नाम में बहुत बड़ी शक्ति होती है। वस्तु वही रहती है, उसका आकार भी वही रहता है, लेकिन जब उसका नाम और उद्देश्य बदल जाता है तो उसके प्रति हमारी सोच, भावना और उपयोग का अर्थ भी बदल जाता है। श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज की महान देन तलवार को “कृपाण” का स्वरूप देना केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि हथियार की पूरी सोच और उद्देश्य को बदल देने वाली क्रांतिकारी शिक्षा थी। तलवार को सामान्यतः वार करने और शत्रु को पराजित करने के लिए देखा जाता था; लेकिन गुरु महाराज ने उसे “कृपाण” नाम देकर उसमें कृपा, करुणा, रक्षा और न्याय का भाव स्थापित किया। कृपाण का अर्थ केवल हाथ में धारण किया हुआ शस्त्र नहीं, बल्कि अन्याय के सामने खड़े होने का साहस है। जब किसी दुर्बल, असहाय या निर्दोष पर अत्याचार हो, जब किसी के अधिकार छीने जा रहे हों, जब अन्याय सामने खड़ा हो और कोई उसकी रक्षा करने वाला न हो—तब खालसा केवल तमाशबीन बनकर नहीं रह सकता। कृपाण हमें यह संदेश देती है “शक्ति का उपयोग किसी को दबाने के लिए नहीं, बल्कि दबे हुए को उठाने के लिए करो।” “हाथ में कृपाण हो, पर हृदय में कृपा हो।” यही गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज की महान सोच थी शस्त्र हाथ में हो, लेकिन अहंकार नहीं; साहस हृदय में हो, लेकिन क्रूरता नहीं; शक्ति हो, लेकिन उसका उपयोग न्याय और रक्षा के लिए हो। कृपाण हमें यह भी सिखाती है कि आत्मरक्षा कायरता नहीं और अन्याय सहना विनम्रता नहीं। जहाँ सत्य, सम्मान और मानवता की रक्षा का प्रश्न हो, वहाँ अन्याय के विरुद्ध खड़े होना भी एक प्रकार की सेवा है। इसलिए कृपाण केवल पाँच ककारों में से एक ककार नहीं यह खालसा के चरित्र की पहचान, जिम्मेदारी की याद और मानवता की रक्षा का संकल्प है। आज आवश्यकता है कि हम कृपाण को केवल शरीर पर धारण न करें, बल्कि उसकी भावना को अपने विचारों, व्यवहार और जीवन में भी धारण करें। कृपाण हमें वार करना नहीं, अन्याय पर प्रहार करना सिखाती है; किसी को डराना नहीं, निर्बल को निर्भय बनाना सिखाती है; और शक्ति का प्रदर्शन नहीं, शक्ति का सदुपयोग करना सिखाती है। धन्य हैं श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज, जिन्होंने शस्त्र को भी सेवा, साहस, न्याय और मानवता की रक्षा का प्रतीक बना दिया। “कृपाण हाथ में ही नहीं, कृपा और न्याय हृदय में भी हो यही सच्चे खालसा जीवन की पहचान है।” राजेंद्र सिंघ शाहू मोबाइल: 7700063999 इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड Kanthak Suryatal Post Views: 761 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation कर्तव्याचा वसा आणि शिस्तीचा दरारा: डॉ. नीलाभ रोहन यांचा नांदेडमधील ४३ दिवसांचा प्रवास जन्मदिनी पूर्ण प्रक्रिया हीच शिक्षा ठरते तेव्हा…