तमिलनाडु की राजनीति में पिछले 24 घंटों के भीतर एक अभूतपूर्व उठापटक देखने को मिली है, जिसे लोकतंत्र को कुचलने की कोशिशों और जनादेश के अपहरण के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। ताजा घटनाक्रम के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर यह आरोप लग रहे हैं कि वे तमिलनाडु में जन भावनाओं के विपरीत सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के एक कूटनीतिक फैसले ने इस पूरे खेल को पलट दिया है।
लोकतंत्र बनाम सत्ता की भूख
तमिलनाडु के हालिया चुनावी नतीजों के बाद, अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी (टीबीके) सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है, जिसे लगभग 1.72 करोड़ वोट मिले हैं। हालांकि, सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर द्वारा विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में की जा रही देरी को केंद्र के इशारे पर की गई कार्रवाई माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह देरी केवल भाजपा और उसके सहयोगियों को जोड़-तोड़ का समय देने के लिए है। भाजपा की रणनीति पर प्रहार करते हुए स्रोतों में बताया गया है कि जहां भाजपा का फुटप्रिंट शून्य के बराबर है (मात्र एक विधायक 900 वोटों से जीता है), वहां वे जन भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं। यह आरोप लगाया गया है कि भाजपा को सरकारों को हाईजैक करने और ‘जनादेश चोरी’ करने की आदत पड़ चुकी है।
विजय के खिलाफ चौतरफा घेराबंदी
जैसे ही विजय की जीत और उनकी सरकार बनने की संभावनाएं प्रबल हुईं, उनके खिलाफ दमनकारी कार्रवाई शुरू कर दी गई। पिछले 24 घंटों में विजय के घर के बाहर से पूरी सुरक्षा हटा ली गई, जो उन्हें प्रोटोकॉल के तहत मिली हुई थी। इसके अतिरिक्त, टीबीके के कार्यकर्ताओं और स्वयं विजय पर कानूनी शिकंजा कसा जाने लगा है:
- विजय के खिलाफ उनकी फिल्म लियो के राजस्व को छिपाने के आरोप में धोखाधड़ी का मामला दर्ज करने की याचिका पर सुनवाई शुरू हो गई है।
- टीबीके के एक नए चुने गए विधायक पर केक काटने के लिए खंजर (छुपे) का उपयोग करने पर एफआईआर दर्ज की गई है।
- रामनाथपुरम में जश्न मना रहे 12 टीबीके समर्थकों के खिलाफ भी मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
इन कार्रवाइयों को विजय को मानसिक रूप से दबाने और उन्हें केंद्र के साथ समझौता करने के लिए मजबूर करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
एआईएडीएमके और भाजपा की बी-टीम की भूमिका
स्रोतों के अनुसार, भाजपा ने एआईएडीएमके के माध्यम से सत्ता में घुसपैठ की कई कोशिशें कीं। पहले एआईएडीएमके के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से विजय को समर्थन का प्रस्ताव दिया और कहा कि गेंद विजय के पाले में है। जब विजय ने उनके लिए दरवाजे बंद कर दिए, तो भाजपा ने एक और चौंकाने वाला दांव खेला—एआईएडीएमके और उनके धुर विरोधी डीएमके के बीच गठबंधन की खबरें फैलाई गईं। खबरें यहाँ तक आईं कि सुपरस्टार रजनीकांत इस गठबंधन के लिए मध्यस्थता कर रहे हैं। विश्लेषण के अनुसार, रजनीकांत का इस्तेमाल केंद्र द्वारा रिमोट कंट्रोल की स्थिति बनाए रखने के लिए किया जा रहा था। भाजपा किसी भी तरह एआईएडीएमके को सत्ता में लाना चाहती थी ताकि भविष्य में एजेंसियों (ईडी, सीबीआई) के जरिए उन पर नियंत्रण कर तमिलनाडु की सत्ता को दिल्ली से चलाया जा सके।

स्टालिन का ग्रेशियस निर्णय: भाजपा के प्लान पर फिरा पानी
इस पूरे संकट के बीच, सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब एम.के. स्टालिन ने एक अत्यंत परिपक्व राजनीतिक निर्णय लिया। स्टालिन ने स्पष्ट कर दिया कि डीएमके तमिलनाडु में न तो संवैधानिक संकट चाहती है और न ही दोबारा चुनाव। उन्होंने घोषणा की कि वे विजय की टीबीके सरकार बनाने के रास्ते में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे और अगले छह महीनों तक सरकार के कामकाज की निगरानी करेंगे। स्टालिन ने कुछ शर्तें भी रखीं, जैसे डीएमके द्वारा शुरू की गई जनकल्याणकारी योजनाओं (छात्रों के लिए सुबह का भोजन, महिलाओं के अधिकार राशि आदि) को जारी रखा जाए। इस कदम ने भाजपा और एआईएडीएमके के उन सभी प्रयासों को विफल कर दिया जो डीएमके को डराकर या लालच देकर विजय के खिलाफ खड़ा करना चाहते थे।

तमिल अस्मिता और पेरियार की विचारधारा
तमिलनाडु की राजनीति का यह पूरा संघर्ष द्रविड़ियन राजनीति बनाम हिंदुत्व के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, तमिलनाडु में अभी भी पेरियार की विचारधारा ही हावी है, जहां हिंदूवादी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है। विजय के उभरने ने यह साबित कर दिया है कि तमिल जनता अपनी अस्मिता और अपनी पसंद के नेता के साथ खड़ी है। तमिलनाडु की जनता की भावनाओं का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग विजय के शपथ ग्रहण की उम्मीद में स्टेडियमों के बाहर इकट्ठा हो गए और देरी होने पर भावुक होकर रोने लगे। दक्षिण की राजनीति में अपने प्रिय नेताओं के प्रति जो पागलपन जैसी निष्ठा है, वह भाजपा की उत्तर भारतीय राजनीति से बिल्कुल अलग है।
निष्कर्ष
वर्तमान स्थिति यह है कि भाजपा की तोड़फोड़ की राजनीति तमिलनाडु में फिलहाल विफल होती दिख रही है। स्टालिन के समर्थन के बाद अब विजय को राहुल गांधी और कांग्रेस का भी साथ मिल गया है, जिससे उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ होता दिख रहा है। हालांकि, केंद्र द्वारा राज्यपाल के जरिए अड़ंगेबाजी जारी रह सकती है, लेकिन यदि जनमानस सड़क पर उतरा, तो राजभवन (जिसे स्रोत में भाजपा भवन कहा गया है) के लिए स्थिति संभालना मुश्किल हो जाएगा। यह घटनाक्रम न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे देश के लिए राजनीतिक परिपक्वता का एक उदाहरण है, जहां एक सत्ता गंवा चुके नेता (स्टालिन) ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी (विजय) का समर्थन करना बेहतर समझा, बजाय इसके कि वह केंद्र की जोड़-तोड़ वाली राजनीति का हिस्सा बनें।
तमिलनाडू में विजय के घर के सामने जनता पूजा करके हाथ जोड़ रही है

