नन्हे हाथों का आधा गिलास पानी, रिश्तों का पूरा प्यार कुछ रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं इस में जात धर्म को कोई स्थान नहीं होता और इंसान के जाने के बाद भी उनकी यादें दीलों में जीवित रहते हैं। मेरे प्रिय मित्र गुलाम भाई जी जिनकी मेरी दोस्ती लगभग तीस से पैंतींस वर्षे पुरानी है उनकी धर्मपत्नी, हमारी भाभीजी, बेहद मिलनसार और प्रेम से मेहमानों की आवभगत करने वाली थीं। उनके परिवार से मेरा वर्षों से गहरा भाईचारा रहा है। भाभीजी के देहांत के वक्त मैं नांदेड में नहीं होने से कुछ दिनों बाद मैं उनके परिवार से मिलने घर गया। बातचीत के दौरान उनका लगभग डेढ़ वर्ष का नन्हा पोता मेरी ओर देखकर बड़े अदब से बोला* आदाब!” मैं उसकी तहज़ीब देखकर भावुक हो गया। कुछ देर बाद वह खेलते-खेलते प्यासा हुआ। उसने गिलास का लगभग आधा पानी पिया और वही गिलास मेरे पास लाकर मेरी ओर गिलास बढा कर मासूमियत से बोला “पानी…” उस क्षण लगा, जैसे भाभीजी की मेहमाननवाज़ी उस नन्हे बच्चे के हाथों में फिर से जीवित हो उठी हो। गिलास में पानी आधा था, लेकिन उसमें भाभीजी की पूरी याद और पूरे परिवार के संस्कार दिखाई दे रहे थे। तभी समझ आया बच्चे हमारी बातों से कम और हमारा व्यवहार ज्यादा सीखते हैं। हम बड़ों का सम्मान करेंगे तो बच्चे सम्मान करना सीखेंगे। हम प्रेम बाँटेंगे तो उनके दिल में प्रेम पनपेगा। हम इंसानियत दिखाएँगे तो उनकी छोटी-छोटी हथेलियाँ भी इंसानियत बाँटना सीखेंगी। यह हर धर्म में बताई हुई बातें है इसलिए बच्चों को केवल अच्छी बातें बताना ही पर्याप्त नहीं है, हमें उनके सामने अच्छा व्यवहार, अच्छा बोलते हुये अच्छा बनकर जीना भी जरूरी है। क्योंकि बच्चों के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत धन-दौलत नहीं, हमारे संस्कार, हमारी तहज़ीब और हमारी इंसानियत हैं। भाभीजी को यही सच्ची श्रद्धांजलि है कि उनके प्रेम तहजीब और अच्छे संस्कार अपने परिवार को दीये है ऐसे ही हर एक ने घर में संस्कार दे कर आने वाली पीढ़ियों में जीवित रहें ऐसे कार्य करें। आधा गिलास पानी… और उसमें समाई रिश्तों की पूरी मिठास। राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर, नांदेड 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 129 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation धुक्याची दुलईचे २७ सप्टेंबर रोजी प्रकाशन