प्रस्तावना पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के बाद देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी कानूनी लड़ाई छिड़ गई है, जिसने न केवल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा पेश किए गए सबूतों और आंकड़ों के बाद मुख्य न्यायाधीश (CJI) और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची की पीठ ने इस मामले में जो रुख अपनाया है, वह ऐतिहासिक माना जा रहा है ।

सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक आदेश आमतौर पर यह देखा गया है कि चुनाव संपन्न होने के बाद जब भी कोई याचिका सुप्रीम कोर्ट पहुंचती है, तो अदालत उसे खारिज कर देती है, लेकिन बंगाल चुनाव के इस मामले में ऐसा नहीं हुआसर्वोच्च न्यायालय ने टीएमसी की दलीलों और सबूतों को सुनने के बाद पार्टी को निर्देश दिया है कि वे नए सिरे से एक नई याचिका दाखिल करें ताकि बंगाल के चुनावों की विस्तृत जांच की जा सके कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले को गंभीरता से देख रहा है।
31 सीटों पर हार-जीत और वोटों की कटौती का खेल सुप्रीम कोर्ट में टीएमसी सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने जो सबूत पेश किए, उन्होंने कोर्ट को हैरान कर दिया। उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से दिखाया कि बंगाल की 31 सीटों पर वोटों की कटौती का मार्जिन ठीक उतना ही है, जितने वोटों के अंतर से भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने चुनाव जीता है। एक विशिष्ट उदाहरण देते हुए बनर्जी ने बताया कि एक सीट पर भाजपा प्रत्याशी मात्र 282 वोटों से जीत गया, जबकि वहां एसआईआर (SIR) के माध्यम से लगभग 5,000 मतदाताओं के नाम काट दिए गए थे। कुल मिलाकर 176 सीटों पर इसी तरह के पैटर्न के साथ वोट काटे गए हैं।

27 लाख मतदाताओं का मताधिकार छीनने का आरोप इस पूरे विवाद के केंद्र में 27 लाख मतदाता हैं, जिनके नाम चुनाव से पहले वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। इन मतदाताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी आपत्तियां भी दर्ज कराई थीं, लेकिन उस समय उनकी याचिकाओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और अधूरी वोटर लिस्ट पर ही चुनाव संपन्न करा दिए गए। जस्टिस जॉयमाला बागची ने पहले भी चुनाव आयोग से एक काल्पनिक सवाल पूछा था कि यदि जीत-हार का अंतर 2% से 15% के बीच हो और उतने ही मतदाताओं के नाम काट दिए गए हों जिनकी पहचान हो चुकी है, तो क्या कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए?।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयोग इस पूरे मामले में निकम्मा साबित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ट्रिब्यूनल के जजों ने स्वयं चुनाव आयोग से अधिक मतदाताओं के नाम फिर से वोटर लिस्ट में शामिल किए, जबकि आयोग ने केवल 136 मतदाताओं को ही वापस जोड़ा था। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि 27 लाख अर्जियां पेंडिंग होने के बावजूद चुनाव को आगे बढ़ाया गया।

विवादास्पद नियुक्तियां और भ्रष्टाचार के आरोप सूत्रों के अनुसार, बंगाल में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान काम करने वाले अधिकारियों को चुनाव के बाद महत्वपूर्ण पदों से पुरस्कृत किया गया है। उदाहरण के तौर पर, सुब्रत गुप्ता, जो एसआईआर के विशेष ऑब्जर्वर थे, उन्हें मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया गया। इसी तरह, मनोज अग्रवाल, जो एसआईआर के दौरान सीईओ के रूप में कार्यरत थे, उन्हें शुभेंदु अधिकारी का मुख्य सचिव बना दिया गया। यह नियुक्तियां संदेह पैदा करती हैं कि क्या हार-जीत के मार्जिन और काटे गए वोटों के बीच कोई सीधा संबंध था।
निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट की इस सक्रियता ने भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग दोनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जहाँ ममता बनर्जी और टीएमसी इसे अपनी बड़ी नैतिक जीत मान रहे हैं, वहीं देश की नजरें अब टीएमसी द्वारा दाखिल की जाने वाली नई याचिका पर टिकी हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट बंगाल चुनाव के नतीजों को पलटने या पुनर्मतदान का आदेश देगा? यह भविष्य की सुनवाई पर निर्भर करेगा, लेकिन वर्तमान स्थिति ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
