वर्तमान में वैश्विक परिदृश्य युद्ध और हमलों की खबरों से दहला हुआ है, जहाँ एक साथ कई देशों में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। यमन में अमेरिका के एम 9 रीपर (MQ-9 Reaper) ड्रोन को मार गिराया गया है, सऊदी अरब पर ड्रोन हमले हुए हैं और रूस के भीतर भी लगभग ६०० ड्रोन के माध्यम से हमला किया गया है। इन घटनाओं ने न केवल मध्य पूर्व बल्कि यूरोप में भी अशांति का माहौल पैदा कर दिया है। इन युद्धों से जुड़ी खबरें विदेशी और अंग्रेजी समाचार पत्रों के दावों के आधार पर सामने आ रही हैं,जिनमें युद्ध की विभीषिका और मानवीय संकट की आशंका जताई जा रही है।
सऊदी अरब पर हमला और क्षेत्रीय अस्थिरता
जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब को तीन ड्रोन के माध्यम से निशाना बनाया गया है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि ये हमले इराक के भीतर से हुए हैं। इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के परमाणु संयंत्र पर भी हमले की खबर सामने आई हैं। हालांकि इराक या ईरान की ओर से इन हमलों की आधिकारिक जिम्मेदारी नहीं ली गई है, लेकिन यह आशंका जताई जा रही है कि इराक में मौजूद मिलिशिया समूहों ने इन हमलों को अंजाम दिया होगा। सऊदी अरब ने अपने ऊपर हुए हमलों की पुष्टि की है, लेकिन हमलावर की पहचान अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है। यह स्थिति मध्य पूर्व में एक ऐसी चाल की ओर इशारा करती है जहाँ मुस्लिम देशों के बीच आपसी आग भड़काने की कोशिश की जा रही है। विशेष रूप से सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अमेरिका के करीबी माने जाते हैं, और उनके सुल्तान एयरबेस पर पूर्व में हुए हमलों के कारण सऊदी अरब ने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की बात कही थी।

पाकिस्तान की सैन्य भूमिका और मध्यस्थता
इस संकट के बीच पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। रॉयटर्स और हिंदी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अपने ८००० सैनिकों का एक बड़ा जत्था सऊदी अरब में तैनात कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए जेएफ-१७ (JF-17) फाइटर जेट्स का एक स्क्वाड्रन, ड्रोन स्क्वाड और एक अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी भेजा है, जिसका पूरा खर्च सऊदी सरकार उठाएगी। पाकिस्तान एक तरफ जहाँ रियाद के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह ईरान और अमेरिका के बीच एक मध्यस्थ के रूप में भी कार्य कर रहा है। यह सैन्य तैनाती आपसी रक्षा समझौते के तहत की गई है, जो इस क्षेत्र में इस्लामाबाद और रियाद के बढ़ते रणनीतिक संबंधों को दर्शाती है।
यमन और रूस-यूक्रेन संघर्ष की आग
यमन के एयरस्पेस में एक अमेरिकी एमक्यू-९ (MQ-9) ड्रोन को मार गिराने की तस्वीर यमनी मिलिट्री द्वारा जारी की गई है। हुती विद्रोहियों के नियंत्रण वाले क्षेत्र में इस ड्रोन को नष्ट किया गया और यमनी मिलिट्री ने चेतावनी दी है कि उनके लोगों के खिलाफ किसी भी अमेरिकी दुस्साहस का कड़ा जवाब दिया जाएगा। यह घटना दिखाती है कि युद्ध का दायरा केवल जमीनी नहीं बल्कि हवाई हमलों और ड्रोन तकनीक तक फैल चुका है। दूसरी ओर, रूस की राजधानी मॉस्को पर यूक्रेन ने ६०० से अधिक ड्रोन से हमला किया है, जिसकी जिम्मेदारी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ली है। मॉस्को के भीतर आगजनी की तस्वीरें दुनिया को विचलित कर रही हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि मध्य पूर्व के साथ-साथ यूरोप भी युद्ध की आग में झुलस रहा है।
ईरान-अमेरिका गतिरोध और युद्ध की आहट
न्यूयॉर्क टाइम्स और क्लैश रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल के अधिकारी ईरान पर हमला करने के लिए गहन सैन्य तैयारियां कर रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि इसी सप्ताह ईरान पर हमले फिर से शुरू हो सकते हैं। इस बीच, तसनीम न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ईरान और अमेरिका के बीच मतभेद अभी भी अनसुलझे हैं। ईरान अपनी शर्तों पर अडिग है, जिसमें संघर्ष समाप्ति, जब्त संपत्तियों की वापसी और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के लिए मुआवजे की मांग शामिल है। ईरान ने अपनी परमाणु प्रतिबद्धताओं को किसी भी शांति समझौते से जोड़ने से इनकार कर दिया है और अमेरिकी मांगों को राजनीतिक बहाना करार दिया है। ईरान का स्पष्ट संदेश है कि वह अमेरिका के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं है। पूर्व आईआरजीसी कमांडर रजाई ने तो यहाँ तक चेतावनी दी है कि यदि अमेरिकी सेना ओमान सागर की ओर बढ़ती है, तो ईरान उसे अमेरिकी सेना का कब्रिस्तान बना देगा।
अमेरिका में घरेलू राजनीति और युद्ध का प्रभाव
युद्ध के इन बादलों के बीच अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स और सीएनए कॉलेज के सर्वे के अनुसार, ६३% अमेरिकी लोग डोनाल्ड ट्रंप को नापसंद कर रहे हैं और उनकी लोकप्रियता घटकर ३७% रह गई है। सर्वे के अनुसार, दो-तिहाई अमेरिकी मानते हैं कि ट्रंप का ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने का फैसला गलत था, क्योंकि इस युद्ध की कीमत इसके फायदों से कहीं अधिक रही है। इसके अलावा, ६४% लोग महंगाई और अर्थव्यवस्था को संभालने में ट्रंप की विफलता से नाराज हैं। इस कारण आगामी मिड टर्म चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि निर्दलीय मतदाता भी ट्रंप से दूर हो रहे हैं।
मध्य पूर्व का नया भू-राजनीतिक मानचित्र: व्यापार बनाम गैरत
स्रोतों के विश्लेषण से पता चलता है कि मध्य पूर्व के भीतर अमेरिका ने एक बड़ा कूटनीतिक बदलाव किया है। यूएई अब मुस्लिम बिरादरी से अलग होकर अमेरिका के पाले में पूरी तरह खड़ा दिखाई दे रहा है और आगामी हमलों की स्थिति में वह ईरान के खिलाफ सक्रिय युद्ध में नजर आ सकता है। इसी तरह सऊदी अरब भी पहले की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएगा। इस बदलाव का मुख्य कारण धर्म या जाति नहीं, बल्कि केवल ‘बिजनेस’ और अर्थव्यवस्था है। कुवैत, बहरीन, कतर और यूएई जैसे देश पर्शियन गल्फ और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए अपना तेल बाजार में भेजते हैं। इन देशों की रोजी-रोटी तेल पर टिकी है, इसलिए वे किसी भी कीमत पर इस मार्ग को खुला रखना चाहते हैं।
ईरान जहाँ मुस्लिम एकता, संप्रभुता और ब्रदरहुड की बात करता है, वहीं यूएई, कतर और बहरीन जैसे देश पैसे और अपनी अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता दे रहे हैं। ईरान का मानना है कि फिलिस्तीन और इस क्षेत्र के मान-सम्मान के लिए झुकना नहीं चाहिए, जबकि बाकी देश अमेरिका के एयरबेस को अपने यहाँ पनाह देकर सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करना चाहते हैं। ईरान को इस बात की परवाह नहीं है कि ये देश उसका साथ देंगे या नहीं, क्योंकि उसके पीछे चीन और रूस जैसी महाशक्तियाँ खड़ी हैं। चीन और रूस के समर्थन से ईरान लंबे समय तक अमेरिका का मुकाबला करने की क्षमता रखता है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और वीरता का महत्व
इतिहास गवाह है कि नाम हमेशा उन्हीं का दर्ज होता है जिन्होंने अपनी संप्रभुता और गैरत के लिए लड़ाई लड़ी, न कि उनका जो केवल पैसा बनाने के लिए दूसरों की जी-हुजूरी करते रहे। स्रोतों में ईरान की तुलना उन ऐतिहासिक नायकों से की गई है जिन्होंने कभी सिर नहीं झुकाया। उदाहरण के तौर पर सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, गांधी, मंगल पांडे और रानी लक्ष्मीबाई के नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे गए हैं क्योंकि उन्होंने बहादुरी दिखाई, न कि केवल हवेली बनाने या धनाढ्य बनने के लिए घुटने टेके।
सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों को यह समझना चाहिए कि उनके पास तेल के कुएं होने के कारण ही अमेरिका उन्हें पूछ रहा है। आज अमेरिका ईरान को कमजोर करके उसका तेल लूटना चाहता है, लेकिन कल जब ये देश कमजोर होंगे, तो लुटेरा उन्हें भी नहीं बख्शेगा। एक लुटेरा केवल सोना देखता है, वह यह नहीं देखता कि वह किसके गले में है। इसलिए, अन्य मुस्लिम देशों को ईरान के खिलाफ जाने से पहले यह सोचना चाहिए कि उनके अपने घर भी शीशे के ही हैं।
निष्कर्ष: कूटनीति और भविष्य की अनिश्चितता
मौजूदा कूटनीति केवल इस बात पर टिकी है कि हमारी सबसे बनती रहे। लेकिन जो सबका होने का ढोंग करता है, वह वास्तव में किसी का नहीं होता। १९६८-७० के दौर में जब सभी मुस्लिम देश इजराइल के खिलाफ एकजुट होकर लड़े थे और हार गए थे, उसके बाद से इस क्षेत्र में एकता का अभाव हो गया है और हर कोई अपना व्यक्तिगत आर्थिक हित तलाश रहा है। वर्तमान में मध्य पूर्व में धमाके और हमले फिर से शुरू हो गए हैं, और हालांकि कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहा है, लेकिन चेतावनियाँ स्पष्ट हैं कि जंग कभी भी एक भीषण रूप ले सकती है। ईरान अपनी गैरत और इज्जत बचाने की लाइन पर अडिग है, जबकि बाकी क्षेत्र व्यापार और सुरक्षा के बीच झूल रहा है। भविष्य में यह संघर्ष क्या मोड़ लेगा, यह वैश्विक महाशक्तियों की चालों और क्षेत्रीय देशों की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।
