ईरान के मुद्दे पर दुनिया के दो सबसे चर्चित नेताओं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद अब सार्वजनिक हो चुके हैं। गजा पट्टी में हजारों निर्दोषों की जान लेने वाली नीतियों के पीछे खड़े ये दोनों नेता अब ईरान के सवाल पर एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। यह स्थिति न केवल इन दोनों देशों के संबंधों के लिए, बल्कि मध्य पूर्व के उन देशों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है जो अमेरिका को अपना रक्षक मानते आए हैं। नेतन्याहू बनाम ट्रंप: फोन पर तीखी बहस सीएनएन की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान पर हमले को लेकर दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक फोन पर तीखी बातचीत हुई। इस बातचीत में नेतन्याहू ने स्पष्ट रूप से कहा कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई जारी रहनी चाहिए और हमलों को रोकना एक भारी गलती होगी। उन्होंने ट्रंप को चेतावनी देते हुए यहाँ तक कह दिया कि यदि वे पीछे हटते हैं, तो इतिहास आपको बहुत संदिग्ध नजरों से देखेगा। दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप फिलहाल सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और किसी डील (समझौते) को मौका देना चाहते हैं। ट्रंप ने नेतन्याहू को बताया था कि अमेरिका ईरान पर नए टारगेटेड हमलों की तैयारी कर रहा है, लेकिन अचानक उनके सुर बदल गए। ऑपरेशनों की विफलता और स्लेज हैमर का अंत ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल ने समय-समय पर कई सैन्य ऑपरेशनों की योजना बनाई, लेकिन वे सफल नहीं रहे। पिछले साल अमेरिका ने ऑपरेशन मिडनाइट हैमर (अर्धरात्रि का हथौड़ा) चलाया था, जिसका ईरान ने कड़ा जवाब दिया। इसके बाद अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (अतुलनीय क्रोध) की योजना बनाई, जिससे वह बाद में पीछे हट गया। इजराइल ने भी अपनी ओर से ऑपरेशन रोरिंग लायन (गरजता हुआ शेर) का नाम दिया था, लेकिन स्रोतों के अनुसार अब वह स्थिति बदल चुकी है। हाल ही में ट्रंप ने नेतन्याहू के सामने एक नए ऑपरेशन का खाका रखा था, जिसे ऑपरेशन स्लेज हैमर (कुचल देने वाला हमला) नाम दिया जाना था। लेकिन इस घोषणा के महज 24 घंटे के भीतर ही ट्रंप ने ईरान पर हमलों को रोकने का फैसला सुना दिया। ट्रंप का तर्क था कि कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों की अपील पर उन्होंने यह कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट की पाबंदियाँ: ट्रंप के बंधे हाथ ट्रंप के अचानक पीछे हटने की एक बड़ी वजह घरेलू राजनीति भी है। अमेरिकी सीनेट ने ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला एक प्रस्ताव पारित कर दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ट्रंप की अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने उनके खिलाफ वोट किया। इसका अर्थ यह है कि अब ईरान के खिलाफ किसी भी युद्ध को जारी रखने के लिए ट्रंप को अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी लेनी अनिवार्य होगी। हालांकि, ट्रंप अपनी सार्वजनिक बयानबाजी में अभी भी ईरान पर हावी होने का दावा कर रहे हैं। यूएस कोस्ट गार्ड एकेडमी में उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायु सेना लगभग खत्म हो चुकी है और अब केवल यह देखना बाकी है कि ईरान समझौता करता है या अमेरिका पूरी कार्रवाई करेगा। होरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और वैश्विक खाद्य संकट युद्ध की इन धमकियों के बीच जमीन पर स्थिति अलग है। ईरान की आईआरजीसी (IRGC) ने दावा किया है कि होरमुज जलडमरूमध्य पर उनका नियंत्रण बरकरार है और पिछले 24 घंटों में वहां से गुजरने वाले 26 जहाजों को ईरानी अधिकारियों से मंजूरी लेनी पड़ी। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने चेतावनी दी है कि यदि होरमुज के रास्ते में रुकावट आती है, तो दुनिया में खाद्य संकट और महंगाई तेजी से बढ़ सकती है। यूएई इस खतरे को देखते हुए होरमुज को बाईपास करने वाली एक नई तेल पाइपलाइन बना रहा है, जिसका 50% काम पूरा हो चुका है। कूटनीतिक बदलाव और इजराइल की दुष्टता तनाव के बीच कुछ कूटनीतिक सफलताएं भी देखने को मिली हैं। अमेरिका द्वारा जब्त किए गए जहाज पर सवार 20 ईरानी नाविकों को रिहा कर दिया गया है, जो पाकिस्तान और सिंगापुर के विदेश मंत्रियों के साथ हुई बातचीत के बाद तेहरान लौट आए हैं। वहीं दूसरी ओर, इजराइल पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लग रहे हैं। इजराइल ने गजा जा रहे फ्लोटिला (जहाजों का बेड़ा) से जुड़े कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया और अब उन्हें डिपोर्ट कर रहा है। इस मुद्दे पर पोलैंड ने कड़ा रुख अपनाया है, क्योंकि उसके दो नागरिक भी इजराइली हिरासत में थे। पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाओ सिकोरस्की ने इजराइली अधिकारियों को तलब कर अंतरराष्ट्रीय मानकों के पालन की मांग की है। निष्कर्ष ईरान के मुद्दे ने न केवल ट्रंप और नेतन्याहू के बीच की दरार को उजागर किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका की पकड़ पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां नेतन्याहू युद्ध की आग को ठंडा नहीं होने देना चाहते, वहीं ट्रंप घरेलू राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच फंस गए हैं। ऑपरेशन स्लेज हैमर का टलना यह दर्शाता है कि ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ना अब उतना आसान नहीं रहा जितना पहले समझा जाता था। Kanthak Suryatal Post Views: 751 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation वाहतूक ठेकेदारी मध्ये दादागिरी आणि मोदकांच्या मदतीने काम करणाऱ्या ठेकेदारांना उच्च न्यायालयाची चपराक तीन आठवडयांत (1215) गुन्हे दाखल, 16 कोटी 54 लाखांचा मुद्देमाल हस्तगत