ईरान और अमेरिका तनाव: खाड़ी क्षेत्र में महायुद्ध की आहट और 24 अरब डॉलर का गतिरोध
खाड़ी क्षेत्र (Gulf region) से आ रही हालिया खबरें वैश्विक शांति के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं। ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव इस कदर बढ़ गया है कि एक छोटी सी गलती भी एक बड़े क्षेत्रीय या वैश्विक युद्ध की शुरुआत कर सकती है,। सूत्रों के अनुसार, ईरान ने हाल ही में कुवैत और बहरीन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं, जिससे स्थिति और भी गंभीर हो गई है।
ताजा सैन्य झड़पें और मिसाइल हमले
ताजा घटनाक्रम में, अलजजीरा और अन्य अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज के अनुसार, ईरान ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी बेसिस को निशाना बनाया है। विशेष रूप से बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट (Fifth Fleet) पर यह दूसरा बड़ा हमला बताया जा रहा है। इससे पहले कुवैत के टर्मिनल वन पर भी ड्रोन हमले की खबरें आई थीं। हालांकि, ईरान का दावा है कि वह केवल सैन्य ठिकानों को निशाना बनाता है और नागरिक क्षेत्रों (civilian areas) पर हमला करने में विश्वास नहीं रखता,। ईरान की इस कार्रवाई को अमेरिका द्वारा ईरानी ड्रोंस और रडार ठिकानों पर किए गए हमलों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी सेना का दावा है कि उसने हॉर्मोज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की ओर भेजे गए ईरान के चार ड्रोंस को मार गिराया और ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित कैश द्वीप (Kish Island) और गोरख में तटीय निगरानी रडार ठिकानों पर हमला किया।
मिसाइल दागने का दावा और जवाबी कार्रवाई
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि उन्होंने दुश्मन के ठिकानों पर एरोस्पेस मिसाइलों से निशाना साधा है। अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी तसनीम के अनुसार, यह हमला इलाके में मौजूद दुश्मन के ठिकानों पर किया गया था। दूसरी ओर, अमेरिकी सेना का कहना है कि ईरान ने सात मिसाइलें दागी थीं, लेकिन उनमें से कोई भी अपने निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी। ईरान की नौसेना ने यह भी दावा किया है कि उसने ओमान की खाड़ी में अमेरिकी जहाजों पर चेतावनी के तौर पर फायरिंग की थी, क्योंकि वे क्षेत्र में अन्य जहाजों को परेशान कर रहे थे। हालांकि, अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड ने इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
24 अरब डॉलर का आर्थिक गतिरोध: युद्ध की असली वजह?
इस पूरे सैन्य तनाव के पीछे एक गहरा आर्थिक कारण भी छिपा है। ईरान के सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) के सैन्य सलाहकार, मोहसिन रजाई (Mohsin Rezaee) के अनुसार, पूरा मामला 24 अरब डॉलर की रुकी हुई संपत्ति (frozen assets) पर अटका हुआ है। ईरान का कहना है कि अगर इस मुद्दे का समाधान नहीं निकाला गया, तो एक बड़ी जंग शुरू हो सकती है। ईरान की मांग है कि अमेरिका के साथ किसी भी अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर होते ही उसके 12 अरब डॉलर के जमे हुए फंड तुरंत जारी किए जाएं और अगले चरण में शेष 12 अरब डॉलर जारी किए जाएं। ईरान का तर्क है कि उसे यह पैसा अपनी जनता और आर्थिक जरूरतों के लिए चाहिए। हालांकि, अमेरिका (विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन) इसे ब्लैकमेल के तौर पर देख रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि अगर ये फंड अभी जारी कर दिए गए, तो ईरान पर दबाव बनाने का उनका सबसे बड़ा हथियार (leverage) खत्म हो जाएगा। ट्रंप चाहते हैं कि कोई भी नया समझौता 2015 के परमाणु समझौते से कहीं अधिक सख्त हो। वे इसे ईरान को सीधे नकद देने के रूप में नहीं देखना चाहते, जिसकी आलोचना वे पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की नीतियों के संदर्भ में अक्सर करते रहे हैं,।
युद्ध का विस्तार: हिंद महासागर से भूमध्य सागर तक
ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका दोबारा युद्ध शुरू करता है, तो यह केवल फारस की खाड़ी या हॉर्मोज जलडमरूमध्य तक सीमित नहीं रहेगा। मोहसिन रजाई ने स्पष्ट किया है कि ईरानी सैन्य कार्रवाई हिंद महासागर, बाब अल-मंडेब (Bab al-Mandab), लाल सागर (Red Sea) और भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) तक फैल सकती है। ईरान ने धमकी दी है कि वह अब तक अछूते रहे अन्य अमेरिकी ठिकानों को भी निशाना बनाएगा। विशेष रूप से, हॉर्मोज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा है। दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अपने तेल और गैस निर्यात के लिए इसी रास्ते पर निर्भर है। यदि यह जलमार्ग बंद होता है, तो वैश्विक तेल संकट पैदा होना निश्चित है। इसके अलावा, हूती विद्रोहियों ने भी बाब अल-मंडेब को बंद करने की चेतावनी दी है, जो वैश्विक व्यापार के लिए एक और महत्वपूर्ण मार्ग है।
क्षेत्रीय राजनीति और इजरायल की भूमिका
इस तनावपूर्ण स्थिति में इजरायल की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सूत्रों के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और वहां का नेतृत्व (बेंजामिन नेतन्याहू) किसी भी प्रकार के सीजफायर के पक्ष में नहीं दिखते। ईरान का मानना है कि इजरायल इस मौके की तलाश में है कि मामला और बिगड़े और युद्ध की स्थिति पैदा हो। IRGC ने अपने बयानों में इजरायल और अमेरिका को बच्चों का हत्यारा बताते हुए चेतावनी दी है कि यदि और हमले हुए, तो उनका जवाब और भी व्यापक होगा。
लेबनान का मुद्दा और बारगेनिंग चिप
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची (Abbas Araghchi) ने उन दावों को खारिज किया है जिनमें कहा गया था कि ईरान लेबनान को अमेरिका के साथ बातचीत में ‘बारगेनिंग चिप’ (bargaining chip) के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ आउन (Joseph Aoun) द्वारा लगाए गए इन आरोपों पर ईरान का कहना है कि वह शांति समझौते में लेबनान का जिक्र जरूर चाहता है, लेकिन वह उसे सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल नहीं कर रहा है।
भारत पर प्रभाव और वैश्विक चिंताएं
खाड़ी क्षेत्र का यह तनाव केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। हिंद महासागर की निकटता के कारण भारत पर भी इसका सीधा असर पड़ना तय है,। तेल की कीमतों में वृद्धि और समुद्री व्यापार मार्गों में असुरक्षा भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर से झड़प की ओर बढ़ता यह सफर कभी भी एक विनाशकारी युद्ध में तब्दील हो सकता है। ईरान का धैर्य खत्म हो रहा है और अमेरिकी प्रशासन अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इस 24 अरब डॉलर के गतिरोध को तोड़ पाती है या दुनिया एक और बड़े युद्ध की गवाह बनेगी।
