वाह! क्या मंजर है। दुनिया की इकलौती महाशक्ति होने का गुमान और सीने पर जीत का तमगा लटकाए अमेरिकी राष्ट्रपति जब अपने एयरफोर्स वन की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तो शायद उन्हें लग रहा होगा कि वे दुनिया के नए सिकंदर हैं। लेकिन किस्मत का खेल तो देखिए, जैसे ही विमान के पहिए जमीन से ऊपर उठे, नीचे उनकी अपनी ही खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) ने उनके दावों की ऐसी हवा निकाली कि ट्रंप साहब के तोते उड़ना तो छोटी बात है, पूरी दुनिया में उनकी रणनीतिक समझ का तमाशा बन गया। सफेद झूठ और सफेद घर (वाइट हाउस) अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके रक्षा मंत्री पिछले कई हफ्तों से अमेरिकी कांग्रेस और वाइट हाउस के गलियारों में सीना तानकर बता रहे थे कि उन्होंने ईरान को नेस्तानाबूत कर दिया है। उनके मुताबिक, ईरान का मिसाइल प्रोग्राम अब इतिहास की किताबों का हिस्सा है और उनका परमाणु सपना राख बन चुका है। लेकिन सीआईए की रिपोर्ट ने इस ‘महाशक्तिशाली’ गुब्बारे में पिन चुभो दी। रिपोर्ट कहती है कि जिस जमीन पर जीत के झंडे गाड़ने का दावा किया जा रहा था, उस जमीन का कोई वजूद ही नहीं है। यानी ईरान हारा नहीं है, वह तो शायद अमेरिकी दावों पर अपनी गुफाओं में बैठकर हंस रहा है। 38 दिनों का महान युद्ध और ईरान की छुट्टियां इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि कोई देश युद्ध में कूदा और सिर्फ 38 दिनों बाद खुद ही सीजफायर का ऐलान कर दिया। शायद अमेरिका को लगा कि ईरान के लोग उनकी बमबारी से इतने डर गए होंगे कि वे हाथ जोड़कर खड़े होंगे। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। इस सीजफायर को ईरान ने ‘समर वेकेशन’ की तरह इस्तेमाल किया। सूत्रों के अनुसार, जिन 42 जगहों पर ईरान के मिसाइल प्रोग्राम चल रहे थे, उनमें से 70% दोबारा सक्रिय हो चुके हैं। अमेरिका कहता रहा कि हमने सब खत्म कर दिया, और ईरान ने 90% भूमिगत मिसाइल भंडारों तक अपनी पहुंच फिर से बना ली। इसे कहते हैं असली रणनीतिक जीत बस फर्क इतना है कि यह जीत वाशिंगटन की नहीं, तेहरान की है। होर्मुज की जलधारा और निशाने पर अमेरिकी जहाज अमेरिका का दावा था कि उसने होर्मुज रूट को सुरक्षित और मुक्त करा लिया है। लेकिन हकीकत यह है कि वहां मौजूद 33 मिसाइल स्थलों में से 30 पूरी तरह से चालू हो चुके हैं। क्रांतिकारी गार्ड्स (Revolutionary Guards) वहां अपनी मिसाइलें ताने खड़े हैं और अमेरिकी युद्धपोतों का इंतजार कर रहे हैं। सीआईए की रिपोर्ट तो यहां तक कहती है कि ईरान के पास अब मोबाइल लॉन्चर्स हैं, जिन्हें वह जब चाहे, जहां चाहे ले जा सकता है। यानी अमेरिकी जहाज वहां से गुजरें तो वे सुरक्षित नहीं, बल्कि सिटिंग डक (आसान निशाना) बनकर गुजरेंगे। क्या शानदार रणनीति है! आप दुश्मन को मारने निकले थे और खुद ही उसके सीधे निशाने पर आ गए। चीन यात्रा: जीत का तमगा या हार का बोझ? जब अमेरिकी राष्ट्रपति चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने जा रहे हैं, तो उनके हाथ में जीत का कोई पत्ता नहीं है। वे ट्रेड डील, टैरिफ और रेयर अर्थ मिनरल्स पर बात करना चाहते हैं, लेकिन उनकी मेज पर ईरान का वह भूत खड़ा है जिसे वे मार गिराने का दावा कर रहे थे। मजेदार बात यह है कि एक तरफ अमेरिका ताइवान को 11 बिलियन डॉलर के हथियार बेचकर चीन को आंख दिखा रहा है, और दूसरी तरफ वह चाहता है कि चीन ईरान को उसके सामने झुकने के लिए मनाए। यह तो वही बात हुई कि आप किसी के घर में आग लगाएं और फिर उसी से उम्मीद करें कि वह आपके लिए चाय बनाए। ब्रिक्स और डॉलर का गिरता बाजार जब ट्रंप चीन में अपनी ‘आर्थिक सफलता’ के किस्से सुना रहे होंगे, ठीक उसी समय दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) देशों के विदेश मंत्री एक वैकल्पिक मुद्रा यानी डॉलर के विकल्प पर चर्चा कर रहे होंगे। दुनिया के अधिकांश देश अब अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते करने से कतरा रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अमेरिका की ‘सुरक्षा गारंटी’ की एक्सपायरी डेट अब कभी भी आ सकती है। नाटो (NATO) और यूरोपीय देश भी अब धीरे-धीरे अमेरिका के इस अंतहीन ईरान वार से किनारा कर रहे हैं। अमेरिका अब दुनिया को ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस से निकालने का वादा तो करता है, लेकिन उसके पास खुद के पास कोई ठोस प्रोग्राम नहीं है। निष्कर्ष: एक नई दुनिया का आगाज कुल मिलाकर, सीआईए की यह रिपोर्ट केवल एक कागजी दस्तावेज नहीं है, बल्कि अमेरिकी अहंकार का ‘पोस्टमार्टम’ है। जो अमेरिका 28 फरवरी से पहले खुद को सर्वेसर्वा समझ रहा था, आज वह अपनी ही खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के सामने बेनकाब खड़ा है। ईरान एक नए ‘सुपरपावर’ के रूप में उभर रहा है, जिसे न तो इजराइल की मदद से दबाया जा सका और न ही अमेरिकी पाबंदियों से। अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति की चीन यात्रा शायद इतिहास की सबसे ‘मजाकिया’ यात्राओं में से एक साबित होगी, जहां वे गोल्डन एज का सपना बेचेंगे और दुनिया उनके पीछे खड़े ईरान के मिसाइल बंकरों को देख रही होगी। अमेरिका के लिए अब सवाल यह नहीं है कि वह ईरान को कैसे हराएगा, बल्कि सवाल यह है कि वह अपनी बची-कुची साख को कैसे बचाएगा। बहुत-बहुत शुक्रिया, अंकल सैम, इस मनोरंजन के लिए! Kanthak Suryatal Post Views: 677 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation बेटी बचाओ बेटी पढाओ,नारी वंदनचा ढोल आणि सत्तेचा नंगानाच: केंद्रीय मंत्र्यांच्या पुत्राचे पोक्सो कांड आणि मोदींचे मौन! अब ऑपरेशन स्लेज हैमर: अमेरिका की युद्धनीति और कानून को दरकिनार करने वाली चालबाजी