हमारे बचपन में सिक्ख परिवारों में होने वाली शादियाँ बहुत ही सादगी और मर्यादा के साथ सम्पन्न होती थीं। बड़ों से सुनने को मिलता था कि उनके समय में तो शादियाँ सूरज निकलने से पहले ही हो जाया करती थीं। चार लावां साहिब के पाठ के पश्चात अरदास होती, और केवल कड़ाह प्रसाद का वितरण किया जाता था। संगत सुहाग जोड़ी को आशीर्वाद देकर, परिवार को मुबारकबाद देकर अपने-अपने घर लौट जाती थी। बाद में केवल कुछ नजदीकी लोगों के लिए साधारण भोजन की व्यवस्था होती थी। लेकिन आज के समय में शादियाँ दिखावे और खर्च का माध्यम बन गई हैं। वर्तमान परिस्थितियों जैसे गैस सिलेंडर की कमी और महंगाई के कारण कई परिवार चिंता में हैं, क्योंकि केटरर्स भी असमर्थता जता रहे हैं। ऐसे समय में क्या हम अपनी पुरातन परंपरा और सिक्ख मर्यादा की ओर वापस लौटने का विचार नहीं कर सकते? क्या हम केवल कड़ाह प्रसाद की देग के साथ सादगीपूर्ण विवाह कर, बचाए गए धन को दूल्हा-दुल्हन के उज्ज्वल भविष्य में नहीं लगा सकते? याद रखें कड़ाह प्रसाद कोई साधारण पकवान नहीं है, यह गुरू की कृपा का प्रतीक है, जिसे अरदास के बाद किसी भी दुनियावी वस्तु से तुलना नहीं की जा सकती। पहले के समय में विवाह के लिए केवल हेड ग्रंथी और रागी सिंघ को बुलाया जाता था। न कोई आडंबर, न बड़ा मंच, न दिखावा सिर्फ भक्ति, मर्यादा और सादगी। आज फिर से उसी मार्ग पर चलकर हम एक नई सोच, एक नई क्रांति और समाज के लिए एक आदर्श स्थापित कर सकते हैं। यह कोई छोटा पन या मजबुरी नहीं है यह समय की मांग भी है और हमारी जिम्मेदारी समझ कर नया आदर्श स्थापित करने का सुनहरा अवसर है… – राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 684 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation सगरोळी वाळू घाट प्रकरण: ४८ तास उलटूनही महसूल व आरटीओ विभाग गैरहजर; ३३ हायवा ४ पोकलेनवर पोलीस पहारा कुणाच्या खांद्यावर कुणाचे ओझे — इतवारा पोलिसांचा गुटक्यावर ‘वैद्यकीय’ चमत्कार!