वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहा घटनाक्रम किसी जटिल सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं है। हालिया घटनाक्रमों और बयानों को यदि बारीकी से देखा जाए, तो एक बात साफ हो जाती है कि जिस डील या समझौते का शोर मचाया जा रहा है, वह जमीन पर फिलहाल ‘धुएं और धुंध’ के अलावा कुछ नहीं है। स्रोतों के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया एक ऐसी नूरा कुश्ती प्रतीत होती है, जहाँ पर्दे के पीछे के उद्देश्य कुछ और हैं और जनता के सामने पेश की जा रही तस्वीर कुछ और।
ट्रंप की चतुराई और हरमूज का संकट
डोनाल्ड ट्रंप के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईरान नहीं, बल्कि अमेरिका की आंतरिक अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई थी। अमेरिका में चुनाव नजदीक हैं और गिरती अर्थव्यवस्था ट्रंप के लिए एक बड़ा राजनीतिक खतरा बन सकती थी। इस दबाव को कम करने का एकमात्र रास्ता हरमूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खुलवाना था, क्योंकि इसके बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हो रही थी और कीमतें आसमान छू रही थीं।
ट्रंप ने बहुत चतुराई से एक चाल चली। उन्होंने ईरान के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) का दांव खेला, जिसका मुख्य उद्देश्य बिना किसी ठोस वादे के हरमूज को खुलवाना था। स्रोतों का दावा है कि ट्रंप ने इस दबाव को डील का नाम देना शुरू कर दिया, जबकि वास्तव में यह केवल बातचीत शुरू करने का एक एजेंडा मात्र है। इस तरह ट्रंप ने आर्थिक दबाव की उस ‘गर्दन’ को छुड़ा लिया, जिसे ईरान ने मजबूती से पकड़ा हुआ था।
नेतान्याहू का बगावती तेवर और विरोधाभास
एक तरफ ट्रंप समझौते का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने साफ कर दिया है कि उनका इस तथाकथित डील से कोई लेना-देना नहीं है। नेतान्याहू का रुख बेहद आक्रामक है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि इजरायल इस समझौते का हिस्सा नहीं है और जब भी उन्हें जरूरत महसूस होगी, वे हिजबुल्लाह और ईरान पर हमला जारी रखेंगे।
यहाँ एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। ट्रंप दावा कर रहे हैं कि ईरान अब परमाणु बम नहीं बनाएगा, लेकिन नेतान्याहू के बयान इस दावे पर सवाल खड़े करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने नेतान्याहू की सैन्य रणनीति की भी आलोचना की है, यहाँ तक कि उन्होंने यह भी कह दिया कि नेतान्याहू को लड़ना नहीं आता और उनसे बेहतर तो सीरिया लड़ सकता है। यह आपसी खींचतान दुनिया को गुमराह करने की एक रणनीति भी हो सकती है।
डील या महज 60 दिनों की मोहलत?
स्रोतों के अनुसार, जिस समझौते की बात की जा रही है, वह वास्तव में कोई पूर्ण समझौता नहीं बल्कि केवल दो पेज का एक मसौदा (MOU) है। यह मसौदा केवल इस बात की रूपरेखा है कि अगले 60 दिनों में किन विषयों पर बातचीत की जाएगी। इसमें ईरान के लिए तत्काल लाभ के नाम पर केवल आस और उम्मीद है, जबकि अमेरिका ने अपना सबसे बड़ा फायदा (हरमूज को खुलवाना) पहले ही सुनिश्चित कर लिया है।
स्रोतों में इस बात पर भी संदेह जताया गया है कि क्या अमेरिका वास्तव में अपना ब्लॉकेड (नाकाबंदी) हटाएगा। जहाँ ट्रंप दावा कर रहे हैं कि आवाजाही शुरू हो गई है, वहीं अमेरिकी सेंटकॉम (CentCom) का कहना है कि जब तक स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर नहीं हो जाते, नाकाबंदी नहीं हटेगी।
ईरान की आंतरिक स्थिति और दबाव
ईरान इस पूरे खेल में एक ऐसी स्थिति में है जहाँ उसकी ‘ईमानदारी’ का फायदा उठाया जा रहा है। ईरान की सरकार पर दोहरा दबाव है। एक तरफ जनता का भारी समर्थन और सड़कों पर उतरता हुजूम है, तो दूसरी तरफ आईआरजीसी (IRGC) के भीतर एक ऐसा धड़ा है जो यह मान रहा है कि ईरान ने जरूरत से ज्यादा समझौता कर लिया है। ईरान के समर्थकों को लगा था कि अमेरिका और इजरायल के बीच का झगड़ा उनके हक में जाएगा, लेकिन हकीकत में यह एक कूटनीतिक जाल साबित हो सकता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और खोखले दावे
स्रोतों का तर्क है कि अमेरिका जिसे अपनी ‘महान उपलब्धि’ बता रहा है, वह वास्तव में उसे उसी स्थिति में वापस ले आई है जहाँ वह पहले था। 18 फरवरी को ओमान में होने वाले समझौते और पूर्व के जेसीपीओए (JCPOA) का जिक्र करते हुए यह बताया गया है कि ईरान पहले से ही बातचीत की मेज पर था। ट्रंप ने खुद ही युद्ध का मैदान तैयार किया और अब फिर से बातचीत की मेज पर लौटने को अपनी जीत बता रहे हैं।
निष्कर्ष: पिक्चर अभी बाकी है
अंत में, यह स्पष्ट होता है कि अगले 60 दिन बहुत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। यह समय संभवतः इसलिए लिया गया है ताकि ईरान की जनता का गुस्सा शांत हो सके और सरकारें झुकने के लिए कोई बीच का रास्ता निकाल सकें। हालांकि, ट्रंप की डराने-धमकाने की नीति और नेतान्याहू की युद्ध जारी रखने की जिद किसी बहुत सुखद परिणाम की ओर इशारा नहीं करती।
मीडिया जिसे मास्टरस्ट्रोक कह रहा है, वह दरअसल एक ऐसी उलझी हुई स्थिति है जहाँ किसी के हाथ में कुछ भी ठोस नहीं है। जैसा कि स्रोत कहते हैं, यह पूरी डील फिलहाल नील बटे सन्नाटा ही नजर आती है।
