बधाई हो! हम एक ऐसे न्यू इंडिया में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ मौतें अब त्रासदी नहीं, बल्कि केवल सांख्यिकी का एक हिस्सा मात्र रह गई हैं। अगर आपको लगता है कि उत्तर प्रदेश में आंधी और तूफान में 94 लोगों का मर जाना कोई बड़ी खबर है, तो शायद आप अभी भी उस पुराने, दकियानूसी भारत में जी रहे हैं जहाँ इंसानी जान की कोई कीमत हुआ करती थी। आज के इस महान दौर में, प्रयागराज से लेकर अयोध्या तक, लोग अगर आंधी में उड़ रहे हैं, तो इसे सिस्टम की नाकामी कहना बंद कीजिए; इसे न्यू इंडिया का साहसिक कारनामा मानिए।
महामानव का देश और उड़ते हुए नागरिक
हम एक ऐसे अद्भुत देश के निवासी हैं जो विश्व शक्ति बनने की कगार पर नहीं, बल्कि उसे पार कर चुका है। हमारे यहाँ ऐसे महामानव हैं जिनका जन्म सामान्य मानव की तरह माता के गर्भ से नहीं हुआ, बल्कि वे किसी आकाशीय उल्कापिंड की तरह सीधे धरती पर टपक पड़े हैं। जब नेता आकाशीय हो सकते हैं, तो जनता क्यों जमीन पर रहे? इसीलिए, जब आंधी आती है, तो हमारे यहाँ के नागरिक बिल बोर्ड के साथ लिपटकर 20-25 फुट ऊंचे आसमान की सैर करते हैं और फिर सीधे खेतों में जाकर लैंड करते हैं। यह दृश्य हृदय विदारक नहीं, बल्कि यह हमारी उस प्रगति का प्रतीक है जहाँ इंसान और विज्ञापन के होर्डिंग के बीच का अंतर समाप्त हो चुका है। आखिर विज्ञापन ही तो सब कुछ है, चाहे वह विकास का हो या मौत का।

लू, प्याज और राजसी बलिदान
गर्मी का मौसम है और देश का 80% हिस्सा हीट वेव की चपेट में है। बिहार से लेकर महाराष्ट्र और गुजरात से लेकर राजस्थान तक, पूरा भारत तवे की तरह जल रहा है। लेकिन घबराइए मत, हमारे पास ऐसे दूरदर्शी मंत्री हैं जो विज्ञान को मात देने का नुस्खा जानते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे राजसी नेता हमें बताते हैं कि गर्मी से बचने के लिए बस जेब में एक प्याज रख लेना काफी है। उनकी सादगी तो देखिए, वे सरेआम सफेद झूठ बोलते हैं कि उनके घर, दफ्तर या गाड़ी में एसी (AC) नहीं है। यह एक ऐसा क्रांतिकारी झूठ है जो जनता को लू से नहीं, बल्कि हकीकत से बचाने के लिए बोला जाता है। अगर कोई करोड़ों के महल में रहकर भी एसी का सुख नहीं ले रहा (जैसा कि वे दावा करते हैं), तो फिर जनता को सड़कों पर लू में मरने का पूरा अधिकार है। सिंधिया जी को तो अपना महल जनता के लिए खोल देना चाहिए, लेकिन वे केवल अपना प्याज दिखाते हैं, क्योंकि जनता को रोटी, कपड़ा और मकान से ज्यादा अध्यात्म और प्याज की जरूरत है।
नागरिक से भीड़ और भेड़ों का सफर
हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमने नागरिक होने के भारी-भरकम बोझ को त्याग दिया है। अब हम केवल एक भीड़ हैं, या यूँ कहें कि हम भेड़ों का झुंड बन चुके हैं जिन्हें सरकार जहाँ चाहती है, वहाँ हांक ले जाती है। उत्तर प्रदेश में 94 लोग मर जाएं या कुंभ के मेले में लोग घिसट-घिसट कर जान दे दें, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रयागराज में मौतें हों या नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मचे, हमारा खून नहीं खौलता। दरअसल, हमने अपनी याददाश्त और अपने अधिकारों को धर्म और आध्यात्म के नाम पर तर्पण कर दिया है। हमने शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन की मांग करना छोड़ दिया है क्योंकि हमें बताया गया है कि जिंदा रहना हमारा अधिकार नहीं, बल्कि सिस्टम की मेहरबानी है। अब हम नागरिक नहीं, बल्कि जॉम्बी और प्रेत बन चुके हैं, जिन्हें अपनों की लाशों पर भी गुस्सा नहीं आता।
नैतिकता का अंतिम संस्कार और न्यू इंडिया का उदय
पुराने जमाने में नेहरू, इंदिरा, राजीव या यहाँ तक कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में सरकारों की जिम्मेदारी तय हुआ करती थी। वह युग पिछड़ा था क्योंकि वहाँ नैतिकता की बात होती थी। लेकिन यह न्यू इंडिया है! यहाँ जिम्मेदारी तय करना पुराने दिनों की बात हो चुकी है। यहाँ नैतिकता बेमानी है और जवाबदेही एक गाली। अगर पटाखा फैक्ट्री में लोग जलकर मर जाते हैं, तो यह उनकी किस्मत है, सिस्टम की नाकामी नहीं। यहाँ कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री यह कहने का साहस नहीं जुटाता कि यह मेरी जिम्मेदारी है। क्यों कहे? राष्ट्रवाद के चश्मे से देखने पर हर मौत एक बलिदान नजर आती है, चाहे वह लू से हो या लापरवाही से।

आस्था के पैरों तले कुचलती हुई संवेदनाएं
जब सवा सौ लोग किसी बाबा (साकार हरी) के पैरों की धूल लेने के चक्कर में कुचलकर मर जाते हैं, तो हम इसे श्रद्धा का नाम देकर चुप हो जाते हैं। हमारे भीतर समता, न्याय और बंधुत्व के विचार को इतनी सफाई से मार दिया गया है कि अब हमें बस एक-दूसरे को मरते हुए देखना और खामोश रहना ही आता है। अगर कोई विद्वान, जैसे सत्यम वर्मा, मजदूरों के हक के लिए आवाज उठाता है, तो उसे रासुका (NSA) लगाकर जेल में डाल दिया जाता है। और हम? हम अपनी संवेदनशीलता का ढोल पीटते हुए चुपचाप तमाशा देखते हैं। हमें फर्क नहीं पड़ता कि कौन जेल गया या किसे कुचल दिया गया, क्योंकि हम तो विद्वान हैं और विद्वान कभी सिस्टम से सवाल नहीं पूछते।
निष्कर्ष: एक शानदार अंत की ओर
तो आइए, इस भीषण गर्मी और उड़ते हुए बिल बोर्ड्स के बीच हम उत्सव मनाएं। उत्सव इस बात का कि हम एक ऐसी भीड़ में तब्दील हो चुके हैं जिसे न अपनी जान की परवाह है, न दूसरों की। हम विश्व गुरु हैं, क्योंकि हमने बिना दवा, बिना पढ़ाई और बिना सुरक्षा के जीना सीख लिया है। 94 मौतें तो सिर्फ शुरुआत हैं, अभी तो पूरा सिस्टम ही एक आंधी बना हुआ है जिसमें हम सब बारी-बारी से उड़ने के लिए तैयार खड़े हैं। इस व्यंग्य का सार यही है कि जब तक हम भेड़ बने रहेंगे, सिस्टम हमें हांकता रहेगा। लेकिन चिंता न कीजिए, जब तक जेब में प्याज है और मन में अंधभक्ति, तब तक लू और आंधी हमारा क्या बिगाड़ लेगी? आखिर, हम महामानव के देश के अमर (या शायद मुर्दा) नागरिक जो हैं।

