इतिहास गवाह है कि साम्राज्यवादी ताकतें हमेशा अपनी सैन्य शक्ति के अहंकार में चूर रहती हैं, लेकिन वक्त की करवट कभी-कभी उन्हें ऐसी धूल चटाती है जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होती। वर्तमान परिदृश्य में, अमेरिका और इजराइल को अपने इतिहास की सबसे करारी और शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है,। यह हार केवल सैन्य मोर्चे पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक और नैतिक धरातल पर भी है। इजराइली अखबार हारिज की हेडलाइन आयतुल्लाह टोटल विक्ट्री (Ayatollah’s Total Victory) इस बात की पुष्टि करती है कि ईरान ने इस जंग में ऐसी जीत हासिल की है, जहां विरोधी के पास उंगली उठाने की भी जगह नहीं बची है। अमेरिका के इतिहास में यह संभवतः पहली बार है कि उसे किसी देश को मुआवजे के तौर पर भारी रकम देनी पड़ रही है और उसकी शर्तें माननी पड़ रही हैं। यह वह अमेरिका है जो दुनिया भर में प्रतिबंध लगाने और सरकारों को पलटने के लिए जाना जाता था, लेकिन आज वह ईरान की शर्तों के सामने झुकने पर मजबूर है। ईरान की जंग की तैयारी: हथियारों से ज्यादा हौसलों की जीत ईरान ने दुनिया को सिखाया है कि एक महाशक्ति से लड़ने के लिए केवल मिसाइलें ही काफी नहीं होतीं, बल्कि जनता का अटूट विश्वास और नेतृत्व की स्पष्टता सबसे बड़ी तैयारी होती है। जब यह जंग शुरू हुई और ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया, तो दुनिया भर के विशेषज्ञों और टीवी चैनलों ने दावा किया था कि ईरान बिखर जाएगा, उसके कई टुकड़े हो जाएंगे,। लेकिन ईरान की असली तैयारी उसके भीतर की एकता थी। जब ईरान की जनता अपने हुक्मरानों के साथ सड़कों पर उतर आई, तो यह साफ हो गया कि अमेरिका चाहे कितने भी बम गिरा ले या जहाज भेज दे, वह ईरान को हरा नहीं पाएगा,। ईरान ने साबित किया कि अगर देश के भीतर गद्दार न हों और जनता एकजुट रहे, तो दुनिया की कोई भी ताकत उस राष्ट्र को घुटनों पर नहीं ला सकती,। ईरान ने युद्ध को केवल सीमा पर नहीं लड़ा, बल्कि उसे कूटनीति की मेज तक ले गया और वहां भी अपनी शर्तें मनवाईं। समझौते की शर्तें: ईरान की संप्रभुता की बहाली मेहर न्यूज़ एजेंसी द्वारा जारी समझौते के 14 बिंदु इस जीत की कहानी बयां करते हैं। इस समझौते के तहत केवल ईरान ही नहीं, बल्कि लेबनान और गजा सहित सभी मोर्चों पर जंग खत्म करने की बात की गई है,। ईरान ने न केवल अपना ख्याल रखा, बल्कि पूरे ‘रेजिस्टेंस’ (Resistance) का बचाव किया,। समझौते की प्रमुख शर्तें निम्नलिखित हैं: सुरक्षा गारंटी: अमेरिका और इजराइल गारंटी देंगे कि वे भविष्य में कभी ईरान पर हमला नहीं करेंगे। सैन्य वापसी: अमेरिका को 30 दिनों के भीतर फारस की खाड़ी और ईरान के आसपास से अपनी नेवी और सेना हटानी होगी। प्रतिबंधों का खात्मा: ईरान पर लगे सभी प्राथमिक और माध्यमिक प्रतिबंध (Primary and Secondary Sanctions) हटाए जाएंगे, जिससे वह दुनिया भर में अपना तेल बेच सकेगा और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम से जुड़ सकेगा,। जब्त संपत्ति की वापसी: ईरान के लगभग 300 बिलियन डॉलर के फ्रोजन एसेट्स (जब्त संपत्ति) जारी किए जाएंगे,। आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरता ईरान इस जीत का सबसे बड़ा असर आर्थिक मोर्चे पर दिखने वाला है। जब ईरान की अर्थव्यवस्था में 300 बिलियन डॉलर इंजेक्ट होंगे, तो वहां की सूरत पूरी तरह बदल जाएगी,। वर्तमान में ईरान के रियाल की कीमत डॉलर के मुकाबले बहुत कम है, लेकिन इस समझौते के बाद रियाल इतना मजबूत हो सकता है कि वह कुवैती दीनार या ओमान के रियाल की तरह डॉलर से भी महंगा हो जाए। इसके अलावा, बातचीत शुरू होने से पहले ही अमेरिका 12 बिलियन डॉलर ईरान को देने को तैयार हो गया है ताकि ईरान इजराइल पर हमला न करे। यह ईरान की वह ताकत है जिसने अमेरिका को चेक बुक निकालने पर मजबूर कर दिया है। जब ईरान का तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में आएगा, तो कच्चे तेल की कीमतें 35-40 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकती हैं, जिससे पूरी दुनिया को फायदा होगा,। तटस्थ दृष्टिकोण और विशेषज्ञों की राय एक तटस्थ विचारक या इतिहास का जानकार इस घटनाक्रम को केवल एक डील के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के रूप में देखता है। जहाँ दुनिया भर के उदारवादी और पश्चिमी मीडिया ईरान की हार की भविष्यवाणी कर रहे थे, वहीं कुछ तटस्थ विश्लेषक इतिहास और भूगोल की समझ के आधार पर पहले दिन से कह रहे थे कि अमेरिका यह जंग नहीं जीत सकता,,। तटस्थ नजरिया यह समझने में मदद करता है कि: प्रोपेगेंडा बनाम हकीकत: अमेरिका जिस स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खुलवाने को अपनी जीत बता रहा है, उसे ईरान ने कभी बंद किया ही नहीं था,। परमाणु बम का भ्रम: ईरान ने परमाणु बम न बनाने की बात कही है, जबकि उसके सर्वोच्च नेता का पहले से ही फतवा था कि वे बम नहीं बनाएंगे। अमेरिका इसे अपनी जीत की तरह पेश कर रहा है, जो महज एक छलावा है। डिप्लोमेसी की विफलता: भारत जैसे देश जो इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रहे, उन्हें अपनी कूटनीति पर दोबारा सोचने की जरूरत है, क्योंकि वे एक हारी हुई ताकत (इजराइल) के साथ खड़े दिखाई दिए,。 क्षेत्रीय राजनीति और पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प मोड़ पाकिस्तान का पीसमेकर (Peacemaker) के रूप में उभरना है,। पहली बार पाकिस्तान इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय डिप्लोमेसी का हिस्सा बना और कतर के साथ मिलकर मध्यस्थ की भूमिका निभाई,। यह उन देशों के लिए एक सबक है जो केवल युद्ध की भाषा समझते हैं। वहीं दूसरी ओर, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश, जो पहले इजराइल के साथ खड़े थे, अब ईरान से प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार हैं,। निष्कर्ष ईरान की यह जीत केवल एक देश की जीत नहीं है, बल्कि यह उन सभी शक्तियों के लिए एक संदेश है जो गुंडागर्दी के दम पर दुनिया को चलाना चाहते हैं। ईरान ने दिखाया कि रणनीतिक धैर्य, आंतरिक एकता और स्पष्ट नेतृत्व के साथ एक छोटा राष्ट्र भी महाशक्तियों को घुटनों पर ला सकता है,। अमेरिका और इजराइल की यह हार आने वाले दशकों तक मध्य-पूर्व और वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगी। आज दुनिया ने देख लिया है कि जंग की असली तैयारी हथियारों के अंबार से नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता और जनता के स्वाभिमान की रक्षा के संकल्प से की जाती है। Kanthak Suryatal Post Views: 355 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation शांततेचा आभास की युद्धाचा व्यापार? अमेरिकेच्या धोरणांचे विश्लेषण भारतीय लोकशाहीचा ग्रेट इंडियन सर्कस: ८०० मतांचा पक्ष आणि २० खासदारांची जादू