भाग – 4 जैसा कि हमने पिछले तीन भागों में देखा, केवल केशधारी सिक्ख होना ही गुरुद्वारा प्रबंधन के लिए पर्याप्त नहीं है। गुरु घर का प्रबंधन करने के लिए गुरु महाराज की मर्यादा, सिक्ख सिद्धांतों का गहरा ज्ञान, ऐतिहासिक परंपराओं की समझ, संगत की भावनाओं का सम्मान तथा निस्वार्थ सेवा-भाव आवश्यक है। स्वर्गीय सरदार तारा सिंघ जी के पश्चात महाराष्ट्र सरकार ने स्वर्गीय सरदार भूपेन्द्र सिंघ मिनास जी जैसे एक प्रतिष्ठित उद्योगपति, ईमानदार, कर्मठ एवं गुरु घर की सेवा को अपना धर्म मानने वाले व्यक्तित्व को गुरुद्वारा बोर्ड का सरकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। उनके व्यक्तित्व, ईमानदारी और सेवा-भाव पर किसी प्रकार का प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। उनका उद्देश्य भी निश्चित रूप से गुरु घर की सेवा करना ही था। किन्तु समय ने यह सिद्ध किया कि गुरुद्वारा प्रबंधन केवल प्रशासनिक क्षमता, व्यावसायिक अनुभव या आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं चलाया जा सकता। सचखंड श्री हजूर साहिब जैसे महान ऐतिहासिक तख्त का प्रबंधन उस व्यक्ति के हाथ में होना चाहिए, जो गुरु घर की मर्यादा, सिक्ख इतिहास, परंपराओं तथा लाखों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आत्मा से समझता हो। इसी सोच के अंतर्गत शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंघ जी यात्री निवास, जहाँ वर्षों से देशभर से आने वाले साधारण एवं मध्यमवर्गीय श्रद्धालुओं को सम्मानपूर्वक और किफायती आवास मिलता था तथा जिससे गुरुद्वारा बोर्ड को भी नियमित आय प्राप्त होती थी, उसे हटाकर पाँच सितारा सुविधाओं वाली नई इमारत की परिकल्पना की गई। इस योजना के प्रचार-प्रसार तथा अन्य कार्यों पर भी गुरुद्वारा बोर्ड का बड़ा धन व्यय हुआ। आज भी यह प्रश्न संगत के मन में है कि जिस भवन से श्रद्धालुओं को सुविधा मिल रही थी, गुरुद्वारा बोर्ड को आय प्राप्त हो रही थी और गुरु घर की सेवा निरंतर चल रही थी, उसे समाप्त करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? उस निर्णय से संगत की भावनाएँ आहत हुईं और गुरुद्वारा की अमूल्य संपत्ति एवं संसाधनों का भी बड़ा नुकसान हुआ, जिसकी पीड़ा आज भी अनेक श्रद्धालु अनुभव करते हैं। इस अनुभव से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है। बड़े उद्योगपति, उच्च अधिकारी अथवा बड़े राजनीतिक पदों पर कार्यरत व्यक्ति अपनी अन्य जिम्मेदारियों के कारण प्रायः गुरु घर के प्रबंधन के लिए आवश्यक समय नियमित रूप से नहीं दे पाते। सचखंड श्री हजूर साहिब जैसे विश्वप्रसिद्ध तख्त का प्रबंधन केवल बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रतिदिन संगत की समस्याओं को सुनने, व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने, मर्यादा का पालन सुनिश्चित करने तथा प्रत्येक निर्णय में गुरु घर की भावना को सर्वोच्च रखने की सतत जिम्मेदारी है। इसके अतिरिक्त ऐसे पदाधिकारियों के आधिकारिक दौरे, बैठकों, आवागमन तथा अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर होने वाला व्यय भी अंततः गुरुद्वारा बोर्ड के संसाधनों पर अतिरिक्त आर्थिक भार बन सकता है। इसलिए गुरु घर की प्रत्येक पाई का उपयोग संगत की सुविधा, सेवा, शिक्षा, धर्म प्रचार और ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए होना चाहिए। इसीलिए सचखंड श्री हजूर साहिब जैसे पवित्र तख्त का प्रबंधन केवल ऐसे समर्पित सिक्ख सेवकों के हाथों में होना चाहिए, जिनकी रग-रग में गुरु घर की सेवा बसती हो, जो गुरु महाराज के समय से चली आ रही मर्यादा और परंपराओं को जानते हों, जिनके पास गुरु घर के लिए पर्याप्त समय हो तथा जो साधारण संगत की आवश्यकताओं और भावनाओं को सर्वोच्च स्थान देते हों। ऐसे अनुभवी, समर्पित और मर्यादा-निष्ठ सेवक हजूर साहिब और मराठवाड़ा की उसी ऐतिहासिक परंपरा में आज भी उपलब्ध हैं, जिन्होंने लगभग 350 वर्षों से गुरु घर की सेवा और मर्यादा को सुरक्षित रखा है। इसलिए महाराष्ट्र सरकार से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि— – सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड अधिनियम, 1956 को यथावत रखा जाए। – कलम 11 में किया गया संशोधन तत्काल रद्द किया जाए। – गुरुद्वारा बोर्ड का संचालन ऐसे सेवाभावी, मर्यादा-निष्ठ और पूर्ण समय देने वाले सिक्ख व्यक्तियों के हाथों में ही रखा जाए, जो गुरु घर की परंपरा और संगत की भावनाओं का सम्मान करते हों। यह केवल एक कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि करोड़ों सिक्ख श्रद्धालुओं की आस्था, गुरु महाराज की मर्यादा और आने वाली पीढ़ियों की धार्मिक धरोहर की रक्षा का विषय है। आइए, हम सब मिलकर एक स्वर में आग्रह करें— “1956 का कानून सुरक्षित रहे, कलम 11 का संशोधन रद्द हो, और सचखंड श्री हजूर साहिब की मर्यादा अक्षुण्ण रहे।” क्रमशः… (भाग – 5) – राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनर, नांदेड मो.: 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 538 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation शंकर विद्यालयात घुमला विठुनामाचा गजर उद्धव ठाकरे यांच्या वाढदिवसानिमित्त नांदेड शहरात शालेय साहित्य वाटप