ईरान ने कहा वापस तो आप लाशें भी नहीं गिन पाओगें वर्तमान में दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक गलत फैसला वैश्विक शांति को पूरी तरह से नष्ट कर सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अब एक ऐसा रूप ले लिया है जिसे विशेषज्ञ खतरे की घंटी मान रहे हैं। विशेष रूप से, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संभावित वापसी और उनके फैसलों ने इज़राइल और मध्य पूर्व के समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया है। 50 हजार सैनिकों का प्रवेश और परमाणु ठिकानों पर हमला पेंटागन से आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिकी सेना ट्रंप के आदेश का इंतजार कर रही है और संभावित लक्ष्यों की सूची तैयार कर ली गई है। सबसे खतरनाक योजना ईरान की धरती पर 5,000 मरीन और विशेष सैन्य बलों (Special Operation Forces) को उतारने की है। इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु स्थलों में छिपे संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) तक पहुँचना और उसे जब्त करना है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारी भी मानते हैं कि यह एक बेहद जोखिम भरा मिशन होगा जिसमें भारी सैन्य नुकसान हो सकता है। इसके अतिरिक्त, 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 2,000 पैराट्रूपर्स और 500 से ज्यादा अतिरिक्त सैनिक भी आदेश के इंतजार में तैनात हैं। ईरान की चेतावनी: लाशें गिन नहीं पाओगे ईरान ने अमेरिका की इन तैयारियों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और शीर्ष नेतृत्व ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अमेरिकी सैनिकों ने ईरान की धरती पर कदम रखा, तो वे वापस नहीं जा पाएंगे। ईरान का कहना है कि वापस तो आप लाशें भी नहीं गिन पाएंगे। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसका पिछला संयम अस्थायी था और उसने अब तक अपनी पूरी ताकत से जवाब नहीं दिया है। ईरान के अनुसार, पहले किए गए हमले केवल अमेरिकी ठिकानों तक सीमित थे, लेकिन अब हालात बदल सकते हैं। ट्रंप का सरेंडर और युद्ध की खींच स्रोतों के अनुसार, ट्रंप का यह युद्ध की ओर झुकाव उनकी चीन में हुई कथित “अपमानजनक” स्थिति और ताइवान पर उनके रुख से उपजी खींच का परिणाम हो सकता है। ट्रंप ने हाल ही में ताइवान के मुद्दे पर यह कहकर पीछे हटने के संकेत दिए हैं कि ताइवान अमेरिका से 9,500 मील दूर है जबकि चीन से मात्र 59 मील, और ताइवान ने अमेरिका की चिप इंडस्ट्री चोरी की है। विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान पर चीन के सामने सरेंडर करने के बाद, ट्रंप अपनी छवि सुधारने के लिए ईरान पर हमला कर सकते हैं। क्षेत्रीय समीकरण: यूएई, कुवैत और पाकिस्तान की भूमिका ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कुवैत को भी कड़ी चेतावनी दी है कि वे अपनी जमीन का इस्तेमाल ईरान के दुश्मनों (अमेरिका और इज़राइल) के लिए न होने दें। ईरान का आरोप है कि इन देशों ने अपनी आजादी बेच दी है और दुश्मनों को पनाह दी है। दूसरी ओर, पाकिस्तान की भूमिका काफी दिलचस्प हो गई है। वह एक तरफ सऊदी अरब के करीब है और वहां अपने सैनिक तैनात करता है, लेकिन दूसरी तरफ उसे ईरान के साथ मध्यस्थ (Mediator) के रूप में भी देखा जा रहा है। रिपोर्ट्स तो यहाँ तक कहती हैं कि ईरान ने अपने कुछ लड़ाकू विमानों को सुरक्षित रखने के लिए पाकिस्तानी ठिकानों का उपयोग किया है। भारत पर प्रभाव: महंगाई और विदेश नीति का संकट यह युद्ध केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के लिए भी गंभीर आर्थिक और कूटनीतिक चुनौतियां पैदा करेगा। आर्थिक संकट: युद्ध की आहट मात्र से भारत में पेट्रोल, डीजल और सीएनजी के दाम बढ़ने शुरू हो गए हैं। तेल और गैस की कीमतों में यह वृद्धि भारतीय आम जनजीवन और अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करेगी। विदेश नीति में बदलाव: स्रोतों का दावा है कि भारत की विदेश नीति अब गुटनिरपेक्ष नहीं रही और वह स्पष्ट रूप से अमेरिका और इज़राइल के खेमे में खड़ा दिखाई दे रहा है। भारत द्वारा यूएई पर हुए हमलों की निंदा करना और ईरानी सुप्रीम लीडर की मृत्यु पर कथित चुप्पी ने ईरान के साथ दशकों पुरानी दोस्ती पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऊर्जा सुरक्षा: भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है क्योंकि ईरान पहले भारत को रियायती दरों पर और भारतीय रुपयों में तेल देता था, लेकिन वर्तमान स्थितियों में यह संबंध जटिल हो गए हैं। निष्कर्ष यह है की दुनिया के लिए तबाही का मंजर? यदि न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट सच साबित होती है और अगले सप्ताह अमेरिका और इज़राइल ईरान पर संयुक्त हमला शुरू करते हैं, तो यह आधुनिक इतिहास का सबसे भीषण युद्ध हो सकता है। अमेरिका के पास वर्तमान में मध्य युद्ध क्षेत्र में दो एयरक्राफ्ट कैरियर और एक दर्जन से ज्यादा नेवी डिस्ट्रॉयर तैनात हैं। लेकिन इस बार ईरान भी करो या मरो (Do or Die) की स्थिति में है और वह अपने घातक मिसाइल शस्त्रागार का उपयोग करने से नहीं हिचकिचाएगा। यह युद्ध न केवल अमेरिका और इज़राइल के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी गर्त में धकेल सकता है। दुनिया को अब शांतिपूर्ण कूटनीति की आवश्यकता है, अन्यथा यह “आपदा का दशक” मानवता के लिए भारी पड़ेगा। Kanthak Suryatal Post Views: 884 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation विश्वगुरु होण्याचे स्वप्न आणि अमेरिकन ढाल: भारतीय अर्थव्यवस्थेच्या चिंध्या शाहंच्या लाडक्या उपमंत्र्याचा मवाल्या पुत्र आणि राहुल गांधींचा कडक प्रहार: जेव्हा सत्तेचा माज दिल्लीतून गल्लीत चक्काचूर होतो!