वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका की स्थिति उस स्वघोषित विश्वगुरु की तरह हो गई है, जो अपनी ही बुनी हुई बिसात पर खुद मात खाता नजर आ रहा है। हालिया घटनाक्रम, विशेषकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा और उसके बाद ईरान के प्रति उनके बदले हुए सुर, इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं कि दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही,। जो अमेरिका कल तक प्रतिबंधों और युद्ध की धमकियों की भाषा बोलता था, वह आज समझौते की मेज तलाश रहा है,। यह बदलाव किसी हृदय परिवर्तन का परिणाम नहीं, बल्कि उस विवशता की उपज है जहाँ सुपर पावर का अहंकार, आर्थिक हकीकत और घरेलू राजनीति के पैरों तले कुचला जा रहा है।
चीन की चूड़ी और ट्रम्प का समर्पण
सूत्र बताते हैं कि चीन से लौटने के बाद मिस्टर ट्रम्प का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। वह ट्रम्प, जो ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा बुलंद करते थे, शी जिनपिंग के सामने कुछ इस तरह ‘सरेंडर’ नजर आए कि उनकी पूरी बॉडी लैंग्वेज किसी हारे हुए सिपाही जैसी लग रही थी,। कटाक्ष यह है कि जो देश पूरी दुनिया को लोकतंत्र और संप्रभुता का पाठ पढ़ाता है, आज उसकी विदेश नीति की लगाम बीजिंग के हाथों में नजर आ रही है। चीन ने जिस तरह से ट्रम्प की चूड़ी कसी है, उसका नतीजा यह है कि अमेरिका अब ईरान को वे रियायतें देने पर विचार कर रहा है, जिनके बारे में वह कल तक सुनना भी नहीं चाहता था,। ईरान की खरबों डॉलर की संपत्तियां, जिन्हें अमेरिका ने ‘दादागिरी’ दिखाते हुए फ्रीज कर रखा था, अब उन्हें रिलीज करने की बात हो रही है,। इतना ही नहीं, ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार पर तेल बेचने की अनुमति देने की भी सुगबुगाहट है। यह अमेरिकी कूटनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है एक तरफ आप दुश्मन घोषित करते हैं और दूसरी तरफ आर्थिक दबाव में आकर उसी के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो जाते हैं।
आर्थिक ऑक्सीजन और $200 का खौफ
विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा हमेशा से अमेरिका की वॉर-मंगरिंग यानी युद्धोन्माद रहा है। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। अमेरिका की अपनी अर्थव्यवस्था अब उस मोड़ पर है जहाँ उसे ऑक्सीजन के लिए चीन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर रहना पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, अमेरिका चीन के सस्ते कंज्यूमर गुड्स के बिना चल ही नहीं सकता। यदि वह ईरान से युद्ध की जिद पर अड़ा रहता, तो तेल की कीमतें $200 प्रति बैरल तक पहुँच सकती थीं, जो अमेरिकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी कयामत से कम नहीं होता,। बाबल,मंदाब और हॉर्मोस की खाड़ी का बंद होना केवल व्यापारिक संकट नहीं, बल्कि अमेरिका के अजेय होने के भ्रम का टूटना है,। शांति की बातें अब इसलिए नहीं हो रही हैं कि अमेरिका को मानवता से प्रेम हो गया है, बल्कि इसलिए हो रही हैं क्योंकि युद्ध अब उसके लिए बहुत महंगा सौदा साबित हो रहा है।
घरेलू राजनीति और कुर्सी का मोह
अमेरिका के इस यू-टर्न के पीछे एक बड़ा कारण वहां की घरेलू राजनीति और कुर्सी का डर भी है। नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों ने ट्रम्प की रातों की नींद हराम कर दी है,। अमेरिका में घरेलू महंगाई (Household Inflation) आसमान छू रही है और आम अमेरिकी नागरिक, यहाँ तक कि ट्रम्प के अपने समर्थक भी, युद्ध की कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के एक ओपिनियन पोल के अनुसार, 64% अमेरिकियों का मानना है कि ईरान के साथ युद्ध का फैसला गलत था,। यह विडंबना ही है कि जो नेता पूरी दुनिया में बदलाव लाने का दावा करते हैं, वे खुद अपने देश में महाभियोग (Impeachment) और सत्ता खोने के डर से कांप रहे हैं,। शांति की यह अचानक खोज दरअसल अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की एक हताश कोशिश है। कुर्सी बचाने के लिए ट्रम्प अब पाकिस्तान के माध्यम से ईरान को पैगाम भेज रहे हैं और संशोधित प्रस्तावों पर सहमति जता रहे हैं। यह उस महाशक्ति की स्थिति है जो कल तक किसी की नहीं सुनती थी।

विश्व शांति: मजबूरी या संकल्प?
सच्ची विश्व शांति तब आती है जब राष्ट्र एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करें, न कि तब जब वे आर्थिक दबाव में आकर समझौता करें। ईरान के मामले में भी यही दिख रहा है। ईरान आज एडवांटेज की स्थिति में है,। वह केवल संपत्तियों की बहाली नहीं, बल्कि पूर्ण सैन्य घेराबंदी (Naval Blockade) हटाने और बराबरी के स्तर पर बातचीत की मांग कर रहा है,। शांति का मार्ग हॉर्मोस की खाड़ी में युद्धपोतों को तैनात करने से नहीं, बल्कि कूटनीति और आपसी संवाद से प्रशस्त होता है। लेकिन अमेरिका की समस्या यह है कि वह हमेशा इजरायल लॉबी और वॉर लॉबी के दबाव में रहता है। एक तरफ चीन और रूस का बढ़ता प्रभाव है, तो दूसरी तरफ इजरायल का दबाव। इस खींचतान में शांति अक्सर हाशिए पर चली जाती है।
निष्कर्ष: क्या यह स्थायी शांति है?
अंत में, यह कहना कठिन है कि ट्रम्प का यह नरम व्यवहार स्थायी है या नहीं। जैसा कि सूत्रों में उल्लेख किया गया है, ट्रम्प के दिमाग को समझना किसी न्यूरोलॉजिस्ट के बस की बात भी नहीं है; वह आज जो कहते हैं, कल उससे पलट सकते हैं। लेकिन एक बात साफ है दुनिया अब अमेरिका की शर्तों पर चलने को तैयार नहीं है। यदि वास्तव में विश्व शांति स्थापित करनी है, तो अमेरिका को अपनी पुलिसमैन वाली छवि छोड़नी होगी। उसे यह समझना होगा कि वैश्विक स्थिरता किसी एक देश की सनक से नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी से आती है। आज चीन और रूस की रजामंदी के बिना मध्य पूर्व का मसला हल होना असंभव लग रहा है,। अमेरिका पर कटाक्ष यह है कि वह शांति का दूत तब बनता है जब उसकी अपनी जेब खाली होने लगती है और उसकी कुर्सी डगमगाने लगती है। वास्तविक शांति के लिए भय नहीं, भाव की आवश्यकता है। यदि ट्रम्प और ईरान के सर्वोच्च नेता एक मेज पर बैठते भी हैं, तो उसमें चीन और रूस की भूमिका अहम होगी,। यह बदलते विश्व क्रम की हकीकत है, जहाँ अंकल सैम की पुरानी धौंस अब बेअसर हो चुकी है। दुनिया को युद्ध नहीं, विकास चाहिए; प्रतिबंध नहीं, व्यापार चाहिए; और सबसे महत्वपूर्ण, अहंकार नहीं, अमन चाहिए।
