शिक्षक हमें शिक्षा, ज्ञान, कला और आजीविका का मार्ग बताते हैं,
लेकिन गुरु हमें अज्ञान के घोर अंधकार से निकालकर सत्य, नाम, सेवा और परमात्मा के प्रकाश की ओर ले जाते हैं।
गुरबाणी का उपदेश है—
“गुरु बिनु घोरु अंधारु, गुरु बिनु समझ न आवै॥”
अर्थात् गुरु के बिना जीवन अज्ञान के घोर अंधकार में भटकता रहता है। गुरु ही मनुष्य को सत्य का ज्ञान देकर जीवन को सुखमय, आनंदमय और सफल बनाते हैं।
एक अन्य स्थान पर गुरबाणी फरमाती है—
“बाणी गुरु, गुरु है बाणी, विच बाणी अमृत सारे॥”
अर्थात् गुरु की बाणी ही गुरु का स्वरूप है और उसी बाणी में जीवन को सफल बनाने वाला अमृत समाया हुआ है।
सिक्ख धर्म में किसी मनुष्य को गुरु नहीं माना जाता।
दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को ही सदा-सर्वदा …
[11:57, 29/7/2026] Rajendra Singh Shahoo: सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड का 1956 कानून क्यों नहीं बदला जाना चाहिए?
भाग – 5
गुरु घर की सेवा के लिए केवल पद नहीं, बल्कि गुरमत जीवन आवश्यक है
“मात्र सिर मुँडाना छोड़ देने से कोई मनुष्य खालसा नहीं बनता। केश तथा पाँच ककार उस दिव्य जीवन की पहचान हैं, जिसे अमृतधारी सिक्ख ने गुरु की रहित के अनुसार जीने का संकल्प लिया है।”
गुरु साहिब ने सिक्ख को केवल बाहरी पहचान नहीं दी, बल्कि एक उच्च आदर्श वाला जीवन दिया है — जिसमें रहित, मर्यादा, सेवा, नम्रता, ईमानदारी और संगत के प्रति जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण हैं।
रतन माला में भी उपदेश मिलता है
“घरे केस पाहुल बिना भेखी मूढ़ा सिख। मेरा दरसन नहीं तिसे पापो तयागै भिख॥”
भावार्थ: केवल केश धारण कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। जब तक मनुष्य गुरु की रहित, अमृत और गुरमत के सिद्धांतों के अनुसार जीवन नहीं जीता, तब तक केवल बाहरी स्वरूप मनुष्य को पूर्ण सिक्ख नहीं बनाता।
इसी महान सिद्धांत के आधार पर यह समझना आवश्यक है कि सचखंड श्री हजूर साहिब जैसे सर्वोच्च तख्त का प्रबंधन केवल पद, प्रतिष्ठा या बाहरी पहचान से नहीं, बल्कि गुरु मर्यादा को समझने वाले, संगत की भावना को जानने वाले और सेवा को अपना धर्म मानने वाले व्यक्तियों के हाथों में होना चाहिए।
1956 का कानून केवल प्रशासन नहीं, बल्कि परंपरा और मर्यादा की सुरक्षा है
सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा कानून, 1956 बनाते समय इसका उद्देश्य केवल प्रशासन चलाना नहीं था, बल्कि इस महान तख्त की सदियों पुरानी परंपराओं, धार्मिक मर्यादा और स्थानीय संगत की भावनाओं की रक्षा करना था।
यह कानून किसी व्यक्ति या सरकार के विरोध में नहीं था, बल्कि गुरु घर की धार्मिक पहचान और स्वतंत्र व्यवस्था को सुरक्षित रखने का माध्यम था।
इसलिए ऐसा कोई भी परिवर्तन नहीं होना चाहिए जिससे भविष्य में गुरु घर की मर्यादा, धार्मिक स्वतंत्रता और संगत की भागीदारी कमजोर हो।
गुरु घर की सेवा में पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है
पिछले भागों में हमने देखा कि केवल केशधारी होना ही किसी व्यक्ति को गुरु घर की सेवा के योग्य नहीं बनाता। चाहे वह बड़ा राजनेता हो, उच्च अधिकारी हो या बड़ा उद्योगपति — गुरु घर की सेवा के लिए सबसे पहली आवश्यकता है गुरमत के प्रति समर्पण, ईमानदारी और निष्पक्ष सेवा भावना।
जब वर्तमान चेयरमैन के रूप में एक उच्च शिक्षित प्रशासनिक अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई, तो संगत में एक नई आशा और सकारात्मक सोच पैदा हुई। लोगों को विश्वास था कि एक अनुभवी अधिकारी के नेतृत्व में गुरुद्वारा प्रबंधन में पारदर्शिता, विकास और नई दिशा देखने को मिलेगी।
लेकिन समय के साथ कुछ संगत सदस्यों द्वारा प्रबंधन को लेकर अनेक चिंताएँ और असंतोष व्यक्त किए गए। सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों से यात्री सुविधाओं, प्रशासनिक व्यवस्था, आर्थिक निर्णयों और पारदर्शिता को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं।
संगत की भावना है कि गुरु घर का प्रत्येक निर्णय गुरु घर के हित, संगत के विश्वास और पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए।
गुरुद्वारा संपत्ति और आर्थिक संसाधन संगत की अमानत हैं
सचखंड श्री हजूर साहिब की जमीनें और संपत्तियाँ केवल जमीन या व्यवसायिक साधन नहीं हैं, बल्कि यह गुरु घर की अमूल्य अमानत हैं।
इनका उपयोग हमेशा इस उद्देश्य से होना चाहिए कि
– यात्रियों को बेहतर सुविधाएँ मिलें,
– नए यात्री निवास बनाए जाएँ,
– लंगर व्यवस्था और सेवा कार्य मजबूत हों,
– शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ें,
– गुरु घर की आर्थिक स्थिति मजबूत हो।
संगत में यह भावना व्यक्त की जा रही है कि गुरुद्वारा बोर्ड की कुछ जमीनें, जो भविष्य में मार्केट, यात्री सुविधाओं और गुरु घर की आय बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकती थीं, उन्हें किसी भी व्यक्ति या संस्था को देने से पहले संगत के विश्वास और पारदर्शिता का ध्यान रखा जाना चाहिए।
गुरु घर की संपत्ति का हर निर्णय केवल गुरु घर की आय और सेवा बढ़ाने के उद्देश्य से होना चाहिए, न कि किसी व्यक्तिगत या राजनीतिक हित के लिए।
यात्री सुविधाओं पर विशेष ध्यान आवश्यक है
सचखंड श्री हजूर साहिब में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। उनके लिए यात्री निवास, स्वच्छता, चिकित्सा सुविधा, पार्किंग और अन्य आवश्यक सुविधाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
संगत की ओर से यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि कई यात्री निवासों की स्थिति सुधार की मांग कर रही है। पुराने भवनों की मरम्मत, साफ-सफाई और नई सुविधाओं का निर्माण समय की आवश्यकता है।
दुर्भाग्य से लंबे समय से नए यात्री निवास के निर्माण की दिशा में अपेक्षित गति दिखाई नहीं दे रही है।
पंजाब के मुख्यमंत्री जी ने पंजाब भवन की स्थिति देखकर उसके सुधार के लिए पंजाब सरकार से निधि देने की बात कही, यह एक अच्छी पहल है। इसी प्रकार सचखंड श्री हजूर साहिब में भी यात्री सुविधाओं के लिए ठोस योजना और तेजी से कार्य होना आवश्यक है।
संगत की प्रमुख अपेक्षाएँ
संगत चाहती है कि
✅ लंगर की सामग्री पर लगने वाले जीएसटी के विषय में सरकार से प्रभावी प्रयास किए जाएँ।
✅ गुरुद्वारे के बिजली बिल में उचित रियायत या विशेष धार्मिक संस्थाओं के लिए सुविधा दिलाने का प्रयास हो।
✅ गुरुद्वारा बोर्ड की जमीनों पर लगे आरक्षण और अन्य बाधाओं को दूर करने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ, ताकि गुरु घर की आय बढ़ाने वाले विकास कार्य हो सकें।
✅ नए यात्री निवास और आधुनिक सुविधाओं का निर्माण किया जाए।
✅ शिक्षा, कौशल विकास और स्थानीय सिक्ख समाज के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जाएँ।
भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर संगत की चिंता
गुरु घर संगत की श्रद्धा और दान से चलता है। इसलिए यहाँ किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार की भावना भी संगत के मन को दुख पहुँचाती है।
यदि किसी भी स्तर पर कोई शिकायत या संदेह उत्पन्न होता है तो उसकी निष्पक्ष जांच और पूरी पारदर्शिता आवश्यक है, ताकि गुरु घर की पवित्रता और विश्वास हमेशा कायम रहे।
अब समय है गुरु घर को राजनीति से ऊपर रखने का
सचखंड श्री हजूर साहिब किसी व्यक्ति, पार्टी या सरकार की संपत्ति नहीं है। यह पूरी दुनिया की सिक्ख संगत की आस्था का केंद्र है।
उच्च शिक्षा और प्रशासनिक अनुभव निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन गुरु घर की सेवा में सबसे आवश्यक गुण हैं
नम्रता, संगत से जुड़ाव, गुरु मर्यादा की समझ और निष्पक्ष निर्णय।
महाराष्ट्र सरकार से विनम्र अपील
महाराष्ट्र सरकार से संगत की ओर से विनम्र निवेदन है कि
✅ सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड का 1956 का कानून जैसे थे वैसे ही सुरक्षित रखा जाए।
✅ धारा 11 में किए गए संशोधनों पर पुनर्विचार कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
✅ गुरुद्वारा प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप कम किया जाए।
✅ चेयरमैन और बोर्ड सदस्यों का चयन गुरु घर की मर्यादा, सेवा भावना और संगत के विश्वास को ध्यान में रखकर किया जाए।
क्योंकि सचखंड श्री हजूर साहिब केवल नांदेड या महाराष्ट्र की धरोहर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सिक्ख संगत की आस्था का केंद्र है।
गुरु घर की सेवा सत्ता से नहीं, समर्पण से होती है।
गुरु घर की पहचान कानून बदलने से नहीं, बल्कि मर्यादा निभाने से सुरक्षित रहती है।
जहाँ संगत की भावना का सम्मान होता है, वहीं गुरु की कृपा और आशीर्वाद बना रहता है।
यह सब वे ही कर सकते है जिन के रग रग में पीढी दर पीढी हजुर साहीब की मर्यादा, परंपरा ठुस ठुस कर भरी हो और केवल यह हुजुर साहब के स्थानिक सिक्ख ही इस में परिपुर्ण है
वाहेगुरु जी का खालसा,
वाहेगुरु जी की फतेह।
भुल चुक के लिये क्षमा प्रार्थी हुं
क्रमशः – 6
राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर अबचलनगर नांदेड
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