देश में एक नया अध्याय शुरू हुआ है त्याग महोत्सव। फर्क सिर्फ इतना है कि त्याग जनता करेगी और महोत्सव सत्ता मनाएगी। क्योंकि त्याग का असली स्वाद वही समझ सकता है जिसने कभी त्याग किया ही न हो, बल्कि सिर्फ भाषणों में उसका वितरण किया हो।
आजकल देश में नैतिकता का मौसम चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा संकट गहरा रहा है, देशहित में त्याग करना होगा। अब कम तेल में खाना बनाइए, कम पेट्रोल जलाइए, कम सफर कीजिए, सोना खरीदने का विचार भी मन से निकाल दीजिए। कुल मिलाकर जीवन ऐसा जी लीजिए जैसे हर दिन राष्ट्रीय उपवास दिवस हो। सुनने में बहुत पवित्र लगता है। इतना पवित्र कि सुनते-सुनते आदमी को लगे कि अभी राष्ट्रगान शुरू हो जाएगा और हम सब सामूहिक तपस्या में बैठ जाएंगे।लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है।
आदर्शों का भाषण और वास्तविकता का रोड शो
प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि एक समय था जब देश संकट में था और लोगों ने सोना दान कर दिया था। संकेत साफ था राष्ट्र पहले, सुविधा बाद में। स्वाभाविक है कि लोगों को तुरंत लाल बहादुर शास्त्री की याद आ गई। वही दौर जब “जय जवान जय किसान” सिर्फ नारा नहीं, जीवन शैली था। शास्त्री जी उपवास रखते थे तो जनता भी उपवास रखती थी। प्रधानमंत्री सादगी अपनाते थे तो देश भी सादगी अपनाता था। उनके पास दो जोड़ी कपड़े थे और पूरे देश के पास भरोसा था।
अब दृश्य बदलिए।
शाम को देश को सादगी का उपदेश दिया गया। रात होते-होते गुजरात की धरती पर 21 गाड़ियों का काफिला निकल पड़ा। पहले ट्रायल, फिर असली शो। जनता को संदेश पेट्रोल बचाइए। प्रशासन को आदेश काफिला चमकाइए।
यह वही क्षण होता है जब नागरिक मन ही मन पूछता है,
त्याग का सिलेंडर जनता के घर क्यों पहुंचता है और वैभव का टैंकर सत्ता के दरवाजे क्यों रुकता है?”
संकट असली है, पर सादगी किसकी?
सच यह है कि संकट काल्पनिक नहीं है। भारत तेल आयात करता है, गैस आयात करता है, खाद आयात करता है, खाने का तेल भी बाहर से लाता है। डॉलर जाएगा तो रुपया कमजोर होगा यह आर्थिक गणित है, राष्ट्रविरोध नहीं।
प्रधानमंत्री कह रहे हैं कम खर्च कीजिए।
लेकिन इसी दौरान सरकारी खर्च पाँच लाख करोड़ से ज्यादा बढ़ जाता है।
जनता से कहा जाता है शादी-ब्याह सादगी से करो।
सरकार कहती है बजट में खर्च बढ़ाना राष्ट्रनिर्माण है।
जनता से कहा जाता है विदेशी यात्रा टालो।
सरकारी प्रतिनिधिमंडल कहते हैं अंतरराष्ट्रीय संवाद जरूरी है।
जनता से कहा जाता है सोना मत खरीदो।
सरकार का प्रचार तंत्र चमकता रहता है जैसे लोकतंत्र नहीं, इवेंट मैनेजमेंट चल रहा हो।
मिनिमम गवर्नमेंट का मैक्सिमम खर्च
2014 में एक वाक्य खूब लोकप्रिय हुआ था Maximum Governance, Minimum Government।
आज स्थिति यह है कि गवर्नमेंट मिनिमम दिखती नहीं और खर्च मैक्सिमम दिखाई देता है।
सरकारी एस्टैब्लिशमेंट का खर्च बढ़ता है, वेतन-भत्ते बढ़ते हैं, ब्याज भुगतान बढ़ता है, लेकिन योजनाओं की जमीन सिकुड़ती जाती है। गरीब कल्याण, रोजगार, ग्रामीण विकास ये सब बजट की भीड़ में ऐसे खो जाते हैं जैसे स्टेशन पर अनाउंसमेंट के बीच किसी छोटे प्लेटफॉर्म की आवाज।
सवाल यह नहीं कि सरकार खर्च क्यों करती है।
सवाल यह है कि जब जनता से त्याग मांगा जाए तो क्या सत्ता भी त्याग का उदाहरण बनेगी?
नैतिक बल की असली परीक्षा
नैतिकता भाषण से नहीं, व्यवहार से पैदा होती है।
जब नेता सादगी अपनाता है तो जनता बिना आदेश के अनुसरण करती है।
महात्मा गांधी का नाम लेने की जरूरत नहीं पड़ती लोग खुद चरखा उठा लेते हैं। शास्त्री जी का आदेश कानून नहीं था, फिर भी पालन हुआ क्योंकि विश्वास था।
आज समस्या विश्वास की है।
जब जनता टीवी पर संकट का संदेश सुनती है और उसी रात चमचमाते काफिले देखती है, तब नैतिकता व्यंग्य बन जाती है।
देश को बताया जाता है कि विदेशी मुद्रा बचाइए क्योंकि तेल महंगा हो रहा है। सही बात है। लेकिन नागरिक यह भी देखता है कि सरकारी तामझाम कम होने के बजाय और विस्तृत होता जा रहा है।
आर्थिक हकीकत बनाम राजनीतिक संदेश
भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक है। सोना आयात बढ़ रहा है। कुकिंग ऑयल का आधे से ज्यादा हिस्सा बाहर से आता है। गैस सप्लाई और वैश्विक तनाव का असर वास्तविक है।
लेकिन जनता को यह भी समझ आता है कि समस्या सिर्फ आयात की नहीं, प्राथमिकताओं की भी है।
यदि संकट इतना गंभीर है तो पहला संदेश सत्ता से आना चाहिए
सरकारी खर्च कम होगा, यात्राएं सीमित होंगी, प्रचार घटेगा, वैभव घटेगा।
क्योंकि त्याग आदेश से नहीं, उदाहरण से फैलता है।
राष्ट्रभक्ति और असहमति
आजकल एक नया समीकरण बन गया है
सवाल पूछो तो राष्ट्रविरोधी।
सहमति दो तो देशभक्त।
लेकिन लोकतंत्र में प्रश्न पूछना देशभक्ति का ही एक रूप है।
जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी यह कहते हैं कि जनता को बताना पड़ रहा है क्या खरीदना है और क्या नहीं, तो यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान की झलक है।
लोग पूछ रहे हैं
क्या यह त्याग राष्ट्र के लिए है या नीतियों की विफलता ढकने के लिए?
सादगी का असली अर्थ
सादगी का मतलब यह नहीं कि जनता कम खाए और सत्ता ज्यादा चमके।
सादगी का मतलब है निर्णय लेने वाला पहले खुद उदाहरण बने।
यदि प्रधानमंत्री कहें
मैं भी सरकारी खर्च कम कर रहा हूँ।
मैं भी अनावश्यक यात्रा रोक रहा हूँ।
मैं भी सादगी अपना रहा हूँ।
तो देश बिना अपील के साथ खड़ा हो जाएगा।
भारत त्याग से भागने वाला देश नहीं है। इस देश ने युद्धों में सोना दिया है, अकाल में भोजन छोड़ा है, आपदा में घर खोकर भी राष्ट्र बचाया है। लेकिन त्याग तब होता है जब नेतृत्व भरोसेमंद लगे।
व्यंग्य का अंतिम प्रश्न
आज स्थिति कुछ ऐसी लगती है जैसे राष्ट्र एक विशाल परिवार हो और परिवार का मुखिया कहे बच्चों, बिजली बचाओ… मैं तब तक पूरे घर की लाइट जलाकर प्रेरणा देता हूँ।जनता मूर्ख नहीं है। वह समझती है कि संकट वास्तविक है। लेकिन वह यह भी देखती है कि त्याग की अपील और सत्ता की जीवनशैली के बीच दूरी कितनी है।
देश को सादगी चाहिए।
सरकार को भी सादगी चाहिए।
नैतिक बल सिर्फ भाषण में नहीं, आचरण में चाहिए।
क्योंकि जब नेता वही करता है जो वह जनता से कहता है, तब राष्ट्र आगे बढ़ता है। और जब नेता अलग रास्ते पर चलता है, तब व्यंग्य इतिहास बन जाता है।
अंत में बस इतना
त्याग जनता कर सकती है, करती आई है, करती रहेगी।
लेकिन नैतिक बल कम से कम सत्ता में तो दिखाई देना चाहिए।
तभी देश भी चलेगा, विश्वास भी चलेगा और लोकतंत्र भी।

