यह केवल कानून बदलने का विषय नहीं, बल्कि सचखंड श्री हजूर साहिब की ऐतिहासिक मर्यादा, परंपरा और विरासत की रक्षा का प्रश्न है।
आज यह कहा जा रहा है कि पूरे महाराष्ट्र के सिक्ख समाज को प्रतिनिधित्व देने के लिए सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड अधिनियम, 1956 में परिवर्तन किया जाए। यह विचार सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन इस विषय का निर्णय केवल प्रतिनिधित्व के आधार पर नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और धार्मिक मर्यादा को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
सबसे पहला और महत्वपूर्ण कारण…
सचखंड श्री हजूर साहिब, नांदेड़, मराठवाड़ा और तेलंगाना क्षेत्र के हजूरी सिक्ख परिवार सदियों से गुरु घर की सेवा, परंपराओं और हजूरी मर्यादा के संरक्षक रहे हैं। इस क्षेत्र में अमृतपान की परंपरा अत्यंत मजबूत और व्यापक रही है। परिवारों में बचपन से ही गुरु की मर्यादा, रहित और सेवा का संस्कार दिया जाता है, और बड़ी संख्या में स्त्री-पुरुष अमृतधारी जीवन को गुरु साहिब की देन और अपना सौभाग्य मानते हैं।
दूसरी ओर, महाराष्ट्र के अन्य भागों में सिक्ख समाज का इतिहास, सामाजिक परिस्थितियाँ और धार्मिक परंपराएँ अलग-अलग रही हैं। यह किसी की श्रद्धा या समर्पण पर प्रश्न नहीं है, बल्कि विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम है। इसीलिए अनेक श्रद्धालुओं का मानना है कि जिस ऐतिहासिक तख्त की अपनी विशिष्ट हजूरी मर्यादा, परंपरा और धार्मिक व्यवस्था है, उसके प्रबंधन में उन लोगों की प्रमुख भूमिका बनी रहनी चाहिए जो पीढ़ियों से इस परंपरा को जीते और निभाते आए हैं।
प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है—ऐतिहासिक मर्यादा की निरंतरता।
सचखंड श्री हजूर साहिब केवल एक गुरुद्वारा नहीं, बल्कि करोड़ों सिक्खों की आस्था का केंद्र और गुरु गोबिंद सिंघ जी की पावन स्मृति का जीवंत प्रतीक है। इसकी परंपराओं की रक्षा करना हम सभी का साझा दायित्व है।
क्रमशः… भाग – 2 में
“क्या ऐतिहासिक गुरुद्वारों के प्रबंधन में केवल प्रतिनिधित्व पर्याप्त है, या हजूरी मर्यादा, रहित और परंपराओं का गहरा अनुभव भी अनिवार्य होना चाहिए?”
✍️ राजेंद्र सिंघ शाहू
प्रोफेशनल इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर, नांदेड
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