अंतरराष्ट्रीय राजनीति और मध्य-पूर्व की स्थिति इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है। पिछले कुछ दिनों में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है। ये घटनाएं केवल क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शांति को प्रभावित करने वाली हैं। सबसे बड़ा और पहला विकास यह है कि जिस जवाब का इंतजार अमेरिका को ईरान से था, वह जवाब सीधे अमेरिका को नहीं बल्कि पाकिस्तान के माध्यम से दिया गया है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि अब बातचीत केवल युद्ध समाप्त करने के लिए होगी, न कि केवल सीज़फायर यानी अस्थायी युद्धविराम के लिए। ईरान का कहना है कि अतीत में कई जगह सीज़फायर हुए, लेकिन हमले जारी रहे। इसलिए अब स्थायी समाधान चाहिए लिखित समझौता, जिसमें भविष्य में हमले न करने की गारंटी हो। ईरान ने यह भी साफ किया है कि यदि युद्ध समाप्त करने की बात होगी तो उसका दायरा केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। ग़ज़ा और लेबनान में चल रहे संघर्षों को भी उसी समझौते का हिस्सा बनाना होगा। इसमें हिज़बुल्ला जैसे समूहों को भी शामिल किया जाएगा। यानी ईरान क्षेत्रीय शांति को एक व्यापक पैकेज के रूप में देख रहा है। न्यूक्लियर मुद्दे पर भी ईरान ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। उसने कहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत करने के लिए तैयार है, लेकिन वह अपना एनरिच्ड यूरेनियम देश से बाहर नहीं भेजेगा और न ही उसे नष्ट करेगा। इसके साथ ही ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों से मांग की है कि प्रतिबंधों के कारण दुनिया भर में फ्रीज़ की गई उसकी संपत्तियों को मुक्त किया जाए ताकि वह अपने आर्थिक संसाधनों का उपयोग कर सके। ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ का भी है। ईरान ने संकेत दिया है कि वह इस क्षेत्र में कुछ लचीलापन दिखा सकता है, लेकिन इसके लिए अमेरिका को पहले अपना समुद्री दबाव और ब्लॉकेड हटाना होगा। यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ती जा रही है। तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की स्थिति में पूरी दुनिया आर्थिक दबाव महसूस कर सकती है। दुनिया भर में ऊर्जा संकट की तैयारी शुरू हो चुकी है। कई देशों ने ऊर्जा बचत के उपायों पर जोर दिया है। भारत सहित कई राष्ट्र नागरिकों से ईंधन बचाने, अनावश्यक यात्रा कम करने और संसाधनों का संयमित उपयोग करने की अपील कर रहे हैं। स्विट्जरलैंड जैसे विकसित देशों तक ने ऊर्जा आपातकाल जैसी स्थिति घोषित कर दी है। इससे स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व का संघर्ष अब वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। इस बीच ईरान के भीतर भी राजनीतिक और सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। नए सुप्रीम लीडर माने जा रहे आयतुल्लाह मुस्तफा खामनाई लगातार सैन्य अधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। उन्हें सेना, रिवोल्यूशनरी गार्ड, सीमा सुरक्षा बल और रक्षा मंत्रालय की तैयारियों पर विस्तृत रिपोर्ट दी गई है। ईरानी नेतृत्व का संदेश स्पष्ट है। यदि अमेरिका या इज़राइल ने कोई रणनीतिक गलती की, तो उसका तेज और कठोर जवाब दिया जाएगा। ईरान की सैन्य कमान ने भी सर्वोच्च नेतृत्व को आश्वस्त किया है कि देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा अंतिम सांस तक की जाएगी। यह बयान केवल सैन्य मनोबल का प्रदर्शन नहीं बल्कि विरोधियों के लिए चेतावनी भी माना जा रहा है। इसी दौरान हिज़बुल्ला ने एक वीडियो फुटेज जारी किया है जिसमें उसके एफपीवी ड्रोन इज़राइली रक्षा प्रणाली पर हमला करते दिखाई देते हैं। यह संदेश देने की कोशिश है कि आधुनिक युद्ध अब केवल मिसाइलों से नहीं बल्कि ड्रोन तकनीक से भी लड़ा जा रहा है। इससे युद्ध का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। मध्य-पूर्व में तनाव का एक और पहलू संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से जुड़ी खबरों में सामने आया। कुछ मिसाइल घटनाओं के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, हालांकि ईरान ने सीधे तौर पर जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की। साथ ही ईरान ने चेतावनी दी कि यदि उसके खिलाफ किसी भी देश ने सैन्य कार्रवाई की, तो उसे युद्ध माना जाएगा। राजनयिक मोर्चे पर भी हलचल तेज है। तुर्की, कतर, पाकिस्तान और रूस जैसे देश युद्ध समाप्त कराने की कोशिशों में सक्रिय हैं। खासकर कतर की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसने अपने एयरस्पेस के सैन्य उपयोग पर सीमाएं लगाकर तनाव कम करने का संकेत दिया है। इज़राइल की ओर से हालांकि अलग रुख देखने को मिल रहा है। इज़राइली नेतृत्व का कहना है कि जब तक ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम पूरी तरह हटाया नहीं जाता, तब तक युद्ध समाप्त नहीं माना जाएगा। यही मतभेद संभावित समझौते को जटिल बना रहा है। युद्ध के प्रभाव केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय भी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान में कई ऐतिहासिक स्मारक हमलों में क्षतिग्रस्त हुए हैं। इससे वैश्विक विरासत और सांस्कृतिक पहचान पर भी खतरा पैदा हुआ है। साथ ही सामाजिक तनाव भी बढ़ रहा है। यूएई से बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिकों को वापस भेजे जाने की खबरें सामने आई हैं, जिनमें अधिकांश शिया समुदाय से जुड़े बताए जा रहे हैं। इससे क्षेत्रीय धार्मिक और सामाजिक संतुलन पर भी असर पड़ सकता है। युद्ध की पृष्ठभूमि में खुफिया गतिविधियों की चर्चा भी तेज है। इराक में कथित तौर पर एक गुप्त एयरस्ट्रिप मिलने की खबरें आई हैं, जिससे संकेत मिलता है कि इस संघर्ष की तैयारी वर्षों से चल रही थी। यह दिखाता है कि आधुनिक युद्ध केवल मैदान में नहीं बल्कि खुफिया रणनीतियों और दीर्घकालिक योजनाओं के आधार पर लड़े जाते हैं। कुल मिलाकर स्थिति बेहद जटिल और संवेदनशील है। ईरान स्थायी शांति समझौते की बात कर रहा है, जबकि इज़राइल और अमेरिका सुरक्षा गारंटी और परमाणु नियंत्रण को प्राथमिकता दे रहे हैं। दुनिया ऊर्जा संकट, आर्थिक दबाव और संभावित सैन्य विस्तार की आशंका के बीच खड़ी है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि कूटनीति जीतती है या टकराव और गहरा होता है। फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या युद्ध वास्तव में समाप्ति की ओर बढ़ेगा या फिर यह संघर्ष एक बड़े वैश्विक संकट में बदल जाएगा। यही थे प्रमुख घटनाक्रम जिनका असर केवल मध्य-पूर्व नहीं बल्कि पूरी मानवता पर पड़ने वाला है। Kanthak Suryatal Post Views: 746 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation निवडणूका संपताच नरेंद्र मोदींचे शब्द बदलले ट्रंप की उलझन, मिडिल ईस्ट की आग और दुनिया की बदलती राजनीति