जीवन में कई बार ऐसी घटनाएँ घटती हैं जो हमें भीतर तक झकझोर देती हैं। कल तक हम बच्चों को सिखाने वाले होते हैं, और एक दिन वही बच्चे हमें कुछ नया सीखने की प्रेरणा दे जाते हैं। आज मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मेरा ढाई वर्ष का नन्हा पोता खेलते-खेलते अचानक मेरे पास आया। उसने पहले मेरी हथेली को बड़े ध्यान से देखा, फिर अपने छोटे-छोटे हाथों को देखा और बड़ी मासूमियत से पूछा— “दादा… सबके हाथों में ये लकीरें क्यों होती हैं? पैरों के पंजों पर वैसी लकीरें क्यों नहीं होतीं? और हमारे चेहरे पर भी ऐसी लकीरें क्यों नहीं होतीं?” उसके मासूम चेहरे पर उत्तर जानने की उत्सुकता साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन सच कहूँ तो उस क्षण मैं निरुत्तर हो गया। जीवन का इतना लंबा अनुभव होने के बाद भी उस छोटे से प्रश्न का संतोषजनक उत्तर मेरे पास नहीं था। मैंने केवल इतना कहा— “बेटा, इन्हें हस्तरेखाएँ कहते हैं।” परंतु मेरा अपना मन भी संतुष्ट नहीं था। मुझे लगा कि बच्चे की जिज्ञासा को आधा उत्तर देकर शांत नहीं किया जा सकता। तभी मुझे आज की आधुनिक एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) तकनीक की याद आई। मैंने वही प्रश्न पूछा। कुछ ही क्षणों में ऐसा सरल, वैज्ञानिक और समझने योग्य उत्तर मिला कि मुझे स्वयं लगा जैसे मैं फिर से विद्यार्थी बन गया हूँ। मुझे पता चला कि हाथों और पैरों दोनों पर प्राकृतिक त्वचा-रेखाएँ होती हैं। हाथों की हथेलियों की रेखाएँ वस्तुओं को मज़बूती से पकड़ने, त्वचा को आसानी से मुड़ने और उँगलियों की गति को सहज बनाने में मदद करती हैं। पैरों के तलवों पर भी विशेष रेखाएँ और त्वचा की बनावट होती है, जो चलते समय पकड़, संतुलन और शरीर का भार संभालने में सहायता करती है। चेहरे की त्वचा की बनावट अलग होती है, इसलिए वहाँ ऐसी स्थायी रेखाएँ दिखाई नहीं देतीं। उस क्षण मुझे एहसास हुआ कि… बच्चे केवल उत्तर नहीं माँगते, वे हमें भी सीखने का अवसर देते हैं। आज का बच्चा मोबाइल चलाना जन्म से नहीं जानता, लेकिन उसकी जिज्ञासा जन्मजात होती है। यदि हम उसके प्रश्नों को महत्व देंगे, तो वही बच्चा कल ज्ञान का दीपक बनेगा। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मेरे ढाई वर्ष के पोते ने आज मुझे भी नया विद्यार्थी बना दिया। आज मैंने एक और बात सीखी— जिस दिन इंसान यह समझ ले कि “मुझे सब कुछ नहीं आता”, उसी दिन उसके सीखने का नया सफर शुरू हो जाता है। आइए, बच्चों को प्रश्न पूछने दें। उनके सवालों पर हँसिए मत, उन्हें टालिए मत। यदि उत्तर न पता हो तो निडर होकर कहिए— “बेटा, अभी मुझे नहीं पता… लेकिन हम दोनों मिलकर इसका उत्तर खोजेंगे।” यही संस्कार बच्चों में खोज की भावना जगाएँगे, यही उन्हें वैज्ञानिक सोच देंगे और यही उन्हें भविष्य का जिम्मेदार नागरिक बनाएँगे। आज विज्ञान, तकनीक और एआई ने ज्ञान प्राप्त करना पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपनी जिज्ञासा को जीवित रखें। याद रखिए… बड़े लोग ज्ञान से नहीं, सीखते रहने की आदत से बड़े बनते हैं। और… हर महान खोज की शुरुआत किसी छोटे बच्चे के मासूम “क्यों?” से ही होती है। यदि यह अनुभव आपको भी प्रेरित करे, तो इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाइए। शायद किसी घर में किसी बच्चे का अगला सवाल किसी बड़े का जीवन बदल दे। – राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 805 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation नवीन कौठा चौकात भव्य स्मारक उभारण्याची जोरदार मागणी; महापौर व आयुक्तांना निवेदन सादर, सुशोभीकरणासह सर्व सुविधा देण्याची आग्रही भूमिका शहरात घडून आला पाऊस, कविता आणि विद्रोहाचा जागर!