युद्ध का मुनाफा और विनाश की कीमत: ईरान-अमेरिका संघर्ष का एक गहरा विश्लेषण ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव केवल सैन्य रणनीति का खेल नहीं है, बल्कि यह आर्थिक हितों, राजनीतिक साजिशों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक जटिल कहानी है। हालिया खुलासों ने अमेरिका और इजरायल द्वारा किए जा रहे दावों की पोल खोल दी है और यह स्पष्ट किया है कि युद्ध के मैदान में होने वाले नुकसान को किस तरह दुनिया की नजरों से छिपाया जा रहा था। अमेरिकी सैन्य शक्ति को लगा बड़ा झटका: सीआरएस की रिपोर्ट अब तक अमेरिका और इजरायल लगातार यह संदेश दे रहे थे कि ईरान के खिलाफ युद्ध में उनका नुकसान नगण्य है। यह दावा किया जा रहा था कि ईरान की वायुसेना और नौसेना पूरी तरह तबाह हो चुकी है और अमेरिका ने मात्र 13 सैनिक खोए हैं। हालांकि, अमेरिका की ‘कांग्रेस रिसर्च सर्विस’ (CRS) की ताजा रिपोर्ट ने एक बिल्कुल अलग हकीकत बयां की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, इस युद्ध में अमेरिका के कम से कम 42 जहाज या विमान या तो पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं या वे इतने गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं कि अब उनका उपयोग नहीं किया जा सकता। यह खुलासा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआत में दावा किया गया था कि ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम पहले ही दिन खत्म कर दिया गया था। लेकिन ईरान ने F-35 जैसे अत्याधुनिक विमानों को न केवल निशाना बनाया बल्कि उन्हें मार गिराया। सीआरएस की सूची में शामिल प्रमुख सैन्य संपत्तियों में चार F-15E स्ट्राइक ईगल फाइटर जेट, एक F-35A, एक A-10 थंडरबोल्ट, सात KC-135 टैंकर एयरक्राफ्ट, एक E-3 सेंट्री अवाक्स प्लेन और 24 MQ-9 रीपर ड्रोन शामिल हैं। इन ड्रोनों को दुनिया के सबसे खतरनाक हथियारों में गिना जाता था, लेकिन ईरानी एयर डिफेंस ने इन्हें धूल चटा दी। यह स्पष्ट करता है कि ईरान ने अपने हथियारों का प्रदर्शन करने के बजाय उन्हें जरूरत पड़ने पर प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए बचाकर रखा था। युद्ध के साये में ट्रंप और करीबियों का मुनाफा एक तरफ जहां अमेरिकी सैनिक और सैन्य संपत्ति नष्ट हो रही थी, वहीं दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप और उनके करीबियों द्वारा युद्ध की स्थिति का आर्थिक लाभ उठाने की खबरें सामने आ रही हैं। शेयर बाजार में होने वाली उथल-पुथल को नियंत्रित करने के लिए अक्सर हमलों या समझौतों की खबरें फैलाई जाती हैं। रिपोर्टों के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) के दौरान ट्रंप और उनके करीबियों ने शेयर बाजार में 3700 से अधिक सौदे किए। औसतन हर दिन 40 बार शेयर खरीदे या बेचे गए। इस व्यापारिक गतिविधि से अकेले ट्रंप को 800 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई होने का अनुमान है। जिन कंपनियों के शेयरों में यह हेरफेर किया गया, उनमें एनवीडिया (Nvidia), माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft), अमेज़न (Amazon), ऑरेकल (Oracle) और कोस्टको (Costco) शामिल हैं। ये कंपनियाँ अमेरिकी सरकार की रक्षा नीतियों, एआई (AI) तकनीक और चिप निर्माण से सीधे जुड़ी हुई हैं। आरोप है कि सरकारी नीतियों और युद्ध की खबरों का इस्तेमाल करके इन शेयरों की कीमतों को जानबूझकर प्रभावित किया गया, जिसका फायदा ट्रंप के परिवार और उनके दामाद ने उठाया। अमेरिकी आम जनता की दुर्दशा और कानूनी कवच ट्रंप की इस व्यक्तिगत आर्थिक सफलता के विपरीत, अमेरिका की आम जनता इस युद्ध की भारी कीमत चुका रही है। गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं और ‘कोलटरल रेट्स’ यानी मकानों के ऋण पर ब्याज दरों में भारी वृद्धि हुई है, जिससे आम नागरिक आर्थिक संकट में हैं। विडंबना यह है कि ट्रंप ने अपने लिए एक ऐसा कानूनी कवच तैयार कर लिया है जिसके तहत राष्ट्रपति बनने से पहले, दौरान या बाद में किए गए उनके किसी भी व्यापारिक या राजनीतिक निर्णय पर कोई केस नहीं चलाया जा सकता। यह उन्हें किसी भी तरह की कानूनी जवाबदेही से मुक्त करता है। अहमदीनेजाद और गद्दारी की साजिश का रहस्य युद्ध के मैदान से इतर, ईरान के भीतर राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिशों के भी संकेत मिले हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इजरायल और अमेरिका ने ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के साथ मिलकर एक गुप्त योजना बनाई थी। इस कथित योजना का उद्देश्य ईरान के सर्वोच्च नेता (रहबर-ए-आजम) को हटाकर अहमदीनेजाद को सत्ता सौंपना था, जो अमेरिका और इजरायल के हितों के अनुसार काम करते। हालांकि, अहमदीनेजाद के इतिहास को देखते हुए इन दावों पर यकीन करना कठिन लगता है। वे हमेशा से इजरायल के कट्टर विरोधी रहे हैं और उन्होंने कई बार इजरायल को खत्म करने की बात की है। वे इस्लामिक क्रांति के कट्टर समर्थक रहे हैं और फिलीस्तीन के मुद्दे पर उनकी राय बहुत सख्त रही है। हाल ही में उन पर एक हमला भी हुआ था जिसमें उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। वर्तमान में अहमदीनेजाद कहां हैं, यह किसी को नहीं पता वे ईरान की हिरासत में हैं या किसी सुरक्षित स्थान पर, यह रहस्य बना हुआ है। यदि इन गद्दारी की खबरों में सच्चाई है, तो इसका अर्थ यह होगा कि अमेरिका को ईरान में लोकतंत्र या महिलाओं के अधिकारों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, बल्कि वे केवल पेट्रो-डॉलर और तेल-गैस संसाधनों पर नियंत्रण चाहते थे। अंतरराष्ट्रीय समीकरण: चीन, रूस और भारत मध्य पूर्व की यह जंग अब वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन गई है। बीजिंग में शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात के बाद, चीन ने चेतावनी दी है कि यदि यह युद्ध नहीं रुका तो दुनिया ‘जंगल राज’ की तरफ बढ़ जाएगी और अंतरराष्ट्रीय नियम बदल जाएंगे। ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के लिए जिनपिंग और पुतिन के भारत आने की भी संभावना है, जहां वे भारतीय नेतृत्व के साथ बातचीत कर सकते हैं। भारत के लिए इस संघर्ष ने एक बड़ी चुनौती पेश की है। भारत की सबसे बड़ी समस्या तेल की आपूर्ति है। रूस तेल देने को तैयार है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत इसे पूरी तरह से नहीं ले पा रहा है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इन प्रतिबंधों के सामने कितना झुकता है, क्योंकि अत्यधिक झुकाव भविष्य में भारत के लिए ऊर्जा संकट पैदा कर सकता है। निष्कर्ष: भविष्य की अनिश्चितता वर्तमान में भले ही एक अस्थिर युद्धविराम (Ceasefire) दिख रहा हो, लेकिन इजरायल लगातार अमेरिका को युद्ध के लिए भड़का रहा है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि यदि कोई बड़ी डील नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में फिर से हमले शुरू हो सकते हैं। दूसरी ओर, ईरान ने भी स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि दोबारा हमला हुआ, तो वे ‘जबरदस्त सरप्राइज’ देंगे। अमेरिका के लिए यह युद्ध न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सैन्य प्रतिष्ठा के लिहाज से भी विनाशकारी साबित हो रहा है। यदि 42 जहाजों के नुकसान का यह आंकड़ा और बढ़ता है, तो यह ट्रंप की अपनी राजनीतिक सत्ता के लिए भी खतरा बन सकता है। अंततः, यह स्पष्ट है कि युद्ध केवल सरहदों पर नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि यह शेयर बाजारों, खुफिया दस्तावेजों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में भी लड़ा जा रहा है, जहां मुनाफे की कीमत इंसानी जानों और वैश्विक शांति से चुकाई जा रही है। Kanthak Suryatal Post Views: 758 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation भारतीय नेतृत्वाची जागतिक प्रतिमा आणि राजनैतिक घर्षण देशाचे अर्थकारण: टॉफी, सेल्फी आणि कोलमडलेला रुपया एक गोड आर्थिक शोकांतिका