ट्रंप का मानना है कि इसराइल, अमेरिका की मदद के बिना दो घंटे भी नहीं टिक पाएगा। ट्रंप अपनी हार को एक डील का मुखौटा पहनाकर पेश कर रहे हैं एक नए युग की शुरुआत ईरान और अमेरिका के बीच सभी मोर्चों पर जंग खत्म करने का ऐलान कर दिया गया है। अमेरिका ने ईरान के आसपास से अपनी सेना हटाने और होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से नौसैनिक घेराबंदी (Blockade) हटाने की घोषणा की है। इस समझौते के साथ ही तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति फिर से बहाल होने की उम्मीद है, क्योंकि तेल की बिक्री पर लगे प्रतिबंध हटा लिए गए हैं। इस डील की औपचारिक घोषणा 19 जून को स्विट्जरलैंड में की जाएगी, जो एक 60 दिनों के महत्वपूर्ण मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) की शुरुआत होगी। समझौते की प्रमुख शर्तें और तात्कालिक प्रभाव इस समझौते के तहत अमेरिका होरमुज़ को ‘टोल-फ्री’ खोलने के लिए अधिकृत कर रहा है, जिसका अर्थ है कि अब दुनिया के जहाजों के लिए व्यापारिक रास्ते साफ हो गए हैं। ईरान को अपनी जब्त की गई संपत्ति वापस मिलने की संभावना है, जिससे उसे अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी। समझौते के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: सैन्य वापसी: अमेरिका ईरान के पास से अपने नौसैनिक बेड़े हटाएगा। आर्थिक राहत: ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी और उसकी जब्त दौलत पर बातचीत होगी। 60 दिनों का संवाद: अगले दो महीनों तक न्यूक्लियर डील और अन्य जटिल मुद्दों पर गहन चर्चा की जाएगी। स्थाई युद्धविराम: लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई को तुरंत और स्थाई रूप से रोक दिया गया है। क्षेत्रीय मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय भूमिका संयुक्त राष्ट्र ने इस डील को सफल बनाने के लिए पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब और तुर्की की भूमिका की सराहना की है। दिलचस्प बात यह है कि इस डील की जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने सार्वजनिक की। भारत के संदर्भ में, शेयर बाजार में इस डील के कारण उछाल देखा गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे क्षेत्र में शांति और स्थिरता आएगी। हालांकि, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह बयान कि यह हमारा युद्ध नहीं है, घरेलू राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है। ईरान की सामरिक जीत और अमेरिका की स्थिति स्रोतों के अनुसार, यह समझौता ईरान के लिए एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए नौसैनिक घेराबंदी की थी, लेकिन उसे अंततः पीछे हटना पड़ा। ट्रंप ने इसे एग्जिट का रास्ता बनाने के लिए एक डील का नाम दिया है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह अमेरिका की हार का दस्तावेज है। ईरान ने इस पूरी जंग के दौरान गजब के सब्र का प्रदर्शन किया है। बिना किसी बड़े नेता (पूर्व सुप्रीम लीडर की हत्या के बाद) के भी ईरान ने अमेरिका को झुकने पर मजबूर कर दिया। अब ईरान खाड़ी देशों में एक बॉस के रूप में उभर रहा है और वहां स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब प्रभावहीन नजर आ रहे हैं। अमेरिका और इसराइल के बीच बढ़ती दूरियां इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा झटका इसराइल और उसके प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लगा है। ट्रंप ने स्पष्ट रूप से नेतन्याहू की आलोचना की है और उन्हें मुश्किल आदमी करार दिया है। ट्रंप का मानना है कि इसराइल, अमेरिका की मदद के बिना दो घंटे भी नहीं टिक पाएगा। इसराइल ने इस डील को पटरी से उतारने के लिए लेबनान पर हमला भी किया, जिससे ट्रंप काफी नाराज हुए। अमेरिका में अब यह समझ बन रही है कि इस क्षेत्र में जंग का मुख्य कारण नेतन्याहू हैं। अमेरिका अब इसराइली लॉबी के प्रभाव से मुक्त होने की कोशिश कर रहा है। परमाणु कार्यक्रम और भविष्य की चुनौतियां न्यूक्लियर डील को लेकर अभी भी कई पेंच फंसे हुए हैं। ट्रंप का कहना है कि ईरान 15 से 20 साल के लिए यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) को टालने पर विचार कर सकता है। हालांकि, ईरान ने हमेशा यह कहा है कि वह यूरेनियम संवर्धन के अपने अधिकार को कभी नहीं छोड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नई डील ओबामा के समय की डील जैसी ही हो सकती है, जिसमें बैलिस्टिक मिसाइलों या ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क पर कोई कड़ा प्रतिबंध नहीं है। ईरान जानता है कि अमेरिकी चुनावों से पहले ट्रंप उन पर हमला नहीं करेंगे, इसलिए वह बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में है। आर्थिक परिणाम और निष्कर्ष होरमुज़ खुलने और तेल की सप्लाई बहाल होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की उम्मीद है। हालांकि, ईरान द्वारा सऊदी अरब और यूएई की तेल फैक्ट्रियों को जो नुकसान पहुंचाया गया है, उसकी भरपाई में समय लगेगा। अंततः, यह समझौता दिखाता है कि अमेरिका अब अंतहीन जंगों से थक चुका है और बाहर निकलना चाहता है। ईरान ने अपनी कूटनीति और जमीनी पकड़ से यह साबित कर दिया है कि उसे केवल सैन्य ताकत से नहीं दबाया जा सकता। अगले 60 दिन यह तय करेंगे कि यह शांति कितनी स्थाई है, लेकिन फिलहाल के लिए, मध्य-पूर्व में शक्ति का संतुलन ईरान की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। स्रोतों के आधार पर, यह स्पष्ट है कि ट्रंप अपनी हार को एक डील का मुखौटा पहनाकर पेश कर रहे हैं, जबकि ईरान एक विजेता की तरह संयम के साथ अपनी नई भूमिका स्वीकार कर रहा है। Kanthak Suryatal Post Views: 497 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation भारतीय लोकशाहीचा ग्रेट इंडियन सर्कस: ८०० मतांचा पक्ष आणि २० खासदारांची जादू लेबनॉनवर हल्ला म्हणजे इस्रायलची आत्महत्या? इराणच्या रेड लाईनने नेतान्याहूंची झोप उडवली!