8 मई की तारीख मध्य पूर्व के इतिहास में एक अत्यंत गंभीर मोड़ के रूप में दर्ज की जा रही है। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध जैसी स्थितियाँ एक बार फिर से पैदा हो गई हैं। कल रात भारतीय समयानुसार लगभग 12:00 बजे, ईरान के कई हिस्सों, विशेष रूप से बंदर अब्बास और उसके आसपास के नागरिक इलाकों में बम विस्फोटों और धमाकों की आवाज़ें सुनी गईं। इन धमाकों की पुष्टि ईरानी मीडिया आउटलेट्स जैसे तसनीम न्यूज़ और फार्स न्यूज़ ने की है। शुरुआत में इन हमलों के पीछे इज़राइल का हाथ होने की आशंका जताई गई थी, लेकिन इज़राइल ने आधिकारिक तौर पर इससे इनकार कर दिया। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि ये हमले अमेरिका द्वारा किए गए थे, जिसमें संभवतः संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया गया था,। UAE पर जवाबी कार्रवाई और संघर्ष का विस्तार ईरान पर हुए इन हमलों के जवाब में अब यूएई के ऊपर लगातार हमले हो रहे हैं। यूएई के रक्षा मंत्रालय (MoD) ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि उनके ऊपर हमले किए जा रहे हैं और उनके एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय कर दिया गया है। यद्यपि हमलों के सटीक स्थानों और नुकसान के बारे में वीडियो अभी पूरी तरह सत्यापित नहीं हैं, लेकिन यूएई के रक्षा मंत्रालय का बयान इस बात की पुष्टि करता है कि स्थिति तनावपूर्ण है। यह भी माना जा रहा है कि ईरान ने यूएई को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि अमेरिका ने ईरान पर हमले के लिए यूएई की जमीन और हवाई क्षेत्र का उपयोग किया था। इसके अतिरिक्त, ईरान ने उत्तरी इराक में स्थित अमेरिका समर्थित एक ‘एंटी-ईरान’ मिलिशिया समूह के ठिकानों पर भी हमला किया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: दावों और प्रति-दावों का केंद्र जंग का एक मुख्य मोर्चा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना हुआ है, जहाँ अमेरिका और ईरान के बीच बयानों का युद्ध छिड़ा हुआ है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) का दावा है कि ईरान ने वहां से गुजर रहे तीन अमेरिकी जहाजों पर हमला किया, जिसे अमेरिका ने सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट कर लिया और जहाजों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। इसके विपरीत, ईरान ने कुछ वीडियो जारी किए हैं जिनमें यह दावा किया गया है कि उन्होंने मिसाइलों और ड्रोंस के जरिए अमेरिकी जंगी जहाजों को भागने पर मजबूर कर दिया और उन्हें भारी नुकसान पहुँचाया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य अधिकारी अक्सर अपने नुकसानों को छिपाने की कोशिश करते हैं, जैसा कि पहले न्यूयॉर्क टाइम्स की सैटेलाइट इमेजरी ने दिखाया था कि अमेरिकी बेस पूरी तरह तबाह हो गए थे, जबकि प्रशासन ने इससे इनकार किया था,। वर्तमान स्थिति यह है कि ईरान अब केवल ड्रोंस ही नहीं, बल्कि बैलिस्टिक मिसाइलों का भी इस्तेमाल कर रहा है, जो इस बात का संकेत है कि यह कोई मामूली झड़प नहीं बल्कि एक बड़े युद्ध की शुरुआत हो सकती है। ईरान की सैन्य क्षमता और अरब देशों को चेतावनी सीआईए (CIA) की रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध की शुरुआत में ईरान के पास जितने हथियार थे, उनका 70% हिस्सा अभी भी सुरक्षित है। ईरानी नेतृत्व का दावा है कि उन्होंने अभी तक अपने सबसे खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया है। इसके साथ ही, ईरान ने अन्य अरब मुल्कों को कड़ी चेतावनी दी है। खातम अल-अनबिया के प्रवक्ता इब्राहिम जुल्फकारी ने स्पष्ट किया है कि यदि सऊदी अरब, कुवैत या बहरीन जैसे देश ईरान की मिसाइलों को रोकने (इंटरसेप्ट करने) की कोशिश करेंगे, तो ईरान उन्हें भी अपना दुश्मन मानेगा और उन पर सीधे हमले शुरू कर देगा,। ईरान का रुख साफ है कि जो भी उनके और इज़राइल के बीच आएगा, वह युद्ध का हिस्सा माना जाएगा। आर्थिक प्रभाव और तेल संकट इस तनाव का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। मिडिल ईस्ट की 20 से ज्यादा रिफाइनरियों ने काम करना बंद कर दिया है, जिससे कच्चे तेल के उत्पादन में भारी गिरावट आई है और तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। ईरान ने संकेत दिया है कि यदि अरब मुल्क उसकी सैन्य कार्रवाई में बाधा डालेंगे, तो वह और अधिक रिफाइनरियों को निशाना बनाएगा और गैस उत्पादन को पूरी तरह ब्लॉक कर देगा,। ट्रंप की परमाणु धमकी: वन बिग ग्लो डोनाल्ड ट्रंप का इस संकट के प्रति रवैया बेहद आक्रामक और खतरनाक रहा है। ट्रंप ने दावा किया है कि यह केवल एक छोटी घटना थी और ‘सीजफायर’ (युद्धविराम) अभी भी बरकरार है। हालांकि, उन्होंने ईरान को एक भयावह धमकी देते हुए कहा है कि यदि ईरान समझौते की शर्तों को नहीं मानता है, तो ईरान के अंदर से एक बड़ी चमक (One Big Glow) निकलती हुई दिखाई देगी,। इस बयान को सीधे तौर पर परमाणु हमले की धमकी के रूप में देखा जा रहा है। ईरान ने इस धमकी के जवाब में कहा है कि वे परमाणु हमलों से नहीं डरेंगे और अपनी संप्रभुता के लिए लड़ना जारी रखेंगे। क्षेत्रीय कूटनीति और पाकिस्तान की भूमिका अमेरिका ने ऑपरेशन फ्रीडम शुरू करने का प्रयास किया था, लेकिन सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों ने शुरू में अपने एयरबेस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया था। हालांकि, ताज़ा खबरों के अनुसार सऊदी अरब ने यह प्रतिबंध हटा लिया है। इस पूरे परिदृश्य में पाकिस्तान की स्थिति बहुत ही विचित्र हो गई है। पाकिस्तान खुद को एक पीसमेकर (शांतिदूत) के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सऊदी अरब के साथ उसकी रक्षा संधियां उसे मुश्किल में डाल सकती हैं,। यदि ईरान और सऊदी अरब के बीच सीधी जंग होती है, तो पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखना और सऊदी अरब की मदद करना दोनों एक साथ करना नामुमकिन हो जाएगा,। समाधान की राह में बड़ी बाधाएं वर्तमान में ‘विन-विन’ (win-win) स्थिति की उम्मीद बहुत कम है क्योंकि अमेरिका ऐसी शर्तें लगा रहा है जिन्हें ईरान कभी स्वीकार नहीं करेगा,। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना सारा संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) उसे सौंप दे, जबकि ईरान अपने जमे हुए फंड्स (Frozen Assets) को वापस लेने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से टोल (Toll) वसूलने के अधिकार की मांग कर रहा है। ईरान का कहना है कि जब तक उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिलता, वे जंग से पीछे नहीं हटेंगे। निष्कर्ष कुल मिलाकर, स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। हालांकि कुछ लोग तबरीज के पास आए भूकंप को ईरान के परमाणु परीक्षण से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक सामान्य प्राकृतिक घटना थी। मुख्य चिंता का विषय ट्रंप की धमकियाँ और खाड़ी देशों में फैलती हुई हिंसा है। यदि जल्द ही कोई ठोस कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता, तो दुनिया एक बड़े क्षेत्रीय और शायद वैश्विक युद्ध की ओर बढ़ सकती है। ईरान की आंतरिक स्थिति की बात करें, तो वहां अल्पसंख्यकों (सिख, हिंदू, ईसाई) की स्थिति सुरक्षित बताई जाती है, जो इस बात का संकेत है कि युद्ध की बाहरी धमकियों के बावजूद देश के भीतर सामाजिक ताना-बाना अभी भी मजबूत है,। बहरहाल, आने वाले दिन यह तय करेंगे कि क्या दुनिया इस विनाशकारी युद्ध को टाल पाती है या नहीं। Post Views: 567 Facebook WhatsApp Twitter LinkedIn Post navigation डॉ. ग्रेगरी स्टॅंटन च्या मते नरसंहाराचे १० टप्पे ; भारतासाठी एक गंभीर इशारा तामिळनाडूचा सत्तासंघर्ष: राहुल गांधींची ‘चाणक्य’ नीती आणि सुपरस्टार 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