पिछले 24 घंटों में मध्य पूर्व की स्थिति में एक नाटकीय मोड़ आया है, जिसने इजराइल को केवल 5 घंटों के भीतर सरेंडर की स्थिति में ला खड़ा किया। यह संकट तब शुरू हुआ जब इजराइल ने ईरान के पेट्रोकेमिकल ठिकानों पर हमला किया। इसके जवाब में ईरान के सुप्रीम लीडर मुस्तफा खामनाई ने अपने मिलिट्री कमांडर्स के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक की और इजराइल को ऐसा सबक सिखाने का फैसला किया जिसे वह कभी न भूले। ईरान ने इस हमले के लिए अपनी सबसे उन्नत और खतरनाक मिसाइल, खैबर शेकन (Khyber Shekan) का उपयोग किया। जब इस मिसाइल ने इजराइल के प्रमुख पोर्ट सिटी हाइफा को निशाना बनाया, तो उसका असर किसी भीषण भूकंप जैसा था। रॉयटर्स जैसी अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के अनुसार, हाइफा से लेकर तेल अवीव तक लोग दहशत में आ गए और जिसे जहां जगह मिली, वह बंकरों में छुप गया। ईरान की सरकारी मीडिया, प्रेस टीवी ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि जायोनी-अमेरिकी गठबंधन ने दोबारा कोई गलत कदम उठाया, तो वे पूरे क्षेत्र को नर्क में तब्दील कर देंगे।
त्रिकोणीय हमला और इजराइल की घेराबंदी
ईरान का यह हमला अकेला नहीं था। जिस समय ईरान अपनी मिसाइलें दाग रहा था, उसी समय यमन से हूती मिलिशिया ने इजराइल के दक्षिणी हिस्से पर हमले शुरू कर दिए। साथ ही, उत्तर की तरफ से लेबनान के हिजबुल्ला ने इजराइल के शहरों को निशाना बनाना शुरू किया। इस तीन तरफा हमले (ईरान, हूती और हिजबुल्ला) ने न केवल इजराइल की सेना बल्कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को भी भारी दबाव में डाल दिया। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह इजराइल के वजूद के लिए एक बड़ा संकट था। यदि ईरान अपनी योजना के अनुसार 100 खैबर शेकन मिसाइलों से हमला कर देता, तो इजराइल के बड़े शहरों का अस्तित्व खत्म हो सकता था। ईरान के पास मोसाद और आईडीएफ (IDF) के मुख्यालयों का सटीक नक्शा है, और वह केवल कुछ मिसाइलों से ही इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था की कमर तोड़ सकता था।
डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता और कूटनीतिक ड्रामा
जब इजराइल पूरी तरह घिर गया, तो नेतन्याहू ने कथित तौर पर डोनाल्ड ट्रंप से संपर्क साधा। ट्रंप ने इस स्थिति को संभालने के लिए पाकिस्तान की मदद ली, जिसकी एक टीम पहले से ही तेहरान में शांति समझौते के लिए बातचीत कर रही थी। पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि ट्रंप को ईरान के सामने एक तरह से गिड़गिड़ाना पड़ा ताकि वह हमला रोक दे। ट्रंप ने अंततः एक ट्वीट के माध्यम से घोषणा की कि इजराइल और ईरान दोनों तत्काल युद्धविराम (Ceasefire) के लिए तैयार हैं और शांति वार्ता अंतिम चरण में है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रंप और नेतन्याहू दोनों का ईरान के सामने एक प्रकार का सरेंडर है। ट्रंप ने अपनी छवि बचाने के लिए खुद को बॉस के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन वास्तविकता यह थी कि वे ईरान की सैन्य क्षमता और उसकी शर्तों के आगे बेबस नजर आए।
ईरान की बढ़ती सैन्य ताकत: चीन और रूस की भूमिका
युद्ध के बीच जो दो-तीन महीनों का अंतराल मिला, उसका ईरान ने भरपूर फायदा उठाया है। रक्षा विशेषज्ञ अमरीश मिश्रा के अनुसार, ईरान की स्ट्राइक रेट अब पहले से दोगुनी हो गई है। यदि पहले उनकी मिसाइलों में 100 किलो बारूद था, तो अब वह बढ़कर 1000 किलो हो गया है, और मिसाइलों की गति भी दोगुनी हो चुकी है। इस सैन्य पुनरुत्थान में चीन और रूस की बड़ी भूमिका बताई जा रही है। चीन ने सीजफायर के दौरान ईरान को कच्चा माल और तकनीकी मदद पहुंचाई, जबकि रूस ने अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को दरकिनार कर कैस्पियन सागर के माध्यम से ईरानी तेल को बाजार तक पहुंचाने में मदद की। इसके अलावा, ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर कर लगाकर प्रतिदिन लाखों डॉलर की कमाई की है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था और सेना मजबूत हुई है।
नेतन्याहू और ट्रंप की रणनीतिक विफलता
विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि ट्रंप और नेतन्याहू ने ईरान की क्षमता का आकलन करने में भारी चूक की। नेतन्याहू ने बेरूत पर हमला करके एक टिपिंग पॉइंट पैदा किया, जिससे ईरान भड़क गया। ट्रंप चाहते थे कि ईरान केवल अपनी बात करे और लेबनान या हूती विद्रोहियों का मुद्दा छोड़ दे, लेकिन ईरान लेबनान के सवाल पर अड़ा रहा।ट्रंप को लग रहा था कि वे ईरान को डराकर अपनी शर्तों पर समझौता करा लेंगे, लेकिन पासा उल्टा पड़ गया। अब जो अंतिम समझौता होने जा रहा है, उसमें ईरान की स्थिति बहुत मजबूत है और ट्रंप को उसकी अधिकांश शर्तें माननी पड़ सकती हैं, जिसमें इजरायली सेना को दक्षिण लेबनान से वापस बुलाना भी शामिल हो सकता है।
निष्कर्ष
वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि मध्य पूर्व में शक्ति का संतुलन बदल रहा है। ईरान ने अपनी उन्नत मिसाइल तकनीक और रणनीतिक गठबंधनों (चीन-रूस) के दम पर खुद को एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित कर लिया है। इजराइल पर मंडराया कयामत का खतरा फिलहाल टल गया है, लेकिन इसका श्रेय ट्रंप की कूटनीति से ज्यादा ईरान की उस सैन्य चेतावनी को जाता है जिसने इजराइल और अमेरिका दोनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। यह पूरी घटना ट्रंप के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका है और ईरान की एक रणनीतिक जीत मानी जा रही है।
