एक ऐसा ऐतिहासिक दिवस, जब शब्द गुरु बना और मानवता को शाश्वत प्रकाश मिला भादों सुदी 1, संवत 1661 (1604 ई.) — भारतीय आध्यात्मिक इतिहास का वह महान दिवस, जब श्री गुरु अर्जन देव जी द्वारा संकलित आदि ग्रंथ साहिब जी का प्रथम प्रकाश श्री हरमंदिर साहिब, अमृतसर में हुआ। यह केवल किसी ग्रंथ के प्रकाश का दिन नहीं था। यह उस महान विचार का प्रकाश था, जिसमें परमात्मा की एकता, मानव की समानता और प्रेम की सर्वोच्चता को शब्दों में अमर कर दिया गया। पंचम पातशाह श्री गुरु अर्जन देव जी ने विभिन्न गुरु साहिबानों की वाणी के साथ-साथ अनेक संतों और भक्तों की पवित्र वाणी को भी एक ही ग्रंथ में स्थान दिया। यह अपने आप में एक अद्भुत आध्यात्मिक क्रांति थी। उस समय जब समाज जात-पात, ऊँच-नीच और धार्मिक विभाजनों में बँटा हुआ था, तब गुरु साहिब ने संसार के सामने यह ऐतिहासिक संदेश रखा कि सत्य किसी एक जाति का नहीं, परमात्मा किसी एक धर्म का नहीं और आध्यात्मिक ज्ञान किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं है। भाई गुरदास जी ने इस पावन बीड़ को गुरु साहिब की देखरेख में लिपिबद्ध किया और प्रथम प्रकाश के अवसर पर बाबा बुद्धा जी को प्रथम ग्रंथी के रूप में सेवा का महान दायित्व मिला। सोचिए उस ऐतिहासिक क्षण को… श्री हरमंदिर साहिब में पावन ग्रंथ का प्रकाश हुआ होगा, संगत के हृदय श्रद्धा से भर उठे होंगे, और गुरु की वाणी ने संसार को यह संदेश दिया होगा— मनुष्य अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उनमें बसने वाला नूर एक है। इसीलिए गुरु वाणी कहती है— “अवल अलह नूर उपाइआ, कुदरत के सभ बंदे। एक नूर ते सभ जग उपजिआ, कउन भले को मंदे॥” यही पहले प्रकाश का वास्तविक संदेश है— अंधकार चाहे अज्ञान का हो, अहंकार का हो, जात-पात का हो या नफरत का—उसे गुरु के ज्ञान के प्रकाश से ही मिटाया जा सकता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी हमें केवल धार्मिक ज्ञान नहीं देते; वे हमें जीवन जीने की कला देते हैं। वे कहते हैं— प्रेम करो। सत्य पर चलो। मेहनत की कमाई खाओ। जरूरतमंद के साथ बाँटो। निस्वार्थ सेवा करो। और सबसे बढ़कर—हर प्राणी में उसी परमात्मा का नूर देखो। सिक्ख परंपरा का महान सिद्धांत “सरबत दा भला” इसी सार्वभौमिक सोच का प्रतीक है। आज दुनिया फिर उसी मोड़ पर खड़ी है जहाँ जाति, धर्म, भाषा, रंग और विचारों के नाम पर इंसान इंसान से दूर हो रहा है। ऐसे समय में 1604 का वह पहला प्रकाश हमें पुकार रहा है— आओ, नफरत के अंधकार को गुरु के प्रकाश से मिटाएँ। आओ, भेदभाव की दीवारों को गिराएँ। आओ, सेवा को जीवन का आधार बनाएँ। आओ, हर इंसान में परमात्मा का नूर पहचानें। क्योंकि गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश केवल गुरुद्वारे में नहीं होना चाहिए—वह हमारे विचारों में, हमारे व्यवहार में, हमारी वाणी में और हमारे कर्मों में दिखाई देना चाहिए। पहले प्रकाश उत्सव हमें इतिहास याद करने का ही नहीं, इतिहास से प्रेरणा लेने का अवसर देता है। जिस प्रकाश को 1604 में श्री हरमंदिर साहिब में प्रकट किया गया था, वही प्रकाश आज हमारे हृदयों में भी प्रकट हो— अज्ञान मिटे, अहंकार मिटे, नफरत मिटे, और प्रेम, सेवा, समानता तथा मानवता का उजाला चारों ओर फैले। एक नूर — एक मानवता। एक संदेश — प्रेम और भाईचारा। एक संकल्प — सरबत दा भला। धन धन श्री गुरु अर्जन देव जी। धन धन बाबा बुढ्ढा जी। धन धन भाई गुरदास जी। धन धन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी। पहले प्रकाश उत्सव की समस्त मानवता को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रेनर, नांदेड मो. 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 17 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation डीजेमुक्त पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव साजरा करू या : जिल्हाधिकारी राहुल कर्डिले