वाहेगुरुजी का खालसा
वाहेगुरुजी की फतेह ॥
आज के आधुनिक युग में विवाह समारोह, डिन्नर पार्टी, धार्मिक कार्यक्रम तथा अन्य आयोजनों में बुफे सिस्टीम बहुत तेजी से बढ़ चुका है। लोग इसे आधुनिकता और सुविधा का प्रतीक मानते हैं, परंतु यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो यह पद्धति धीरे-धीरे हमें हमारी सिक्ख संस्कृती, भारतीय संस्कारों तथा गुरुओं की मर्यादा से दूर करती जा रही है।
सिक्ख धर्म ने हमेशा “पंगत और संगत” की परंपरा को महत्व दिया है।
जहाँ सभी लोग प्रेम, समानता, नम्रता और सम्मान के साथ बैठकर भोजन करते हैं।
वहाँ ना कोई छोटा होता है, ना बड़ा…
ना कोई अमीर होता है, ना गरीब…
सभी एक समान होते हैं।
परंतु आज के बुफे सिस्टीम में क्या दिखाई देता है?
कोई प्लेट लेकर इधर-उधर घूम रहा है…
कोई खाने के लिये लाईन में खड़ा है…
कोई खाने की टेबल पर आगे बढ़ने की जल्दी में है…
कहीं खाना एक तरफ रखा होता है और पानी बहुत दूर…
लोग पैरों में चप्पल-जूते पहनकर ही भोजन के स्थान तक पहुँचते हैं…
और प्लेट लेकर अलग-अलग स्टॉल पर इस प्रकार खाना लेना पड़ता है मानो भोजन नहीं बल्कि भिख मांग कर लिया जा रहा हो।
यह दृश्य हमारी संस्कृती और मर्यादा दोनों के विरुद्ध दिखाई देता है।
भारतीय संस्कृती में अन्न को “पूर्णब्रह्म” माना गया है।
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि परमात्मा की कृपा माना गया है।
पहले भोजन से पूर्व परिवार एक साथ बैठकर परमात्मा का स्मरण करता था
“वाहेगुरु तेरा शुक्र है”
ऐसे भाव से भोजन ग्रहण किया जाता था।
आज वह संस्कार धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं।
हाँ… यह भी सत्य है कि आज के समय में बहुत से लोग उम्र, बीमारी अथवा शारीरिक कारणों से नीचे बैठकर भोजन नहीं कर सकते।
और भागदौड़ भरी जिंदगी में बड़े कार्यक्रमों में सभी को नीचे बैठाकर भोजन कराना भी कई बार कठिन हो जाता है।
इसलिए समय के अनुसार कुछ परिवर्तन आवश्यक हो सकते हैं…
परंतु परिवर्तन का अर्थ संस्कारों को समाप्त करना नहीं होना चाहिए।
यदि आधुनिकता अपनानी ही है, तो उसमें भी मर्यादा और संस्कार बनाए रखे जा सकते हैं।
हम एक सुंदर और संस्कारी व्यवस्था शुरू कर सकते हैं
◆ भोजन स्थल के बाहर ही चप्पल-जूते रखने की व्यवस्था हो
◆ सभी लोगों को आदरपूर्वक कुर्सी-टेबल पर बैठाकर भोजन कराया जाए
◆ सेवक प्रेम से हर व्यक्ति को भोजन परोसें
◆ पानी और भोजन साथ में व्यवस्थित रूप से दिया जाए
◆ प्लेट लेकर स्टॉल-स्टॉल घूमने की पद्धति बंद हो
◆ भोजन से पहले परमात्मा का स्मरण किया जाए
◆ आवश्यकता अनुसार ही भोजन परोसा जाए ताकि अन्न की बर्बादी ना हो
इससे आधुनिकता भी बनी रहेगी और संस्कार भी बचेंगे।
जब इंसान सम्मानपूर्वक बैठकर भोजन करता है, तब केवल शरीर नहीं बल्कि मन भी तृप्त होता है।
सेवा से प्रेम बढ़ता है…
परोसने से अपनापन बढ़ता है…
और साथ बैठकर खाने से समाज में भाईचारा मजबूत होता है।
हमें यह समझना होगा कि
आधुनिक बनना गलत नहीं है…
परंतु आधुनिकता के नाम पर अपनी जड़ों, संस्कारों और मर्यादा को खो देना बहुत बड़ी गलती है।
आइए…
हम फिर से ऐसी परंपरा शुरू करें जहाँ
भोजन में दिखावा नहीं… संस्कार हों
भीड़ नहीं… सम्मान हो
भागदौड़ नहीं… अपनापन हो
और अन्न को परमात्मा का प्रसाद समझकर आदरपूर्वक ग्रहण किया जाए॥
यही सिक्ख धर्म की शिक्षा है…
यही भारतीय संस्कृती की सुंदरता है…
और यही आने वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी सीख है॥
राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड
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