निहंग सिंघों की परंपरा में एक विशेष प्रकार की बोल-चाल प्रचलित रही है, जिसमें साधारण वस्तुओं को भी सम्मान, उत्साह और सकारात्मकता के साथ संबोधित किया जाता है। यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन को चढ़दी कला में जीने की एक सुंदर सोच है। जैसे .. चने को बादाम कहना प्याज़ को सफेद सेब कहना लहसुन को सफेद इलायची कहना पानी को अमृत कहना रोटी को प्रसादा कहना इन शब्दों के पीछे संदेश यह है कि जीवन में जो भी परमात्मा की बख्शिश के रूप में प्राप्त हो, उसे सम्मान, संतोष और खुशी के साथ स्वीकार किया जाए। निहंग सिंघों की यह सोच हमें सिखाती है कि .. परिस्थितियाँ नहीं, दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है। अभाव में भी प्रसन्न रहना ही चढ़दी कला है। साधारण वस्तु का भी सम्मान करना चाहिए। शिकायत करने से नहीं, शुक्राना करने से मन मजबूत होता है। सकारात्मक सोच साधारण चीज़ों को भी अनमोल बना देती है। आज के समय में जब लोग छोटी-छोटी बातों से निराश हो जाते हैं, तब निहंग सिंघों की यह प्रेरणादायी परंपरा हमें याद दिलाती है कि खुश रहने के लिए धन-दौलत से अधिक आवश्यक एक अच्छा और संतुष्ट मन है। जिसे दुनिया चना समझती है, चढ़दी कला वाला उसे बादाम समझकर खाता है। क्योंकि ताकत वस्तु में नहीं, सोच में होती है। वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह। – राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 642 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation शीख आणि सरकारची भूमिका;महाराष्ट्र सरकारला शीख समाजाच्या वतीने एक स्पष्ट, ठाम आणि कळकळीची विनंती. महाराष्ट्र सरकार, जनप्रतिनिधियों, नांदेड की जनता, पत्रकार भाई एवं देशवासियों से सिक्ख समाज की भावनात्मक एवं न्यायपूर्ण अपील