शुरुआत की थी। लेकिन आज? आज तो ‘नौटंकी’ का दौर है। जब सोशल मीडिया पर आलोचना बढ़ती है, तो हमारे नेता दो दिन के लिए साइकिल या बैलगाड़ी पर फोटो खिंचवा लेते हैं और तीसरे दिन फिर अपनी लंबी-चौड़ी इम्पोर्टेड गाड़ियों के काफिले में गायब हो जाते हैं।

निष्कर्ष: कैसा है यह अमृत काल?

आज की हकीकत यह है कि किसी एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बना देने से सरकार का दायित्व पूरा नहीं हो जाता, जब तक कि सुदूर गाँवों के आदिवासियों को बुनियादी सुविधाएँ न मिलें। एक तरफ पेड़ों को काटने के लिए १० दिन में मंजूरी मिल जाती है ताकि माइनिंग का काम शुरू हो सके, लेकिन १० साल में एक सड़क पूरी नहीं होती।

सत्ता में चाहे कांग्रेस रही हो या १५ साल तक भाजपा, बस्तर के आदिवासियों का उत्थान केवल विज्ञापनों में ही हुआ है। आज का ‘सत्य’ यही है कि हम शेयर बाज़ार के सूचकांक को ही विकास मान बैठे हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत सुकमा के उस आदिवासी की तरह है जो सड़क के बदले हेलीकॉप्टर मांग रहा है ताकि वह अपनी व्यवस्था के ‘क्रूर मज़ाक’ का जवाब दे सके।

सड़क नहीं दे सकते तो हेलीकॉप्टर ही सही, कम से कम हवा में उड़ते हुए हमें नीचे ज़मीन की बदहाली तो नज़र नहीं आएगी! यह है हमारा महान अमृत काल जहाँ भाषणों में घी की नदियाँ बहती हैं और पेट्रोल पंपों पर डीजल की एक बूंद के लिए दंगे होते हैं। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!