तमिलनाडु वर्तमान में एक अभूतपूर्व राजनैतिक और संवैधानिक संकट के दौर से गुजर रहा है। इस संकट का केंद्र बिंदु राज्य का राजभवन है, जिसे वर्तमान राज्यपाल ने ‘लोक भवन’ का नया नाम दिया है। यह विवाद तब गहरा गया जब हालिया चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तमिलनाडु विक्ट्री पार्टी (TVK) के प्रमुख विजय को सरकार बनाने का न्योता देने से राज्यपाल ने इनकार कर दिया। यह स्थिति न केवल तमिलनाडु की राजनीति बल्कि भारतीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे (Federal Structure) पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। विवाद की जड़: बहुमत का परीक्षण कहाँ? इस पूरे संकट का मुख्य कारण राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर द्वारा रखी गई शर्त है। राज्यपाल ने स्पष्ट किया है कि जब तक विजय 118 विधायकों की संख्या भौतिक रूप से (Physically) उनके सामने साबित नहीं कर देते, तब तक वे उन्हें सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं देंगे। स्रोतों के अनुसार, यह मांग सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का उल्लंघन मानी जा रही है। विशेष रूप से 11 मार्च 1994 के एस.आर. बोम्मई मामले का जिक्र किया गया है, जिसमें नौ जजों की संवैधानिक बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा था कि किसी भी दल के बहुमत का फैसला राजभवन की चारदीवारी के भीतर नहीं, बल्कि सदन के पटल (Floor of the House) पर होना चाहिए। विशेषज्ञों का तर्क है कि राज्यपाल स्वयं को संविधान से ऊपर रख रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के ‘माइलस्टोन’ फैसलों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। विजय और उनके समर्थकों का पक्ष TVK प्रमुख विजय ने राज्यपाल से दो बार मुलाकात की है, लेकिन दोनों ही बार उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। विजय की पार्टी 108 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है और उन्हें कांग्रेस के 5 विधायकों का भी समर्थन प्राप्त है, जिससे उनकी संख्या 113 तक पहुँच जाती है। इसके अलावा, डीएमके (DMK), सीपीआई (CPI), सीपीएम (CPM), आईयूएमएल (IUML) और वीसीके (VCK) जैसी पार्टियों ने भी विजय को मुख्यमंत्री बनाने और जनमत का सम्मान करने का समर्थन किया है। विजय के कानूनी सलाहकारों और समर्थकों का मानना है कि एक अल्पमत सरकार (Hung Assembly) की स्थिति में, राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व है कि वे सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें और उन्हें सदन में बहुमत साबित करने के लिए समय दें। राज्यपाल द्वारा की जा रही देरी को अनावश्यक भ्रम पैदा करने वाला बताया जा रहा है। राजनैतिक विरोधाभास और दोगलापन स्रोतों में मौजूदा स्थिति की तुलना 2018 के कर्नाटक चुनाव से की गई है। उस समय कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला ने 224 सीटों में से केवल 104 सीटें जीतने वाली सबसे बड़ी पार्टी (बीजेपी) को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था, जबकि कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन के पास 117 सीटों का स्पष्ट बहुमत था। तब राज्यपाल ने तर्क दिया था कि सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना उनका कर्तव्य है। परंतु, तमिलनाडु के मामले में, जहाँ विपक्षी दल भी सबसे बड़ी पार्टी के समर्थन में खड़े हैं, राज्यपाल उसी सिद्धांत को लागू नहीं कर रहे हैं। इस विरोधाभास को स्रोतों में दोगलापन और लोकतंत्र का अपमान कहा गया है。 स्टालिन का अप्रत्याशित समर्थन तमिलनाडु की राजनीति में एक दुर्लभ दृश्य देखने को मिला है जब एम.के. स्टालिन, जिन्हें हराकर विजय सत्ता के करीब पहुँचे हैं, स्वयं विजय के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। स्टालिन और उनके गठबंधन (डीएमके, एमएनएम, वीसीके) ने कहा है कि राज्यपाल का यह कदम जनदेश का अपमान है। स्टालिन का यह रुख भारतीय राजनीति में नामुमकिन के करीब माना जा रहा है, जहाँ एक हारा हुआ मुख्यमंत्री अपने प्रतिद्वंद्वी को सत्ता सौंपने की वकालत कर रहा है ताकि लोकतांत्रिक परंपराएं सुरक्षित रहें। केंद्र सरकार और राज्यपाल की भूमिका पर सवाल आरोप लगाए जा रहे हैं कि राज्यपाल स्वतंत्र रूप से कार्य करने के बजाय दिल्ली में बैठे अपने आकाओं के इशारों पर काम कर रहे हैं। राज्यपाल का अटॉर्नी जनरल से सलाह लेना और मुख्य सचिव को बुलाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वे राज्य में राष्ट्रपति शासन या किसी अंतरिम प्रशासन (Interim Administration) को लागू करने की तैयारी कर रहे हैं। स्रोतों का दावा है कि यह सब विजय की पार्टी को तोड़ने और विपक्षी गठबंधन को कमजोर करने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है। यह आशंका जताई गई है कि यदि तमिलनाडु में इस तरह से लोकतंत्र की हत्या की जाती है, तो राज्य में हिंसा और अशांति फैल सकती है, जैसी स्थिति वर्तमान में बंगाल या मणिपुर में देखी जा रही है। कानूनी और सामाजिक प्रतिक्रिया राज्यपाल की हठधर्मिता के खिलाफ तमिलनाडु में भारी जनाक्रोश है। राजभवन (लोक भवन) को घेरने का ऐलान किया गया है और भारी भीड़ वहां जुटने लगी है। छात्र कांग्रेस (NSUI) और यूथ कांग्रेस ने भी विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है। कानूनी विशेषज्ञों, जैसे कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी का हवाला देते हुए कहा गया है कि राज्यपाल के पास शपथ से पहले बहुमत साबित करने की शर्त रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यदि विजय को शपथ नहीं दिलाई जाती है, तो यह माना जाएगा कि राज्यपाल संविधान के रक्षक के बजाय भक्षक बन गए हैं। निष्कर्ष: लोकतंत्र का भविष्य तमिलनाडु का यह संकट केवल एक मुख्यमंत्री की नियुक्ति का नहीं है, बल्कि यह इस बात का परीक्षण है कि क्या भारत में संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश प्रभावी हैं या फिर राजनैतिक हितों के लिए उनका इस्तेमाल किया जाएगा। स्रोतों के अनुसार, न्यायपालिका की चुप्पी भी चिंता का विषय है। यदि राज्यपाल अपनी जिद पर अड़े रहते हैं और निर्वाचित प्रतिनिधि को सरकार बनाने का मौका नहीं देते, तो यह संघीय ढांचे को नष्ट करने और देश को अस्थिरता की ओर ले जाने वाला कदम साबित होगा। अंततः, तमिलनाडु की जनता का जनादेश और सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या ही इस संवैधानिक गतिरोध का समाधान कर सकती है। जैसा कि स्रोतों में कहा गया है, “संविधान की कस्टोडियन अब सरकार की गोद में बैठी दिख रही है,” जो लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है। Kanthak Suryatal Post Views: 744 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation ममता बॅनर्जी यांनी आपल्या भांडवलदार मित्रांपासून दूर राहून देशाच्या हितासाठी राहुल गांधींना साथ दिली पाहिजे – राजू परुळेकर पश्चिम बंगालमधील निवडणूक-उत्तर हिंसाचार: लोकशाहीची पायमल्ली आणि जंगलराजचा धोका;ममता बॅनर्जीला फसवण्याचा डाव