पहले लोग धन, वस्तु या संपत्ति की चोरी करते थे…
लेकिन आज के इस आधुनिक और तकनीकी युग में
एक नई प्रकार की चोरी तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है…
और वह है —
“विचारों और लेखन की चोरी”…!!
आज मोबाईल, इंटरनेट और सोशल मिडिया के माध्यम से
कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक अपने विचार पहुँचाना आसान हो गया है।
कम समय में बहुत सारा ज्ञान, जानकारी और प्रेरणादायी साहित्य लोगों तक पहुँच रहा है।
यह बदलाव निश्चित रूप से अच्छा है…
लेकिन इसी सुविधा का कुछ लोग गलत उपयोग भी करने लगे हैं…!!
बहुत से सज्जन, पढ़े-लिखे और समझदार लोग
भले ही किसी का धन या वस्तु चोरी नहीं करते…
परंतु अनजाने में या कभी-कभी जानबूझकर
दूसरों के लिखे विचार, लेख, कविता या प्रेरणादायी पोस्ट
थोड़ा एडिट करके अपने नाम से प्रसारित करने लगते हैं…
और लोगों की वाहवाही का आनंद लेते हैं…!!
सोचिये…
जिस व्यक्ति ने अपने अनुभव, दर्द, संघर्ष और भावनाओं से
रातों की मेहनत करके कोई लेख लिखा हो…
यदि उसी लेख पर कोई दूसरा अपना नाम लिख दे…
तो यह केवल शब्दों की चोरी नहीं,
बल्कि उस लेखक की भावनाओं, मेहनत और पहचान की भी चोरी होती है…!!
हाँ…
अगर किसी ने एक प्रेरणादायी पंक्ति भेजी हो
और उसमें अपने विचार, अपने अनुभव और अपनी भावना जोड़कर
नया संदेश तैयार किया जाए…
तो वह गलत नहीं कहा जा सकता…
क्योंकि विचारों का आदान-प्रदान समाज को आगे बढ़ाता है…!!
लेकिन किसी दूसरे की पूरी पोस्ट, पूरा लेख या पूरी भावना
अपने नाम से प्रस्तुत करना…
ना तो कोई सच्चा सम्मान दिला सकता है…
और ना ही यह नैतिकता कहलाती है…!!
याद रखिये…
दूसरों के शब्दों से कुछ समय के लिये तालियाँ तो मिल सकती हैं…
लेकिन असली पहचान केवल अपने विचारों और अपने चरित्र से बनती है…!!
जो इंसान स्वयं सोचता है…
स्वयं लिखता है…
और सच्चाई के साथ समाज के सामने आता है…
उसी के शब्द लोगों के दिलों में स्थायी जगह बनाते हैं…!!
इसलिए…
अगर किसी का लेख अच्छा लगे
तो उसका नाम सम्मान के साथ रहने दीजिये…
क्योंकि किसी लेखक के लिये
उसका नाम ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होता है…!!
दूसरों के विचार चुराकर प्रसिद्ध होने से बेहतर है…
थोड़ा कम लिखो…
लेकिन सच लिखो…
अपना लिखो…
दिल से लिखो…!!
क्योंकि…
ईमानदारी से लिखा गया एक छोटा सा वाक्य भी
चोरी किये गये हजार शब्दों से कहीं ज्यादा मूल्यवान होता है…!!
राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड
7700063999
