ट्रंप की उलझन, मिडिल ईस्ट की आग और दुनिया की बदलती राजनीति

ज जिस वैश्विक हालात पर बात करनी है, उसमें एक चीज बिल्कुल साफ दिखाई दे रही है  दुनिया की सबसे ताकतवर कही जाने वाली सत्ता खुद कन्फ्यूजन में फंसी हुई है। और इस कन्फ्यूजन का नाम है डोनाल्ड ट्रंप।

आज ट्रंप के बयान सुनिए, उनके फैसले देखिए, उनके सलाहकारों की बातें समझिए  कहीं कोई स्पष्ट रणनीति नजर नहीं आती। कोई कह रहा है ट्रंप फ्रस्ट्रेट हो चुके हैं, कोई कह रहा है वह बोर हो गए हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या उनके पास वास्तव में कोई प्लान है भी या नहीं?

ट्रंप लगातार दावा कर रहे हैं कि ईरान को अपना एनरिच्ड यूरेनियम अमेरिका को सौंपना ही पड़ेगा। यह बयान बार-बार दोहराया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि ईरान साफ शब्दों में इनकार कर चुका है। ईरान की राजनीतिक लाइन बिल्कुल स्पष्ट है  राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कोई भी संसाधन अमेरिका के हवाले नहीं होगा।

और यहीं से ट्रंप की कमजोरी उजागर होती है।

अमेरिका धमकियां दे रहा है, लेकिन उसके खुद के ऊर्जा सचिव कह रहे हैं कि अमेरिका के पास कोई ठोस योजना ही नहीं है कि अगर यूरेनियम मिल भी गया तो उसे रखा कहां जाएगा, इस्तेमाल कैसे होगा। यानी बयान भारी, तैयारी शून्य।

यह पूरी राजनीति हवा में उड़ती हुई लगती है।

रूस की एंट्री और अमेरिका की बेइज्जती

इसी बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बयान आता है कि रूस ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम अपने पास सुरक्षित रख सकता है। यह बयान सिर्फ कूटनीतिक नहीं था  यह सीधे-सीधे अमेरिका के लिए संदेश था।

मतलब साफ है।

अगर कोई समाधान निकलेगा तो वह वाशिंगटन से नहीं, मॉस्को और बीजिंग से निकलेगा।

यह वही पल है जहां दुनिया समझ रही है कि अमेरिका अब अकेला निर्णायक शक्ति नहीं रहा।

जंग की राजनीति और डर की मार्केट

ट्रंप के करीबी मीडिया संस्थान लगातार युद्ध की संभावना की बातें कर रहे हैं। खबरें आ रही हैं कि चीन यात्रा के बाद नई सैन्य रणनीति बन सकती है। सवाल यह है क्या यह वास्तविक रणनीति है या घरेलू राजनीति बचाने का खेल?

इन बयानबाज़ियों का सीधा असर बाजारों पर पड़ा है।

अमेरिका का ऑयल मार्केट अस्थिर हो गया है। शेयर बाजार ऊपर-नीचे झूल रहा है। निवेशक घबराए हुए हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बार फिर युद्ध की अफवाहों के सहारे चल रही है।

जब नेता स्पष्ट नहीं होते, तब बाजार सबसे पहले डर जाता है।

डिप्लोमेसी नहीं, दबंगई की भाषा

सबसे बड़ी समस्या ट्रंप की शैली है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्द हथियार होते हैं। लेकिन ट्रंप की भाषा कूटनीतिक नहीं, चुनावी मंच जैसी है।

उनके आसपास बैठे नेता  चाहे वह सीनेटर हों या मीडिया समर्थक दुनिया को आदेश देने की मानसिकता में जी रहे हैं। उन्हें लगता है कि अमेरिका सबसे बड़ा है, इसलिए किसी से भी कुछ भी कहा जा सकता है।

लेकिन यही रवैया अमेरिका को दोस्तों से भी दूर कर रहा है।

पाकिस्तान की नई भूमिका  और अमेरिकी बेचैनी

इस पूरे संकट में एक दिलचस्प बदलाव दिखा है। पाकिस्तान, जिसे अक्सर पश्चिमी मीडिया संदेह से देखता रहा, अचानक मध्यस्थ की भूमिका में उभर आया है।

ईरान से बातचीत, सऊदी अरब से संवाद, संदेशों का आदान-प्रदान  पाकिस्तान एक पीसमेकर की तरह काम कर रहा है।

ईरानी मीडिया लगातार पाकिस्तान को “दोस्ताना देश” कह रहा है।

लेकिन जैसे ही मध्यस्थता सफल होती दिखाई दी, अमेरिकी मीडिया में खबरें चलनी शुरू हो गईं कि पाकिस्तान ईरान की तरफ झुका हुआ है।

यह कूटनीति नहीं, अविश्वास पैदा करने की रणनीति लगती है।

डिप्लोमेसी में भरोसा बनाया जाता है, तोड़ा नहीं जाता।

यूएई का छिपा हुआ खेल

सबसे चौंकाने वाली रिपोर्ट यह सामने आई कि ईरान पर हुए कुछ हमलों के पीछे संयुक्त अरब अमीरात की भूमिका हो सकती है।

अगर यह सच है, तो इसका मतलब बहुत बड़ा है।

यानी सार्वजनिक रूप से शांति की बात और पर्दे के पीछे सैन्य कार्रवाई।

इससे ईरान को यह संदेश जाता है कि सीजफायर भरोसेमंद नहीं है। हर हमला बातचीत को कमजोर करता है और युद्ध को लंबा खींचता है।

मिडिल ईस्ट की राजनीति अब दो हिस्सों में बंटती दिखाई दे रही है  एक तरफ अमेरिका-इजराइल समर्थक धड़ा, दूसरी तरफ नए क्षेत्रीय गठबंधन।

सऊदी अरब की नई रणनीति

दिलचस्प बात यह है कि सऊदी अरब ने इस बार भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी। आरोप हैं कि उसे युद्ध में घसीटने की कोशिश हुई, लेकिन सऊदी नेतृत्व ने सार्वजनिक आक्रामकता के बजाय पर्दे के पीछे बातचीत को चुना।

यह बदलाव महत्वपूर्ण है।

पहले जहां क्षेत्रीय शक्तियां तुरंत सैन्य प्रतिक्रिया देती थीं, अब वे समझ रही हैं कि युद्ध का असली फायदा किसी तीसरे खिलाड़ी को मिलता है।

बदलता मिडिल ईस्ट  नए गठबंधन

आज क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदल रहे हैं:

  • तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब सुरक्षा सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं
  • ईरान अकेला नहीं रह गया
  • पाकिस्तान मध्यस्थ बनकर उभर रहा है
  • यूएई और इजराइल खुलकर एक धड़े में दिखाई दे रहे हैं

यानी मिडिल ईस्ट अब पुराने नक्शे पर नहीं चल रहा।

यह नई भू-राजनीतिक शतरंज है।

ट्रंप की चीन यात्रा  आखिरी मौका?

अब नजरें ट्रंप की चीन यात्रा पर हैं। माना जा रहा है कि चीन ने चार बिंदुओं वाला शांति प्रस्ताव दिया है, जिस पर ईरान सकारात्मक है।

संभावित शर्तें क्या हो सकती हैं?

  • ईरान का यूरेनियम अमेरिका को नहीं दिया जाएगा
  • संभवतः रूस में सुरक्षित रखा जा सकता है
  • प्रतिबंधों में ढील
  • ईरान के फ्रीज किए गए संपत्तियों की वापसी
  • क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन

अगर ट्रंप इसे मान लेते हैं तो तनाव कम हो सकता है।

अगर नहीं…

तो युद्ध की दूसरी किस्त लगभग तय मानी जा रही है।

निष्कर्ष: दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर

आज दुनिया उस दौर में है जहां बयान गोलियों से ज्यादा खतरनाक हो चुके हैं।

ट्रंप दबाव बना रहे हैं, ईरान झुक नहीं रहा, क्षेत्रीय शक्तियां नए गठबंधन बना रही हैं और बाजार डर के सहारे चल रहे हैं।

साफ दिख रहा है यह सिर्फ अमेरिका बनाम ईरान की लड़ाई नहीं है।

यह नई विश्व व्यवस्था तय करने की लड़ाई है।

और सबसे चिंताजनक बात?

समाधान अभी कहीं दिखाई नहीं देता।

अगर कूटनीति जीतती है तो शांति संभव है।
अगर अहंकार जीतता है  तो मिडिल ईस्ट की आग पूरी दुनिया को झुलसा सकती है।

 

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