अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव और युद्ध की आहट के बीच एक बेहद चौंकाने वाली और महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। प्राप्त जानकारी और आधिकारिक बयानों के अनुसार, आखिरकार दोनों देशों के बीच एक बड़े समझौते (Peace Deal) पर सहमति बनने की खबरें आ रही हैं। इस समझौते को ईरान की एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इसके तहत अमेरिका ईरान को भारी-भरकम राशि देने और अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार होता दिख रहा है।
$300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज
इस संभावित सौदे का सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा का विषय 300 अरब डॉलर (लगभग 25.5 लाख करोड़ भारतीय रुपये) की वह राशि है, जिसे अमेरिका ईरान को देने पर सहमत हुआ है। स्रोतों के अनुसार, यह राशि मुआवजे या ‘पुनर्निर्माण कोष’ के रूप में दी जाएगी। ईरान का पक्ष शुरू से ही स्पष्ट रहा है कि वह न केवल अमेरिकी सेनाओं को क्षेत्र से बाहर करेगा, बल्कि अपने उन नुकसानों की भरपाई भी सुनिश्चित करेगा जो अमेरिकी और इजरायली हमलों के कारण हुए हैं। यह 300 अरब डॉलर का उपयोग ईरान के भीतर उन बुनियादी ढांचों के पुनर्निर्माण के लिए किया जाएगा जो बमबारी और मिसाइल हमलों में तबाह हो गए थे, जिनमें विशेष रूप से अस्पताल, विश्वविद्यालय, स्कूल, कॉलेज और अन्य सार्वजनिक इमारतें शामिल हैं।
समझौते की रूपरेखा और 60 दिनों की समय सीमा
दोनों देशों के राजनयिकों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस प्रारंभिक समझौते में 60 दिनों की एक शुरुआती अवधि तय की गई है। इस अवधि का मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच शत्रुता को पूरी तरह समाप्त करना और बातचीत के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार करना है।
इस 60 दिनों के ‘सीजफायर’ या शांति काल के दौरान निम्नलिखित प्रक्रियाएं अपनाई जाएंगी:
- अंतिम रूपरेखा (Final Framework): इन 60 दिनों में दोनों पक्ष मिलकर समझौते का पूरा मसौदा तैयार करेंगे और यह तय करेंगे कि आगे कौन-कौन सी तब्दीलियां की जा सकती हैं।
- युद्ध समाप्ति की घोषणा: पहले आधिकारिक तौर पर युद्ध समाप्ति की घोषणा की जाएगी और उसके बाद ही यह 60 दिनों का समय शुरू होगा।
- परमाणु मुद्दे पर रोक: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परमाणु मुद्दे पर बातचीत को फिलहाल भविष्य के लिए टाल दिया गया है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पहले अपना पैसा ($300 अरब) और अपनी फ्री की गई संपत्ति वापस लेगा, उसके बाद ही परमाणु कार्यक्रम पर कोई चर्चा संभव होगी।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और समुद्री सुरक्षा
समुद्री व्यापार के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक, हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी इस डील में बड़ी सहमति बनी है। समझौते के तहत, हॉर्मुज से जहाजों की बिना किसी रोक-टोक के आवाजाही की अनुमति दी जाएगी। ईरान की नई संस्था, पर्शियन गल्फ स्टेट अथॉरिटी’ (PGSA) ने दावा किया है कि अमेरिका न तो युद्ध के जरिए और न ही कूटनीति के जरिए हॉर्मुज पर नियंत्रण पाने में सफल हो सका है। पीजीएसए ने स्पष्ट किया है कि वे मित्र देशों के जहाजों को नेविगेशन की अनुमति देते रहेंगे, जबकि अमेरिका उन पर अवैध शुल्क वसूली का आरोप लगाता रहा है। यह स्पष्ट है कि ईरान ने इस रणनीतिक मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत रखी है और अमेरिका को इस मोर्चे पर भी पीछे हटना पड़ा है।
ईरान का आधिकारिक रुख और ट्रंप की बयानबाजी
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने इस समझौते को लेकर कुछ महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिए हैं। उन्होंने सरकारी मीडिया को बताया कि हालांकि संदेशों का आदान-प्रदान जारी है, लेकिन समझौता अभी ‘अंतिम’ रूप से तय नहीं हुआ है। ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन दावों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि परमाणु सामग्री को नष्ट करने जैसी शर्तें समझौते का हिस्सा हैं। ईरान का मानना है कि ट्रंप के बयान सच और झूठ का मिलाजुला रूप हैं और वे केवल अपनी साख बचाने के लिए ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं। ईरान के अनुसार, अमेरिका अपनी ‘फजीहत’ से बचने के लिए और घरेलू स्तर पर उठ रहे सवालों से ध्यान भटकाने के लिए इन खबरों को अपने तरीके से पेश कर रहा है।
इब्राहिम समझौते (Abraham Accords) का विरोध
इस सौदे में एक और बड़ा पेच इब्राहिम समझौते को लेकर है। डोनाल्ड ट्रंप ने कोशिश की थी कि ईरान इस समझौते को स्वीकार कर ले, जिसके तहत मुस्लिम देशों को इजराइल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करने होते हैं। हालांकि, ईरान ने इसे सिरे से नकार दिया है। भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतेह अली ने स्पष्ट किया है कि कोई भी क्षेत्रीय शांति ढांचा जमीनी हकीकत पर आधारित होना चाहिए, न कि विदेशी दबाव पर। ईरान का मानना है कि इजराइल का अस्तित्व ही अवैध है और वह अरब देशों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए इजराइल के साथ किसी भी प्रकार के संबंधों को थोपे जाने का विरोध करता है।
निष्कर्ष और भविष्य की संभावनाएं
यह समझौता, यदि पूरी तरह लागू होता है, तो इसे डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी महाशक्ति के लिए एक बड़ा झटका माना जा सकता है। $300 अरब डॉलर देने की सहमति और ईरान की शर्तों के आगे झुकना यह दर्शाता है कि ईरान अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल रहा है। हालांकि, ईरान अभी भी सतर्क है। ईरान का मानना है कि दुश्मन की शांति और खामोशी हर बार समझौता नहीं होती। इसलिए, ईरान अपनी सैन्य और रणनीतिक तैयारी जारी रखेगा ताकि यदि भविष्य में स्थिति बदलती है, तो वह मुकाबला करने के लिए तैयार रहे। दुनिया के लिए यह एक राहत भरी खबर है क्योंकि इससे एक बड़े वैश्विक युद्ध का खतरा कम हो सकता है, लेकिन इस समझौते के पूर्ण कार्यान्वयन पर अभी भी सवालिया निशान बने हुए हैं जब तक कि अमेरिकी सेनाएं पूरी तरह क्षेत्र से बाहर नहीं निकल जातीं।
