हाल के घटनाक्रमों ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा उलटफेर दिखाया है, जहाँ इरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई की रणनीतियों के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने कड़े रुख से पीछे हटना पड़ा है। जो स्थिति एक पूर्ण युद्ध की ओर बढ़ती दिख रही थी, वह अचानक अमेरिकी सरेंडर और समझौते की बातचीत में बदल गई है।
खार्ग द्वीप पर हमले की योजना और ट्रंप का यू-टर्न
विवाद की मुख्य जड़ डोनाल्ड ट्रंप का वह ऐलान था, जिसमें उन्होंने वेनेजुएला की तर्ज पर इरान के खार्ग द्वीप (Kharg Island) पर जमीनी सैन्य कार्रवाई (Ground Operation) करने और उस पर कब्जा करने की बात कही थी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया और राजनीतिक सलाहकारों के माध्यम से यह संदेश फैला दिया था कि अमेरिका अब इरान के भीतर कदम रखने जा रहा है। हालांकि, इस घोषणा के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप के सुर पूरी तरह बदल गए। वह अचानक युद्ध की बात छोड़कर सीजफायर और समझौतों की मेज पर आ गए। इस बदलाव के पीछे इरान की वह सैन्य तैयारी थी, जिसकी जानकारी अमेरिकी जनरल्स ने ट्रंप को व्हाइट हाउस की एक महत्वपूर्ण बैठक में दी थी।
इरान की अभूतपूर्व सैन्य तैयारी
जब ट्रंप अपने उन राजनीतिक सलाहकारों (जैसे लिंडसे ग्राहम, टेड क्रूज और जॉनी अर्नस्ट) से घिरे थे जो इरान पर हमले के पक्षधर थे, तब सैन्य विशेषज्ञों ने उन्हें जमीनी हकीकत से रूबरू कराया। इरान ने किसी भी संभावित हमले का मुकाबला करने के लिए चक्रव्यूह कर रखा था:
- सैनिकों की तैनाती: इरान ने खार्ग द्वीप, क्युशम (Qeshm) द्वीप, अबू मूसा और बंदर अब्बास के आसपास लगभग 2 लाख सैनिकों को तैनात कर दिया था। यह भारी जमावड़ा अमेरिकी सेना का स्वागत विनाशकारी तरीके से करने के लिए किया गया था।
- मिसाइल रक्षा कवच: खार्ग के आसपास 100 से ज्यादा अबू महदी मिसाइलें तैनात की गई थीं, जिनका उद्देश्य किसी भी अमेरिकी जहाज या विमान को द्वीप के पास पहुंचने से पहले ही नष्ट करना था।
- समुद्री बेड़ा: इरान की 200 छोटी नावें, जो अपनी मारक क्षमता के लिए जानी जाती हैं, खार्ग के चारों ओर घेरा बनाकर खड़ी थीं ताकि किसी भी घुसपैठ को रोका जा सके।
- उन्नत हथियार प्रणाली: इरान ने हीट-सेंसिंग शोल्डर मिसाइलें (कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली मिसाइलें, जिनका संभावित चीनी कनेक्शन बताया जा रहा है) सक्रिय कर दी थीं, जो हेलीकॉप्टरों और लड़ाकू विमानों के लिए काल साबित हो सकती थीं।
भारी नुकसान की चेतावनी: जनरल्स की ब्रीफिंग
व्हाइट हाउस में हुई बैठक में अमेरिकी सेना के जनरल्स ने ट्रंप को साफ चेतावनी दी कि यदि इरान में जमीनी कदम रखा गया, तो परिणाम बेहद भयानक होंगे। मिलिट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार, इरान के प्रतिरोध के कारण इस ऑपरेशन में कैजुअल्टी रेट (हताहत होने की दर) 35% तक हो सकती थी। इसका अर्थ यह था कि इरान में कदम रखने वाले हर तीन अमेरिकी सैनिकों में से एक का मारा जाना तय था। इतनी बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिकों की मौत का जोखिम ट्रंप के लिए राजनीतिक और सैन्य रूप से उठाना असंभव था।
जंग का विस्तार: पश्चिम एशिया से बाहर का खतरा
इरानी नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया था कि यह युद्ध केवल उनकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इब्राहिम अजीजी (सिक्योरिटी काउंसिल के चीफ) ने चेतावनी दी थी कि हमला होने पर जंग पश्चिम एशिया के बाहर जाएगी। इरान की रणनीति में काउंटर-मेजर के रूप में कई अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य शामिल थे:
- इजरायल पर हमला: इरान ने इजरायल की ओर 100 खैबर (Khaibar) मिसाइलें तैनात कर दी थीं, जो पलक झपकते ही इजरायल को निशाना बना सकती थीं。
- यूरोप और अरब देश: इरान पहली बार अपनी 5000 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलों का इस्तेमाल करने की तैयारी में था, जिससे यूरोप के ठिकाने भी निशाने पर आ गए थे। इसके अलावा, सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे पांच अरब देशों के वे ठिकाने भी इरान की रडार पर थे जिन्हें पहले कभी निशाना नहीं बनाया गया था।
अमेरिकी सैन्य क्षति: F-35 और F-16 का मुद्दा
सूत्रों के अनुसार, जमीनी ऑपरेशन से पहले ही अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जॉर्डन में स्थित अमेरिकी बेस पर हमले के दौरान F-35 और F-16 लड़ाकू विमानों के क्षतिग्रस्त होने की खबरें हैं। बताया गया है कि इरान के रक्षा तंत्र ने कम से कम एक F-35 जेट को मार गिराया है। जॉर्डन में तैनात अमेरिकी पैट्रियट (Patriot) और थाड (THAAD) डिफेंस सिस्टम इन हमलों को रोकने में विफल रहे, जिससे अमेरिकी सैन्य तकनीक की प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुंची है।
फेस-सेविंग और समझौते का ढोंग
जब ट्रंप को अपनी गलती का एहसास हुआ और जनरल्स ने उन्हें इरान के जाल की गहराई समझाई, तो उन्होंने अपनी छवि बचाने (Face-saving) के लिए ‘समझौते’ का सहारा लिया। ट्रंप ने आनन-फानन में कतर, सऊदी अरब, यूएई, तुर्की और जॉर्डन जैसे देशों के प्रमुखों को फोन किया और एक पुराने ड्राफ्ट पर बातचीत आगे बढ़ाने का आग्रह किया। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि एक बड़ा समझौता होने वाला है और इरान के सुप्रीम लीडर के बेटे मुस्तफा खामनेई भी इसके लिए तैयार हैं। हालांकि, इरान ने इन दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। इरान का कहना है कि न तो कोई डील हुई है और न ही वे अपने परमाणु कार्यक्रम (यूरिनियम संवर्धन) पर किसी दबाव में बात करेंगे। ट्रंप द्वारा समझौते की बात को इरान ने एक “झूठ” करार दिया है जो केवल युद्ध से पीछे हटने को सही ठहराने के लिए बोला गया है।
निष्कर्ष: एक अस्थाई शांति या बड़ा जाल?
वर्तमान स्थिति को इरान की एक बड़ी रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका, इजरायल और कई अरब देशों के गठबंधन के बावजूद इरान अपनी संप्रभुता की रक्षा करने में सफल रहा है। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस अचानक “समर्पण” के पीछे कोई बड़ी साजिश भी हो सकती है। यह इरान को किसी नए कूटनीतिक जाल में फंसाने की कोशिश हो सकती है, जिससे भविष्य में फिर से संघर्ष की शुरुआत हो सके। फिलहाल के लिए, इरान ने अपनी सैन्य तैयारी और सख्त तेवरों से अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है, जिसे वैश्विक स्तर पर ट्रंप की एक करारी हार के रूप में देखा जा रहा है।
