*यह बात लगभग 1985–86 की है।* *जिला यवतमाल में एक दुकान पर असली शहद मिलता था। दुकानदार शहद को साफ-सुथरी पुरानी शराब की कांच की बोतलों में भरकर देता था और टूटने से बचाने के लिए उसे अखबार में अच्छी तरह लपेट देता था।* *एक दिन मैं ऐसी ही शहद की एक बोतल लेकर अपने चाचाजी के घर जा रहा था।* *दुकान बस स्टैंड के पास थी और आसपास शराब की दुकान भी थी। बोतल अखबार में लिपटी होने के बावजूद मेरी जेब से थोड़ी उभरी हुई दिखाई दे रही थी।* *वहीं ड्यूटी पर खड़े एक पुलिस कॉन्स्टेबल ने शायद मन ही मन सोच लिया* *“यह आदमी शराब की बोतल लेकर जा रहा है… मामला बनाया जा सकता है!”* *उसने मुझे वहीं नहीं रोका, बल्कि पीछे-पीछे आने लगा।* *मैंने भी उसके इरादे को भांप लिया और मन में थोड़ी शरारत सूझी।* *मैंने डरने की ऐसी एक्टिंग की कि वह समझे—“पकड़ा गया तो गया!”* *मैं थोड़ा तेज चला…* *वह भी तेज चलने लगा!* *मैं और तेज…* *वह भी और तेज!* *करीब दो किलोमीटर तक हमारा यह अनोखा खेल चलता रहा।* *चाचाजी का घर पास आ गया तो सुनसान जगह देखकर मैं थोड़ा रुक गया। पीछे से कॉन्स्टेबल आया और बोला* *“जेब में क्या है? निकालो!”* *मैंने डरने का नाटक करते हुए कहा* *“साहब, जाने दीजिए ना…”* *वह और गंभीर होकर बोला* *“तुम्हारे ऊपर केस कर दूंगा। कुछ सेटलमेंट करना है तो बात करो!”* *मैं भी मजाक के मूड में था। मैंने बोतल उसके हाथ में दे दी।* *उसने अखबार की पूरी परत हटाई…* *बोतल देखी…* *और मैं हंसते हुए बोला* *“साहब, शहद ले जाना भी कोई जुर्म है क्या?”* *इसके बाद मैंने अपने चाचाजी का नाम बताया, जो उस समय क्षेत्र के बड़े नेता थे।* *कॉन्स्टेबल के चेहरे का रंग ही बदल गया!* *वह बोला* *“अरे! तुमने तो मुझे बेकार में दो किलोमीटर दौड़ा दिया… और ऊपर से बोतल भी मेरे हाथ में थमा दी!”* *सीख* *कभी-कभी हम भी उस कॉन्स्टेबल की तरह होते हैं।* *बोतल देखकर उसके अंदर का पदार्थ तय कर लेते हैं,* *चेहरा देखकर इंसान का चरित्र तय कर लेते हैं,* *कपड़े देखकर उसकी हैसियत तय कर लेते हैं* *और अधूरी जानकारी देखकर पूरी कहानी बना लेते हैं।* *लेकिन सच्चाई यह है* *हर शराब की बोतल में शराब नहीं होती,* *हर चुप रहने वाला कमजोर नहीं होता,* *और हर दिखाई देने वाली चीज वैसी नहीं होती जैसी पहली नजर में दिखाई देती है।* *इसलिए किसी के बारे में राय बनाने से पहले* *सच्चाई को थोड़ा खोलकर देख लेना चाहिए।* *कहीं ऐसा न हो कि हम भी किसी को गलत समझकर* *दो किलोमीटर तक दौड़ते रहें…* *और अंत में हाथ में सिर्फ “शहद” ही निकले!* *“शक तेज दौड़ाता है,* *लेकिन सच्चाई ही मंजिल तक पहुंचाती है।”* *गुरु नानक नाम, चढ़दी कला, तेरे भाणे सरबत का भला* *राजेंद्र सिंघ शाहू* *इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड* *7700063999* Kanthak Suryatal Post Views: 680 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation सावनी रवींद्र : स्वरांच्या वाटेवरची अखंड साधना;स्वराला मिळालेला सन्मान, साधनेला मिळालेली पावती भाद्रपद पौर्णिमेनिमित्त एकशे बारावी काव्यपौर्णिमा उत्साहात साजरी; बुद्ध, धम्म आणि संघाचा निनादला सूर