(यह लेख किसी व्यक्ति विशेष की निंदा या आलोचना के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। यदि किसी की भावना आहत हो तो मैं हाथ जोड़कर क्षमा चाहता हूँ। मेरा उद्देश्य केवल इतिहास में हुई घटनाओं, संगत की भावनाओं और गुरुघर की मर्यादा के संरक्षण के विषय पर समाज में जागरूकता निर्माण करना है।)
पहले भाग में हमने देखा था कि केवल केशधारी सिक्ख होना ही पर्याप्त नहीं है। सचखंड श्री हजूर साहिब जैसे विश्व प्रसिद्ध तख्त के प्रबंधन की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्तियों के हाथों में होनी चाहिए जो गुरमत मर्यादा, इतिहास, परंपरा, सिक्ख धर्म के सिद्धांत और संगत की भावनाओं का दिल से सम्मान करते हों।
आज भाग–2 में हम वर्ष 2000 के बाद की प्रशासकीय व्यवस्था से जुड़े कुछ ऐसे विषयों पर विचार करते हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि केवल प्रशासनिक अनुभव पर्याप्त नहीं होता, बल्कि धार्मिक समझ और ऐतिहासिक संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है।
गुरतागद्दी विकास के नाम पर तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा का प्रशासक नियुक्त किया। प्रबंधन, अनुशासन और कुछ विकास कार्यों में उनके प्रयासों की सराहना की जा सकती है।
लेकिन जब बात गुरुघर की मर्यादा, इतिहास और परंपरा की आती है, तब अनेक ऐसे निर्णय हुए जिनसे संगत के मन में गहरी पीड़ा उत्पन्न हुई।
सबसे बड़ी वेदना उस समय हुई जब शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंघ जी के समय की ऐतिहासिक बारादरी जैसी अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने के बजाय तोड़ दिया गया। इसके साथ ही गेट नंबर 4 का ऐतिहासिक द्वार तथा अन्य कई पुरातन धरोहरें भी सुरक्षित नहीं रह सकीं। विकास आवश्यक है, लेकिन यदि विकास की कीमत इतिहास को मिटाकर चुकानी पड़े, तो वह भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा।
इसी प्रकार, चरण गंगा में चरण धोकर दर्शन के लिए जाने की परंपरा सदियों से संगत की श्रद्धा का हिस्सा रही है। इस व्यवस्था में परिवर्तन का प्रयास हुआ, जिसका स्थानीय संगत ने विरोध किया। यह घटना हमें याद दिलाती है कि गुरुघर की मर्यादा से जुड़े निर्णय केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि संगत की आस्था को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए।
सचखंड श्री हजूर साहिब केवल एक गुरुद्वारा नहीं, बल्कि दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी की अंतिम कर्मभूमि और सम्पूर्ण सिक्ख जगत का सर्वोच्च ऐतिहासिक तख्त है। इसलिए अनेक श्रद्धालुओं की यह भावना रही है कि ऐसे पवित्र स्थान का सर्वोच्च प्रशासक गुरमत मर्यादा का पूर्ण पालन करने वाला तथा अमृतधारी होना चाहिए, ताकि वह इस तख्त की धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक गरिमा को पूरी संवेदनशीलता से समझ सके।
इसी प्रकार यह भी अनुभव किया गया कि आधिकारिक व्यवस्था के अतिरिक्त व्यक्तिगत स्तर पर अलग व्यवस्था विकसित होने से गुरुद्वारा बोर्ड पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ा और पारदर्शिता को लेकर भी प्रश्न उठे। गुरुघर की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जहाँ प्रत्येक निर्णय संगत के विश्वास, पारदर्शिता और जवाबदेही के अनुरूप हो।
एक और महत्वपूर्ण विषय बावली साहिब गुरुद्वारा के निर्माण से जुड़ा है। सिक्ख परंपरा में नए गुरुद्वारों का निर्माण सदियों से कार सेवा के माध्यम से होता आया है। यह केवल निर्माण नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और संगत की भागीदारी का प्रतीक है। यदि निर्माण कार्य ठेकेदारी प्रणाली से कराया जाए और वह वर्षों तक अधूरा रहे, तो स्वाभाविक रूप से संगत के मन में प्रश्न उठते हैं। भविष्य में ऐसे सभी निर्णय गुरमत परंपरा और कार सेवा की भावना के अनुरूप ही लिए जाने चाहिए।
इन सभी घटनाओं से हमें यह सीख मिलती है कि सचखंड श्री हजूर साहिब का प्रबंधन केवल प्रशासनिक विषय नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, इतिहास, मर्यादा और करोड़ों सिक्खों की भावनाओं से जुड़ा विषय है।
हमारी महाराष्ट्र सरकार से विनम्र अपील
हम महाराष्ट्र सरकार से हाथ जोड़कर निवेदन करते हैं कि
– सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड अधिनियम 1956 को यथावत रखा जाए।
– धारा (कलम) 11 में किए गए संशोधन को निरस्त कर गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्यों को लोकतांत्रिक पद्धति से अपना अध्यक्ष स्वयं चुनने का अधिकार पुनः प्रदान किया जाए। इससे बोर्ड की स्वायत्तता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक परंपरा मजबूत होगी।
– गुरुघर की मर्यादा, ऐतिहासिक धरोहर और धार्मिक परंपराओं से जुड़े निर्णय पंज प्यारे साहिबान, विद्वान सिक्ख संस्थाओं, स्थानीय संगत और इतिहास के जानकारों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही लिए जाएँ।
संपूर्ण सिक्ख संगत से भावपूर्ण अपील
यह किसी व्यक्ति, राजनीतिक दल या सरकार के विरोध का विषय नहीं है।
यह गुरुघर की मर्यादा, इतिहास, परंपरा और आने वाली पीढ़ियों की अमानत की रक्षा का विषय है।
आइए, हम सब एकजुट होकर पंज प्यारे साहिबान के निर्णय का सम्मान करें, 1956 के कानून की मूल भावना को बनाए रखने के लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज़ महाराष्ट्र सरकार तक पहुँचाएँ, अपने जनप्रतिनिधियों को लिखें और समाज में जागरूकता फैलाएँ।
यदि आज हम अपनी विरासत की रक्षा के लिए नहीं खड़े हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी कि जब इतिहास बदला जा रहा था, तब हम कहाँ थे?
इतिहास बचाइए…
मर्यादा बचाइए…
गुरुघर की स्वतंत्र परंपरा बचाइए…
यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी सेवा होगी।
क्रमशः… (भाग – 3 में जारी)
राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनर, नांदेड
मो. 7700063999
