अरे भाई! हॉर्न ज़रा धीरे बजाओ… मुसलमान सो रहा है!

ज का दौर तेज़ रफ्तार, कड़ी प्रतिस्पर्धा और जागरूकता का दौर है। हर कौम शिक्षा, एकता और योजनाबद्ध तरीके से तरक्की कर रही है, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मुस्लिम समाज अभी भी गहरी लापरवाही की नींद में सोया हुआ है। हालात तेज़ी से बदल रहे हैं, खतरे की घंटियाँ बज रही हैं, लेकिन हम जागने के लिए तैयार ही नहीं हैं।
यह “हॉर्न” दरअसल एक प्रतीक है—एक चेतावनी, एक पुकार—जो हमें जगाने के लिए दी जा रही है। यह हमें याद दिलाता है कि हम अपनी जिम्मेदारियों से गाफिल हो चुके हैं। केंद्र और राज्य स्तर पर नए-नए कानून सामने आ रहे हैं, जैसे वक्फ संपत्ति, तीन तलाक, लव जिहाद, गौवंश, SIR आदि, लेकिन अफसोस कि हमारे युवाओं और जिम्मेदार लोगों में इनके बारे में अपेक्षित जागरूकता नहीं है।
आज हमारे युवाओं को शिक्षा, समाज और राजनीति के क्षेत्र में सबसे आगे होना चाहिए था, क्योंकि हमारी बुनियाद ही “इक़रा” (पढ़ो) से रखी गई थी। इस्लाम हमें न्याय, समानता, एकता और भाईचारे का संदेश देता है, लेकिन अफसोस कि आज हमारे युवा अपनी कीमती ऊर्जा होटलों, चायखानों और पान की दुकानों तक सीमित कर चुके हैं।
किसी ने क्या खूब कहा है:
“बेमकसद जिंदगी, जिंदगी नहीं बल्कि मौत है।”
आज हम अपने जीवन के उद्देश्य को भूलकर एक दिशाहीन जीवन जी रहे हैं। सवाल यह है कि इसके जिम्मेदार कौन हैं?
यकीनन इसके जिम्मेदार सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि माता-पिता और वे संगठन भी हैं जो खुद को समाज का रहनुमा कहते हैं।
हमारे शहर नांदेड़ में हाल ही में हुई हत्या की घटना और गैंगवार में मुस्लिम युवाओं की भागीदारी एक गंभीर चिंता का विषय है। कुरआन करीम ने हमें “खैर-ए-उम्मत” कहा था, लेकिन हमारे कर्म इसके विपरीत दिखाई देते हैं।
जो हो चुका सो हो चुका—अब समय है कि हम संभल जाएं, एक उद्देश्यपूर्ण जीवन अपनाएं और अपना खोया हुआ स्थान फिर से हासिल करें।
अब हमें क्या करना चाहिए?
युवाओं की सही मार्गदर्शन किया जाए और उनमें शैक्षणिक, नैतिक और धार्मिक जागरूकता पैदा की जाए।
रातभर होटलों और चायखानों में समय बर्बाद करने की आदत खत्म की जाए।
बुराइयों और अपराधों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जाए।
युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाकर उन्हें समाज और उम्मत के लिए तैयार किया जाए।
उनमें राजनीतिक जागरूकता पैदा की जाए ताकि वे अपने अधिकारों को पहचान सकें।
माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे अपनी औलाद की सही परवरिश करें, जबकि सामाजिक और धार्मिक संगठनों की जिम्मेदारी इससे भी ज्यादा अहम हो जाती है। उलेमा को चाहिए कि वे जुमे के खुत्बों में मौजूदा हालात पर रोशनी डालें और कुरआन व हदीस की रोशनी में मार्गदर्शन दें।
इसके अलावा “सुधार-ए-समाज” के नाम से एक मुहिम चलाई जाए और हर गली-मोहल्ले में पुरुषों और महिलाओं के लिए शैक्षणिक और सुधारात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
याद रखें!
अगर हम आज नहीं जागे, तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी। वक्त का तकाज़ा है कि हम खुद को बदलें, वरना जमाना हमें पीछे छोड़ देगा।
जागो! यह वक्त जागने का है—वरना बहुत देर हो जाएगी।
अभी नहीं तो कभी नहीं!

✍️ शेख इमरान
(संपादक: चौथा स्तंभ, नांदेड़)

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