आज का भारत एक ऐसे बंद कमरे की तरह बन चुका है, जिसकी कुंडी अंदर से तो बंद है, लेकिन बाहर से कोई अंदर नहीं आ सकता। यह कमरा हमारी अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति का प्रतीक है, जहाँ से देश का पैसा और चैन-ओ-अमन तो बाहर जा सकता है, पर बाहर से खुशहाली अंदर नहीं आ सकती। आखिर यह सब मुमकिन कैसे हो रहा है? यह मुमकिन हो रहा है उस बिकाऊ मीडिया की बदौलत, जिसने सरकार पर चेक एंड बैलेंस रखना पूरी तरह छोड़ दिया है।

फर्जी इतिहास का गंदा खेल
हाल ही में एनडीटीवी (NDTV) ने झूठ और मक्कारी का एक ऐसा चक्रव्यूह रचा, जिसने पत्रकारिता की साख को तार-तार कर दिया है। इन्होंने एक प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश की कि इंदिरा गांधी ने भी कभी देशवासियों से सोना न खरीदने की अपील की थी। इसके लिए द हिंदू (The Hindu) अखबार का एक ऐसा पेज सोशल मीडिया पर वायरल किया गया जो पूरी तरह से फ्रॉड और फेक था। जिस तारीख का वह अखबार ट्रोल आर्मी के जरिए साझा किया जा रहा था, उस दिन के वास्तविक द हिंदू में तो अरब देशों और इजराइल के बीच चल रहे भयानक युद्ध की खबरें छपी थीं।
यह सब इसलिए किया गया ताकि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सोना न खरीदने की अपील को जायज ठहराया जा सके। सत्ता की चाटुकारिता में यह मीडिया घराने इतने गिर चुके हैं कि उन्हें झूठ परोसने में अब कोई शर्म महसूस नहीं होती। जो प्रधानमंत्री अपनी हर सभा में नेहरू और इंदिरा गांधी को कोसते नहीं थकते, आज उनकी ही ट्रोल आर्मी और मीडिया को अपने झूठ को छिपाने के लिए उन्हीं इंदिरा गांधी की शरण में जाना पड़ रहा है। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जिस आपातकाल की याद में सरकार स्मृति दिवस मनाती है, उसी कालखंड के फर्जी किस्से सुनाकर आज अपनी विफलताओं को ढका जा रहा है।


स्वर्णिम पत्रकारिता या सत्ता की गुलामी?
इस देश में गोल्डन जर्नलिज्म (स्वर्णिम पत्रकारिता) के नाम पर जो तमाशा एनडीटीवी और टीवी 18 जैसे चैनल कर रहे हैं, वह निहायत ही शर्मनाक है। रूबिका लियाकत जैसी एंकर एक ज्वेलर (सुधीर सिंह सिंघल) का इंटरव्यू करती हैं, जो कैमरे के सामने घड़ियाली आंसू बहाते हुए कहता है कि वह सोना नहीं बेचेगा क्योंकि प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा है। यह सरासर फर्जीवाड़ा है। अरबों में खेलने वाले ये लोग जब टीवी पर आकर रोते हैं, तो हंसी आती है। अगर वाकई इन्हें देश की इतनी ही चिंता है, तो इन्हें अपना शोरूम ही बंद कर देना चाहिए, लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करेंगे।
असली समस्या यह नहीं है कि कोई प्रधानमंत्री महामानव बनने की कोशिश कर रहा है, समस्या उन मीडिया घरानों में है जो चोरों को फकीर बनाकर पेश कर रहे हैं। एनडीटीवी जैसा ब्रांड, जिसकी कभी अपनी एक साख थी, आज अपनी रिसर्च टीम की घटिया गुणवत्ता या फिर जानबूझकर गढ़े गए फेक नरेटिव के कारण बर्बाद हो चुका है। जब देश के लोग दाने-दाने को मोहताज हो रहे हों, तब मीडिया यह नैरेटिव चलाता है कि तेल कम खाना, तेल कम जलाना और सोना न खरीदना ही राष्ट्र प्रेम है।
महंगाई का तांडव और सरकार की लाचारी
सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री ने तेल कम खाने की सलाह आपकी सेहत सुधारने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए दी है क्योंकि आने वाले दिनों में कीमतों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहने वाला। डीजल, पेट्रोल और गैस सिलेंडर की कीमतें जिस तरह से हाहाकारी रूप ले चुकी हैं, वह आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं। जब ईंधन महंगा होता है, तो रोजमर्रा की हर चीज महंगी हो जाती है, और इसका सबसे बुरा असर उस गरीब पर पड़ता है जो रोज कमाता और रोज खाता है।
लेकिन मीडिया इस दर्द को दिखाने के बजाय यह साबित करने में जुटा है कि महंगाई सहना ही देश सेवा और देह सेवा है। यह पूरी तरह से एक संगठित फर्जीवाड़ा है, जहाँ टीवी एंकर यह दावा करते हैं कि देश के सभी ज्वेलर मोदी जी के साथ हैं, जबकि हकीकत में छोटे सर्राफा व्यापारी अपनी रोजी-रोटी छिनने के डर से चिल्ला रहे हैं।

अडानी-मोदी और मीडिया का नापाक गठबंधन
आज एनडीटीवी के मालिक अडानी हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी के परम मित्र हैं। इसलिए यह महज कोई इत्तेफाक नहीं है कि यह चैनल फर्जी खबरें फैला रहा है। सच तो यह है कि मोदी अडानी के लिए काम करते हैं और अडानी मोदी के लिए, और ये दोनों मिलकर इस देश के लोकतंत्र के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। एनडीटीवी के संपादक राहुल कंवल, जिनका इतिहास ही विवादित खबरों से भरा रहा है, आज इस संस्थान की विश्वसनीयता को पूरी तरह खत्म करने पर उतारू हैं।
पत्रकारिता का यह दौर भयावह है, जहाँ हजारों करोड़ का मीडिया साम्राज्य सिर्फ इसलिए खड़ा किया गया है ताकि सच को झूठ और झूठ को सच साबित किया जा सके। लेकिन इन्हें याद रखना चाहिए कि जनता अब टेलीविजन से दूर हो रही है। रिपोर्ट बताती हैं कि अब केवल 32% लोग ही टीवी देखते हैं, जबकि 68% से ज्यादा लोग मोबाइल पर खबरें देख रहे हैं। टेलीविजन पत्रकारिता का अंत निश्चित है क्योंकि इसकी विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
निष्कर्ष: अब जागने का वक्त है
टेलीविजन के संपादक और मालिक अपने आकाओं की चरण वंदना में इतने अंधे हो चुके हैं कि उन्हें देश के लोकतंत्र की कोई परवाह नहीं है। एनडीटीवी को इस फर्जीवाड़े के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए, लेकिन क्या वे ऐसा करेंगे?। हमें अपनी मीडिया, अपने अखबारों और टीवी चैनलों को रोज तौलना और परखना होगा। यह समय ‘लकीर के फकीरों’ का नहीं, बल्कि सवाल पूछने वालों का है। अगर हम आज नहीं जागे, तो यह भयावह माहौल हमारे लोकतंत्र को पूरी तरह निगल जाएगा।
सावधान रहिए, क्योंकि आपके ड्राइंग रूम में रखा टीवी अब खबरें नहीं, बल्कि जहरीला प्रोपेगेंडा और फर्जी नैरेटिव परोस रहा है।
