मनुष्य की महानता इस बात से नहीं पहचानी जाती कि वह कितनी कमियाँ देख सकता है, बल्कि इस बात से पहचानी जाती है कि वह कितनी अच्छाइयाँ पहचान सकता है। यह संसार ईश्वर की अनुपम रचना है, परंतु मनुष्य का स्वभाव बड़ा विचित्र है। उसे अच्छाई की अपेक्षा बुराई जल्दी दिखाई देती है। गुलाब की सुगंध और सुंदरता के बजाय उसके काँटे दिखाई देते हैं। कोयल की मधुर वाणी के बजाय उसका काला रंग दिखाई देता है। गधा जीवनभर निःस्वार्थ मेहनत करता है, फिर भी उसकी मेहनत नहीं, बल्कि उसका उपहास किया जाता है। एक सफेद कागज़ पर छोटा-सा काला बिंदु बना दें, तो लोगों की नज़र पूरे सफेद कागज़ पर नहीं, केवल उस बिंदु पर जाती है। कोई विद्यार्थी 95 अंक लाए, तो उसकी मेहनत की सराहना कम और यह प्रश्न अधिक होता है—”बाकी 5 अंक कहाँ गए?” किसी व्यक्ति के सौ गुण भुला दिए जाते हैं, लेकिन एक छोटी-सी भूल वर्षों तक याद रखी जाती है। यही प्रवृत्ति परिवारों में दूरियाँ, समाज में कटुता और मन में अशांति पैदा करती है। गुरबाणी हमें क्या सिखाती है? नानक फिकै बोलिऐ तनु मनु फिका होइ॥ अर्थ: हे नानक! कटु और कड़वे वचन बोलने से केवल सामने वाला ही नहीं, बल्कि बोलने वाले का तन और मन भी अपनी मधुरता खो देता है। सभ महि जोति, जोति है सोइ॥ अर्थ: एक ही परमात्मा की ज्योति सभी प्राणियों में विद्यमान है। इसलिए किसी से घृणा नहीं, बल्कि सभी का सम्मान करना चाहिए। ना को बैरी, नाहीं बिगाना; सगल संग हम कउ बन आई॥ अर्थ: न कोई हमारा शत्रु है और न कोई पराया। हमें सभी के साथ प्रेम, सम्मान और अपनत्व का व्यवहार करना चाहिए। जब हर मनुष्य में एक ही परमात्मा का प्रकाश है, तब हमें उसके दोष नहीं, उसके भीतर छिपे गुण देखने चाहिए। मधुमक्खी हजारों काँटों के बीच भी केवल फूल का मधु चुनती है, जबकि मक्खी सुगंधित बगीचे को छोड़कर घाव पर बैठती है। अब निर्णय हमें करना है,हमें मधुमक्खी बनना है या मक्खी? सज्जन व्यक्ति दूसरों के गुणों से प्रेरणा लेता है, जबकि दुर्जन व्यक्ति दूसरों के दोषों में आनंद खोजता है। याद रखिए दोष देखना सरल है, गुण पहचानना महानता है। आलोचना करना आसान है, प्रोत्साहन देना चरित्र की पहचान है। दूसरों को गिराना आसान है, लेकिन उन्हें उठाना ही सच्ची इंसानियत है। यदि आप चाहते हैं कि लोग आपकी अच्छाइयों को देखें, तो पहले स्वयं दूसरों की अच्छाइयों को देखना सीखिए। आइए, आज एक संकल्प लें – हम किसी की निंदा नहीं करेंगे। – हम किसी की कमियाँ नहीं गिनेंगे। – हम जहाँ भी जाएँगे, वहाँ गुणों की चर्चा करेंगे। – हम हर व्यक्ति में परमात्मा की ज्योति का सम्मान करेंगे। – हम लोगों को तोड़ने नहीं, जोड़ने का कार्य करेंगे। याद रखिए “जिस दिन हमारी दृष्टि दोषों से हटकर गुणों पर टिक जाएगी, उसी दिन हमारा जीवन भी सुख, शांति, प्रेम और आनंद से भर जाएगा।” दूसरों के दोष देखने से हमारा चरित्र महान नहीं बनता, लेकिन दूसरों के गुण अपनाने से हमारा व्यक्तित्व अवश्य महान बन जाता है। वाहेगुरु जी हमें ऐसी निर्मल दृष्टि प्रदान करें कि हम हर मनुष्य में परमात्मा का प्रकाश देखें, हर हृदय का सम्मान करें और जहाँ भी जाएँ, वहाँ प्रेम, सेवा, सद्भाव और मानवता का संदेश फैलाएँ। यही सच्ची गुरमत है, यही सच्ची धर्म-सेवा है। – राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर, नांदेड 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 673 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation जलदूत बनून पाण्यासाठी चालूया; जलसमृद्ध महाराष्ट्रासाठी एकत्र येऊया… “वय झालं म्हणून काय झालं…!”