सिक्ख धर्म में किस्मत (भाग्य) और लक (Luck) का क्या महत्व है? 

आज के समय में अक्सर हम सुनते हैं— “मेरी किस्मत खराब है”, “उसका लक अच्छा है” या “जो किस्मत में लिखा है वही होगा।” परंतु क्या वास्तव में सिक्ख धर्म भी यही शिक्षा देता है?

उत्तर है— नहीं।

सिक्ख धर्म भाग्य (किस्मत) के अस्तित्व को स्वीकार करता है, लेकिन भाग्य के भरोसे बैठ जाना गुरमत नहीं है। गुरमत हमें किरत (मेहनत), नाम-सिमरन, सेवा और वाहेगुरु जी की कृपा (नदर) पर विश्वास करना सिखाती है।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में फरमान है

गुरुमुखी लिपि :
ਕਰਮੀ ਆਵੈ ਕਪੜਾ ਨਦਰੀ ਮੋਖੁ ਦੁਆਰੁ ॥

देवनागरी लिपि :
करमी आवै कपड़ा, नदरी मोखु दुआरु॥

हिंदी अर्थ :
मनुष्य को शरीर उसके कर्मों के अनुसार प्राप्त होता है, परंतु मुक्ति का द्वार केवल परमात्मा की कृपा (नदर) से ही खुलता है।
(जपुजी साहिब, पउड़ी 1)

अर्थात केवल किस्मत या केवल कर्म ही पर्याप्त नहीं हैं। परमात्मा की कृपा सर्वोपरि है।

एक अन्य स्थान पर गुरबाणी फरमाती है

गुरुमुखी लिपि :
ਵਡਭਾਗੀ ਹਰਿ ਸੰਗਤਿ ਪਾਈਐ ॥

देवनागरी लिपि :
वडभागी हरि संगति पाईऐ॥

हिंदी अर्थ :
बड़े भाग्य से साध-संगत तथा परमात्मा का मिलाप प्राप्त होता है।

गुरमत के अनुसार सबसे बड़ा भाग्य धन, पद या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि गुरु की शरण, साध-संगत और नाम की प्राप्ति है।

इसी प्रकार गुरबाणी में आता है

गुरुमुखी लिपि :
ਧੁਰਿ ਕਰਮਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋਈ ਪਾਇਆ ॥

देवनागरी लिपि :
धुरि करमि लिखिआ सोई पाइआ॥

हिंदी अर्थ :
धुर दरगाह (परमात्मा) से जो लिखा गया है, वही मनुष्य को प्राप्त होता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य कर्म करना छोड़ दे। गुरु साहिबान ने कभी भाग्यवाद नहीं सिखाया।

इसीलिए सिक्ख धर्म का जीवन-सिद्धांत है

👉 किरत करो।
👉 नाम जपो।
👉 वंड छको।

यही सच्चे सिक्ख का जीवन है।

यदि केवल किस्मत से सब कुछ मिल जाता, तो गुरु साहिबान मेहनत, सेवा, ईमानदार कमाई और मानवता की सेवा का उपदेश कभी न देते।

🌹 निष्कर्ष

सिक्ख धर्म का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है

* किस्मत है, लेकिन उससे बड़ा कर्म है।
* कर्म से भी बड़ा गुरु का मार्ग है।
* और सबसे बड़ा वाहेगुरु जी की नदर (कृपा) है।

इसलिए किसी भी परिस्थिति में निराश होकर केवल किस्मत को दोष देना गुरमत नहीं है। सच्चा सिक्ख मेहनत करता है, गुरु की आज्ञा में चलता है, नाम जपता है और वाहेगुरु जी की रज़ा को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ता है।

🌹 एक अच्छी सीख

“जो मनुष्य ईमानदारी से किरत करता है, गुरु की शिक्षा पर चलता है, नाम जपता है और वाहेगुरु जी की कृपा पर विश्वास रखता है, वही वास्तव में सबसे बड़ा भाग्यशाली है।” वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।

– राजेंद्र सिंघ शाहू

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