प्रधानमंत्री मोदी का ईरान दौरा न करना: कूटनीति, दबाव और रणनीतिक रहस्यों का विश्लेषण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक यात्राएं अक्सर चर्चा का विषय रहती हैं। वे एक महीने में कई देशों का दौरा करते हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की उपस्थिति दर्ज कराते हैं। हाल ही में जब वे सेशल्स जैसे छोटे देश की यात्रा पर थे, तब एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ: ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान के विशेष निमंत्रण के बावजूद मोदी जी ईरान क्यों नहीं जा रहे हैं? यह निमंत्रण ईरान के सर्वोच्च नेता के परिवार से जुड़ी एक शोक सभा और अंतिम यात्रा (जनाजे) में शामिल होने के लिए था, जिसे रणनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा था। इस लेख में हम उन कारणों की गहराई से पड़ताल करेंगे जो प्रधानमंत्री के ईरान न जाने के पीछे हो सकते हैं, साथ ही विशेषज्ञों की राय और भारत-ईरान संबंधों के जटिल ताने-बाने को समझेंगे। विशेषज्ञों की चिंता और रणनीतिक अवसर भारत के कई रक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी को इस अवसर को नहीं गंवाना चाहिए था। डिफेंस एक्सपर्ट जीडी बख्शी के अनुसार, भारत और ईरान के बीच हजारों साल पुराने रणनीतिक रिश्ते हैं। ईरान हमेशा भारत की मुसीबत के वक्त साथ खड़ा रहा है। बख्शी याद दिलाते हैं कि जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या हुई थी, तब ईरान के शीर्ष नेता भारत आए थे। उनका कहना है कि इस नाजुक और गम के मौके पर मोदी जी को जाना चाहिए था। इसी तरह, रक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी ने मोदी जी के न जाने को अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उनका तर्क है कि ऐसे समय में जब दुनिया सदी के एक बड़े बदलाव से गुजर रही है और रूस, चीन तथा ईरान का एक नया गठबंधन (एक्सिस) बन रहा है, भारत को ‘ग्लोबल साउथ’ और नए विश्व व्यवस्था के साथ खड़े होने का मौका नहीं छोड़ना चाहिए था। चूंकि भारत वर्तमान में ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता से भी जुड़ा है और ईरान इसका नया सदस्य है, इसलिए प्रधानमंत्री की उपस्थिति एक बड़ा संदेश दे सकती थी。 प्रतिनिधिमंडल का चयन: एक कूटनीतिक संतुलन? प्रधानमंत्री खुद नहीं जा रहे हैं, लेकिन भारत ने एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है। इसमें बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पवित्र मार्गेरिता शामिल हैं। प्रतिनिधिमंडल में अता हसनैन का चयन काफी सोच-समझकर किया गया लगता है। पत्रकार बॉबी नकवी के अनुसार, जनरल हसनैन एक प्रतिष्ठित शिया परिवार से आते हैं और उनके पिता भी ब्रिटिश सेना के जमाने से एक बड़े अधिकारी रहे हैं। ईरान एक शिया बहुल देश है, इसलिए भारत ने एक प्रमुख भारतीय शिया व्यक्तित्व को भेजकर धार्मिक और सांस्कृतिक सम्मान प्रदर्शित करने की कोशिश की है。 हालांकि, विशेषज्ञ इसे जूनियर लेवल का प्रतिनिधित्व मान रहे हैं, क्योंकि वहां दुनिया के अन्य देशों से राष्ट्राध्यक्षों के पहुंचने की संभावना है। असली राज : इजराइल और अमेरिका का दबाव? प्रधानमंत्री के ईरान न जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय दबाव माना जा रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञ अमरेश मिश्रा का सीधा आरोप है कि इसके पीछे इजराइली लॉबी और जुइश लॉबी का भारी दबाव है। उनके अनुसार, भारत में इजराइल का दखल बहुत गहरा है और मोदी सरकार इस दबाव को नजरअंदाज नहीं कर पा रही है。 इसके अलावा, अमेरिका का कारक भी महत्वपूर्ण है। हालांकि अमेरिका ने हाल ही में ईरान के 6 बिलियन डॉलर रिलीज करने की बात की है और बातचीत की राह पर है, लेकिन भारत अभी भी अमेरिका और इजराइल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को लेकर सतर्क है। बॉबी नकवी का मानना है कि भारत यह संदेश नहीं देना चाहता कि उसका प्रधानमंत्री एक ऐसे कार्यक्रम में शामिल हो रहा है जिसे पश्चिम में एक धार्मिक-राजनीतिक आयोजन के रूप में देखा जा सकता है。 क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोगियों की नाराजगी का डर एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू खाड़ी देशों (Gulf countries) के साथ भारत के रिश्ते हैं। बॉबी नकवी बताते हैं कि ईरान के कई खाड़ी देशों, जैसे यूएई और सऊदी अरब, के साथ संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। ईरान ने अतीत में इन देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। चूंकि यूएई और सऊदी अरब भारत के बहुत करीबी रणनीतिक साझेदार हैं, इसलिए मोदी जी वहां जाकर अपने इन मित्रों को नाराज नहीं करना चाहते होंगे। यह कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की एक कोशिश हो सकती है。 सुरक्षा संबंधी चिंताएं एक व्यावहारिक कारण सुरक्षा भी हो सकता है। ईरान में होने वाली इस अंतिम यात्रा में लाखों की भीड़ जुटने की उम्मीद है। तेहरान और कोम जैसे शहरों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई औपचारिक स्टेट फ्यूनरल (राजकीय अंतिम संस्कार) नहीं है जैसा कि पश्चिमी देशों में देखा जाता है, बल्कि यह एक विशाल जन-आयोजन है, जहां सुरक्षा संबंधी जोखिम अधिक हो सकते हैं। आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों की उपेक्षा? भारत और ईरान के बीच आर्थिक संबंध बहुत महत्वपूर्ण हैं। ईरान भारत को सस्ता तेल और गैस उपलब्ध कराता रहा है। चाहबहार पोर्ट जैसा बड़ा प्रोजेक्ट दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक है। अमरेश मिश्रा का कहना है कि ईरान एक बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है और भारतीय कॉर्पोरेट्स भी वहां निवेश के इच्छुक हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का न जाना आर्थिक मोर्चे पर एक बड़ी भूल साबित हो सकती है。 सांस्कृतिक रूप से भी दोनों देश बेहद करीब हैं। ईरान में आम लोग भारतीय फिल्मों, मुगलों और यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू के बारे में भी गहरी जानकारी रखते हैं। अयातुल्ला खुमैनी, जो ईरान की इस्लामिक क्रांति के जनक थे, उनका परिवार उत्तर प्रदेश के बाराबंकी (किंतुर) से ताल्लुक रखता था。 यह ऐतिहासिक संबंध भारत और ईरान के बीच एक भावनात्मक सेतु का काम करता है। निष्कर्ष प्रधानमंत्री मोदी का ईरान न जाना केवल एक यात्रा का रद्द होना नहीं है, बल्कि यह भारत की जटिल विदेश नीति का प्रतिबिंब है। एक तरफ जहां भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए ईरान की आवश्यकता है, वहीं दूसरी तरफ उसे इजराइल, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को भी बचाकर रखना है। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे भारत के लिए एक खोया हुआ अवसर मानता है, खासकर तब जब दुनिया एक नई व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। वहीं दूसरा वर्ग इसे सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति के मद्देनजर लिया गया एक व्यावहारिक निर्णय देखता है। अंततः, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत का यह निर्णय भविष्य में ईरान के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करेगा या फिर प्रतिनिधिमंडल के जरिए भेजी गई व्यक्तिगत संवेदना इस खाई को पाटने में सफल रहेगी। Kanthak Suryatal Post Views: 428 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation २०४७ चे स्वप्न आणि नोकरशाहीचे वर्चस्व: मंत्र्यांचे दुय्यम स्थान चुकीचे स्पेलिंग आणि १५०० कोटींची भेट : मोदींच्या विदेशी पुरस्कारांची दुसरी बाजू