युद्ध की आहट और बदलता वैश्विक समीकरण
वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ पुराने समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है, तो दूसरी तरफ प्रशांत महासागर में चीन अमेरिका की नौसैनिक शक्ति को चुनौती देने के लिए अंडर-सी घेराबंदी कर रहा है। अमेरिका की खुफिया एजेंसियों और इजरायली अधिकारियों की हालिया रिपोर्टों ने दुनिया भर में खतरे की घंटी बजा दी है। अब तक ईरान अक्सर बचाव की मुद्रा (Defensive mode) में देखा जाता था, लेकिन खुफिया रिपोर्ट्स संकेत दे रही हैं कि इस बार ईरान खेल के नियमों को बदलने की तैयारी कर चुका है।

ईरान का आक्रामक रुख: रक्षा से हमले की ओर
अमेरिकी और इजरायली खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान इजरायल पर एक बड़े ड्रोन और मिसाइल हमले की योजना बना रहा है। द ईरानियन लेटर और जेरूसलम पोस्ट जैसी मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से यह खबर सामने आई है कि ईरान की यह कार्रवाई वार्ता के विफल होने और परमाणु समझौतों पर गतिरोध के बाद शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार ईरान का रवैया पहले के मुकाबले कहीं अधिक सख्त है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान अब यह इंतजार नहीं करेगा कि कोई उस पर हमला करे; बल्कि वह स्वयं आगे बढ़कर पहले प्रहार की रणनीति अपना सकता है। यह बदलाव ईरान के भीतर पिछले कुछ दिनों की गतिविधियों और सैन्य हलचलों से भी स्पष्ट होता है। इजरायली खुफिया अधिकारी अपनी सरकार से ईरान के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने का आग्रह कर रहे हैं, क्योंकि होरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़े विवादों और परमाणु वार्ता के ठप होने से स्थिति विस्फोटक हो गई है।

इजरायल और अमेरिका के बीच मतभेद
इस संकट के बीच इजरायल और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व के बीच भी वैचारिक मतभेद उभरकर सामने आए हैं। स्रोतों के अनुसार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच करीब एक घंटे तक फोन पर तीखी बातचीत हुई। इस बातचीत के दौरान इजरायल का जोर इस बात पर था कि अमेरिका को तुरंत ईरान पर हमला कर देना चाहिए। हालांकि, ट्रंप ने फिलहाल वार्ता को एक मौका देने और हमले के लिए सही समय का इंतजार करने की सलाह दी। यह स्थिति दर्शाती है कि इजरायल ईरान के बढ़ते खतरे को लेकर कितना गंभीर और चिंतित है।
चीन की ग्रेट वॉल ऑफ अंडर सी और अमेरिका की घेराबंदी
जहाँ एक ओर मध्य पूर्व सुलग रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन ने समंदर की गहराइयों में अमेरिका को मात देने के लिए एक विशाल सेंसर नेटवर्क बिछाना शुरू कर दिया है। इसे ग्रेट वॉल ऑफ अंडर सी कहा जा रहा है। चीन का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी नौसेना की परमाणु पनडुब्बियों (Nuclear Submarines) का पता लगाना और उन्हें नियंत्रित करना है। चीन ने यह कदम अमेरिका की पिछली कार्रवाइयों से सबक लेकर उठाया है। उदाहरण के तौर पर, श्रीलंका के पास एक ईरानी जहाज पर अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा टॉर्पिडो से हमला करने की घटना ने चीन को सतर्क कर दिया है। अब चीन ताइवान के आसपास और पूरे प्रशांत क्षेत्र में ऐसे अंडर-वाटर सेंसर बिछा रहा है जो पानी के भीतर अमेरिकी पनडुब्बियों की हर हरकत पर नजर रखेंगे। ये सेंसर सिस्टम रडार की तरह काम करेंगे और जैसे ही कोई अमेरिकी जहाज या पनडुब्बी चीन के प्रभाव वाले क्षेत्र में प्रवेश करेगी, चीनी नौसेना को उसकी सटीक लोकेशन पता चल जाएगी।

रूस और उत्तर कोरिया: नई सैन्य ध्रुवीकरण
ईरान और चीन के अलावा, रूस ने भी अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन शुरू कर दिया है। रूस ने हाल ही में जल, थल और नभ तीनों क्षेत्रों में विशाल परमाणु युद्ध अभ्यास (Nuclear Drills) किया है, जिसमें लगभग 57,000 से 76,000 सैनिकों ने हिस्सा लिया। यह अभ्यास पश्चिमी देशों के लिए एक कड़ा संदेश है कि रूस किसी भी बड़े संघर्ष के लिए तैयार है। वहीं, उत्तर कोरिया ने भी अमेरिका की कथित ‘धूर्तता’ और रणनीतियों से सबक लेते हुए अपने परमाणु कानूनों में बदलाव किया है। किम जोंग-उन ने एक नया कानून पारित किया है जिसके तहत यदि उनके ऊपर या देश के नेतृत्व पर कोई हमला होता है, तो उत्तर कोरिया बिना किसी देरी के हमलावर देश पर परमाणु मिसाइलों से हमला कर देगा। यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि अब उत्तर कोरिया को सैन्य रूप से डराना और अधिक कठिन हो गया है।
आर्थिक परिणाम और वैश्विक प्रभाव
रूस के विदेश मंत्री ने चेतावनी दी है कि यदि फारस की खाड़ी (Persian Gulf) या होरमुज जलडमरूमध्य में फिर से युद्ध छिड़ता है, तो इसके परिणाम वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी होंगे। यह क्षेत्र वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, और यहाँ किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष ऊर्जा संकट पैदा कर सकता है। इसी बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की ईरान यात्रा को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके दौरे को लेकर यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या पाकिस्तान इस तनाव को कम करने में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा या फिर स्थिति किसी नए गठबंधन की ओर इशारा कर रही है।

