पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों के बाद भड़की हिंसा केवल दो राजनीतिक दलों के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक ढांचे और सामाजिक ताने-बाने में गहरी पैठ बना चुकी नफरत की राजनीति का एक भयावह चेहरा है। स्रोतों के अनुसार, ४ मई के बाद से राज्य में हिंसा का जो दौर शुरू हुआ, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, विशेषकर उन सुरक्षा व्यवस्थाओं पर जिन्हें शांति बनाए रखने के लिए तैनात किया गया था। सुरक्षा बलों की उपस्थिति और जवाबदेही का प्रश्न इस पूरी घटना का सबसे विचलित करने वाला पहलू यह है कि बंगाल में ढाई लाख केंद्रीय अर्धसैनिक बल तैनात थे, फिर भी हिंसा को खुली छूट मिली। स्रोत यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि इन जवानों की तैनाती हिंसा रोकने के लिए की गई थी, तो इनके प्रमुखों की जवाबदेही कौन तय करेगा?। जब प्रशासन और पुलिस की नाक के नीचे लोग सड़कों पर मारे जा रहे हों और दफ्तर जलाए जा रहे हों, तो यह स्पष्ट होता है कि जवाबदेही का तंत्र पूरी तरह से विफल हो चुका है। हिंसा का स्वरूप: नफरत का विस्तार बंगाल की वर्तमान हिंसा को केवल अतीत की राजनीति की निरंतरता के रूप में देखना गलत होगा। स्रोत स्पष्ट करते हैं कि यह हिंसा पिछले एक दशक की नफरती और हिंसक राजनीति का एक्सटेंशन है। इसमें हिंसा का एक अजीब पैटर्न भी देखने को मिला है, जहाँ राजनीतिक पहचानों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ लोग भाजपा का झंडा लेकर अपनी ही पार्टी के दफ्तरों पर हमला कर रहे हैं ताकि प्रतिद्वंद्वी दल को बदनाम किया जा सके। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने यहाँ तक कहा कि यदि उनकी पार्टी का कोई कार्यकर्ता हिंसा में शामिल पाया गया, तो उसे पार्टी से निकाल दिया जाएगा। दूसरी ओर, ममता बनर्जी का आरोप है कि भाजपा अपने गुंडों के साथ टीएमसी कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न कर रही है और उनके दफ्तरों पर कब्जा कर रही है। हिंसा के इस खेल में राजनीतिक दल एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं, लेकिन धरातल पर आम कार्यकर्ता और नागरिक अपनी जान गंवा रहे हैं। हिंसा के शिकार और मानवीय त्रासदी अखबारों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हिंसा में दोनों पक्षों के लोग मारे गए हैं। हावड़ा में भाजपा कार्यकर्ता जाधव बर की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, जबकि टीएमसी के पोलिंग एजेंट विश्वजीत पटनायक को भीड़ ने दौड़ा-दौड़ा कर मार डाला। इसके अलावा, वीरभूम में आबिर शेख और न्यू टाउन में मधु मंडल जैसे कार्यकर्ताओं की मौत की खबरें भी सामने आई हैं। हिंसा का यह स्वरूप केवल हत्याओं तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल हुए हैं जिनमें हिंसक अभिव्यक्ति का घिनौना रूप दिखता है। कुछ वीडियो में पुरुषों और महिलाओं को ममता बनर्जी की तरह साड़ी पहनाकर, उनके गले में रस्सी डालकर खींचा जा रहा है और उनके साथ हिंसा का अभिनय किया जा रहा है। यह न केवल राजनीतिक विरोध है, बल्कि एक गहरी कुंठा और अमानवीयता का प्रदर्शन है। बुलडोजर संस्कृति और भीड़ की मानसिकता 2014 के बाद से देश में भीड़ की हिंसा (Mob Violence) का एक नया चलन शुरू हुआ है, जिसका विस्तार अब बंगाल तक पहुँच गया है। स्रोत बताते हैं कि कैसे गौ-रक्षा या गौ-मांस के झूठे आरोपों में जुनैद, अखलाक, कासिम और साबिर मलिक जैसे लोगों की हत्याएं कर दी गईं। इसी मानसिकता का एक नया प्रतीक बुलडोजर बन गया है। बंगाल में जेसीबी मशीनों को रैलियों में ले जाया जा रहा है, जो शक्ति के प्रदर्शन और डराने-धमकाने का माध्यम बन गई हैं। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर जस्टिस के खिलाफ कड़े निर्देश दिए हैं और इसे असंवैधानिक बताया है, लेकिन भीड़ के मन में कानून का कोई खौफ नहीं दिखता। लोग यह मान चुके हैं कि यदि उनके पास राजनीतिक सत्ता का समर्थन है, तो वे सड़क पर ही फैसला कर सकते हैं। समाज की सामूहिक कुंठा और डिजिटल नफरत स्रोत एक बहुत ही कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: हिंसा करने वाली भीड़ के पीछे वह पढ़ा-लिखा समाज भी खड़ा है जो अपने घरों में सुरक्षित बैठकर सोशल मीडिया पर इस हिंसा का समर्थन करता है। ये वे लोग हैं जो अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए विदेश भेजते हैं, लेकिन दूसरों के बच्चों को नफरत की आग में झोंकने के लिए WhatsApp पर नफरत फैलाते हैं। भीड़ की यह मानसिकता दिखाती है कि लोगों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों की जगह हिंसा की चाहत घर कर गई है। लोग अस्पतालों में डॉक्टरों या स्कूलों में अच्छे शिक्षकों की जगह सड़कों पर लाठियां और बुलडोजर चाहते हैं ताकि वे किसी कमजोर या अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति को निशाना बना सकें। निष्कर्ष: लोकतंत्र के लिए चेतावनी बंगाल की हिंसा केवल एक राज्य की कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। जब पुलिस भीड़ के आगे बेबस नजर आए या किसी खास राजनीतिक दल के लिए शिष्टाचार दिखाने लगे, तो न्याय की उम्मीद खत्म होने लगती है। जीत की खुशी मनाने के बजाय हिंसा का रास्ता चुनना यह दर्शाता है कि हमारे समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह बदले की भावना ने ले ली है। अंत में, स्रोत यह अपील करते हैं कि यदि जनादेश को संवैधानिक और वैध माना जाता है, तो उसकी खुशी शांति और संवैधानिक तरीके से मनाई जानी चाहिए। नफरत और अपराध बोध से बचने के लिए हिंसा का सहारा लेना समाज को गर्त में ले जाएगा। लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब हम हिंसा की संस्कृति को त्याग कर शांति और संवाद का रास्ता चुनें। Kanthak Suryatal Post Views: 614 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation पतीला विद्युत शॉक देऊन खून; पत्नीला जन्मठेपेची शिक्षा राहुल गांधी आणि तामिळनाडूच्या राजकारणातील रिमोट कंट्रोलचा अंत