*गुरुघर की इमारतें नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बनाइए* *साध-संगत जी,* *हाथ जोड़कर एक विनम्र और सकारात्मक विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ।* *पिछले 50–60 वर्षों की अपनी यादों में जब सचखंड साहिब और लंगर साहिब की ओर देखता हूँ, तो अनेक बार एक ही दृश्य दिखाई देता है—मजबूत इमारत बनती है, कुछ वर्ष बाद टूटती है और फिर नई इमारत बनती है।* *इसके पीछे हर बार कोई न कोई परिस्थिति, आवश्यकता या कारण अवश्य रहा होगा। इसलिए मेरा उद्देश्य किसी संत-महापुरुष, कार सेवा, या प्रबंधन या संस्था पर उंगली उठाना बिल्कुल नहीं है।* *लेकिन एक सवाल हम सबको मिलकर जरूर पूछना चाहिए* *जो पैसा संगत ने श्रद्धा से दिया, जो इमारतें मजबूत थीं, जो ऐतिहासिक वास्तुएँ हमारी विरासत थीं और जिन्हें बनाने में वर्षों की मेहनत लगी—उनके बार-बार निर्माण और पुनर्निर्माण पर खर्च हुई राशि का समाज के भविष्य पर कितना उपयोग हो सकता था?* *मेरी यादों में सचखंड साहिब की कुछ इमारतें…* *मैं अपनी याददाश्त के आधार पर कुछ नाम साध-संगत के विचार के लिए रख रहा हूँ* *संत बाबा जोगा सिंघ जी निवास, संतोक सिंघ निवास, जवाहर बुंगा, सिक्ख हॉस्टेल, ऐतिहासिक बारादरी, दिवान हॉल, लंगर हॉल (अब तक कितनी ही बार), दशमेश हॉस्पिटल, देवड़ी (दो-तीन बार), बंगला, गुरुद्वारा ऑफिस, सभी ऐतिहासिक बुंगे, गुरुद्वारे के बाहरी गेट, नया बना हुआ एन.आर.आई. यात्री निवास, खालसा हाईस्कूल, संत बाबा मोनी जोगिंदर सिंघ जी बिल्डिंग, बंगले के सामने बनाई गई नई मजबूत इमारत जिसमें श्री दशम ग्रंथ साहिब का शोध कार्य पूरा हुआ और 300 सालाना का ऑफिस था, तथा शेरे पंजाब महाराजा रणजित सिंघ जी की विशाल इमारत।* *इसके साथ* *गुरुद्वारा एरिया का गार्डन (बार-बार तोड़ना और बनाना), पंजाब भवन की जगह का अगंत देव जी निवास, नया अगंत देव जी निवास, सचखंड गुरुद्वारे के ऊपर परिक्रमा में बनाए गए लिखारी काउंटर, चरणगंगा के पास बार-बार कमान बनाना और तोड़ना, सरोवर, प्रसाद का लंगर, गुरुद्वारा बावली साहिब और घोड़ों का अस्तबल।* *इनमें से कुछ निर्माणों के स्वरूप और उपयोग समय के साथ बदले होंगे। मेरी जानकारी में भी त्रुटि हो सकती है। इसलिए इसे किसी आधिकारिक सूची के रूप में नहीं, बल्कि एक संगत सदस्य की यादों और आत्ममंथन के रूप में देखा जाए।* *और केवल सचखंड साहिब ही नहीं…* *मेरी यादों में इन गुरुद्वारों और संस्थानों की इमारतों में हुए बड़े निर्माण और बदलाव भी आते हैं* *गुरुद्वारा बंदा घाट साहिब, गुरुद्वारा नगिनाघाट साहिब, गुरुद्वारा संगत साहिब, गुरुद्वारा शिकारघाट साहिब, गुरुद्वारा मालटेकड़ी साहिब, गुरुद्वारा दमदमा साहिब बसमतनगर, गुरुद्वारा गोबिंद बाग साहीब, गुरूद्वारा गेट 2 के सामने का एरिया, गुरूद्वारा परिसर का एरिया,गुरुद्वारा बोर्ड का ऑफिस, सचखंड गुरुद्वारे की परिक्रमा, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के एरिया की कुछ बिल्डिंग तथा अन्य अनेक निर्माण।* *साध-संगत जी,* *हाथ जोड़कर क्षमा चाहता हूँ—बहुत से नाम मेरी याद में नहीं होंगे और कुछ नाम या विवरण गलत भी हो सकते हैं। वास्तव में यह केवल सचखंड साहिब की मेरी यादों में आने वाली सूची है। लंगर साहिब और अन्य डेरों की इमारतों को इसमें शामिल ही नहीं किया गया है।* *एक घटना आज फिर सोचने पर मजबूर करती है…* *संत बाबा शीशा सिंघ जी ने सचखंड गुरुद्वारे की चूने की दीवारों पर चारों तरफ संगमरमर लगवाया था। उस समय एक साइड के काम पर लगभग 12 लाख रुपये खर्च होने की बात याद आती है।* *उस समय के 12 लाख रुपये आज कितने होते, यह अलग आर्थिक गणना का विषय है। लेकिन यदि बाद में वह काम निकालकर फिर नया काम किया गया हो, तो स्वाभाविक रूप से मन में एक सवाल उठता है—* *क्या हम भविष्य में ऐसे कामों की पहले से इतनी दूर तक योजना बना सकते हैं कि संगत के पैसे और मेहनत की बचत हो सके?* *यह सवाल किसी को दोष देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को बेहतर बनाने के लिए है।* *आज का युग पढ़ने और हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का है* *हजूर साहिब के जत्थेदार सिंघ साहिब संत बाबा कुलवंत सिंघ जी ने हैद्राबाद में गुरुद्वारा गौलीगुड़ा साहीब के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संगत से शिक्षा और हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की अपील की।* *यह संदेश हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है।* *आज हमारे बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, शिक्षक, प्रोफेसर, प्रशासनिक अधिकारी, उद्यमी, तकनीकी विशेषज्ञ, कलाकार, खिलाड़ी, उद्योजक , व्यापारी,अच्छे कारीगर और कुशल धर्म प्रचारक बनने के अवसर चाहिए।* *गुरुघर की इमारतें अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन गुरुघर की सबसे बड़ी ताकत उसकी जागरूक, शिक्षित, संस्कारी और सक्षम संगत है।* *जरा कल्पना कीजिए* *अगर निर्माण और पुनर्निर्माण पर होने वाले खर्च का एक हिस्सा भी योजनाबद्ध तरीके से* *धर्म प्रचार, उच्च शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण, तकनीकी शिक्षा, हुनर विकास, अच्छे कारागीर तैयार करने, धर्म प्रचारक बनाने और सिक्ख इतिहास को पुस्तक, फिल्म तथा आधुनिक मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया तक पहुँचाने में लगाया जाए…* *तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कितने नए रास्ते खुल सकते हैं!* *अब भी वक्त है… दिशा बदलने का नहीं, सोच को विस्तार देने का,सुखी संपन्न समाज के निर्माण करने का* *हमें इमारतें बनाना बंद नहीं करना है।* *हमें बस यह सोचना है कि* *जहाँ मजबूत इमारत बच सकती है, वहाँ उसे बचाया जाए।* *जहाँ मरम्मत से काम चल सकता है, वहाँ मरम्मत की जाए।* *जहाँ ऐतिहासिक वास्तु है, वहाँ उसकी पहचान सुरक्षित रखी जाए।* *और जहाँ नया निर्माण वास्तव में आवश्यक हो, वहाँ उसे दूरगामी योजना के साथ बनाया जाए। यात्री ओं और श्रध्दालूओं को हर प्रकार की अच्छी सेवा उपलब्ध कराने की भले अकेले ही या जो आर्थिक दृष्टी से कमजोर श्रध्दालु है उन्हे मोफत रहने का प्रबंध करने की, बेसहारा अकेले लोगो को रात में विश्राम करने की जगह उपलब्ध कराने की* *साथ-साथ समाज के लिए शिक्षा, धर्म प्रचार और आर्थिक विकास की मजबूत इमारत भी खड़ी की जाए।* *क्योंकि* *ईंट-पत्थर की इमारतें कुछ वर्षों में पुरानी हो सकती हैं,* *लेकिन शिक्षित और संस्कारी पीढ़ी सदियों तक समाज को मजबूत करती है।* *संगत का दसवंध—भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी* *इसके लिए केवल संत-महापुरुषों, नेताओं या गुरुद्वारा प्रबंधन को ही आगे आने की जरूरत नहीं है।* *हम सबको आगे आना होगा।* *जिस तरह संगत गुरुघर के निर्माण में अपना दसवंध देती है, उसी तरह यदि हम अपने बच्चों की शिक्षा, धर्म प्रचार, इतिहास संरक्षण और हुनर विकास के लिए भी अपना दसवंध समर्पित करें, तो एक नई दिशा पैदा हो सकती है।* *आज आवश्यकता है* *गुरुघर भी मजबूत हों,* *इतिहास भी सुरक्षित रहे,* *धर्म प्रचार भी बढ़े,* *बच्चे भी उच्च शिक्षित हों,* *हर क्षेत्र में सिक्ख आगे बढ़ें,* *समाज में चल रही गलत बातों को रोकने की* *दीखावे और शान शौक पर हो रहे खर्च पर अंकुश लगाने की* *और संगत का पैसा समाज की स्थायी ताकत बने।* *साध-संगत जी, यह किसी के विरुद्ध आवाज नहीं है।* *यह अपनी ही संगत से एक विनम्र सवाल है* *हमने बहुत कुछ बनाया और बहुत कुछ बदला;* *अब क्या हम मिलकर ऐसा कुछ बनाएँगे,* *जिसे आने वाली पीढ़ियाँ तोड़ना न चाहें,* *बल्कि गर्व से संभालकर रखें?* *आइए, अब केवल इमारतें नहीं—भविष्य बनाते हैं।* *केवल पत्थर नहीं—पीढ़ियाँ तराशते हैं।* *केवल इतिहास को याद नहीं करते—इतिहास रचने वाली पीढ़ी तैयार करते हैं।** *गुरु नानक नाम, चढ़दी कला, तेरे भाणे सरबत का भला।* *भुल चुक की हाथ जोड कर माफी चाहुंगा मन में बहुत दीनो से बसी बात साधं संगत के समक्ष रखा हुं* *राजेंद्र सिंघ शाहू* *इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड* *7700063999* Kanthak Suryatal Post Views: 22 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation युद्ध तिथे, महागाई इथे।