जीकर दिखाने का समय आ गया है। जो हम हरदम नियमित रुप से जी रहे है
अब इतिहास को याद करने का नहीं,
इतिहास रचने का समय आ गया है।
श्री हजूर साहिब में
श्री गुरु तेग बहादर जी के 350वें शहीदी समागम
तथा
दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज के गुरतागद्दी समारोह
दिनांक 24 व 25 जनवरी को
अत्यंत भव्य, दिव्य और ऐतिहासिक स्वरूप में मनाए जा रहे हैं।
इस पावन अवसर पर
देश-विदेश से लगभग दस लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना है।
यह केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं,
यह सिक्खी के जीवंत सिद्धांतों का वैश्विक मंच है
जहाँ पूरी दुनिया हजूर साहिब की ओर देखकर पूछेगी:
“यही है गुरु महाराज की सिखाई हुई सिक्खी?”
पूरी दुनिया में श्री हजूर साहिब ही एकमात्र ऐसा पवित्र स्थान है,
जहाँ गुरु महाराज की सिक्खी
केवल ग्रंथों में नहीं,
मानव व्यवहार, सेवा और समानता में जीती जाती है।
यही वह धरती है जहाँ
पाँच वक्त नमाज़ पढ़ने वाले मुस्लिम भाई,
समाज में दलित कहे जाने वाले वर्ग,
बौद्ध धर्मावलंबी, वाल्मीकि समाज, मांग समाज,
तथाकथित उच्च या मध्यम वर्ग—ब्राह्मण, मराठा, धनगर, दर्जी, गवली, बंजारा, लुभाना, पद्मशाली समाज,
तेलुगु भाषिक हों या किसी भी धर्म, जाति, भाषा के लोग
सभी को गुरुद्वारे में स्थायी रोजगार,
सम्मानजनक पद,
और पूरा मान-सम्मान दिया जाता है।
यहाँ इंसान को उसकी जाति या धर्म से नहीं,
उसकी इंसानियत से पहचाना जाता है।
यहाँ कर्मचारी को उसकी पोस्ट से नहीं,
उसके मानवीय अस्तित्व के कारण “साहब” और “सर” कहकर संबोधित किया जाता है।
यह कोई नई परंपरा नहीं
यह गुरु महाराज के समय से चली आ रही हजूरी सिक्खी की जीवंत परंपरा है।
इसी भावना के तहत
गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा दुकानों को किराये पर देकर
हजारों परिवारों को बिना किसी भेदभाव के रोज़गार उपलब्ध कराया गया है।
यही है “सरबत दा भला”,
जो यहाँ शब्दों में नहीं,
व्यवस्था और व्यवहार में दिखाई देता है।
सेवा की परंपरा
2008 के गुरतागद्दी समारोह में
सिक्ख नौजवानों, बच्चों और बच्चियों ने
जिस निस्वार्थ भाव से सेवा निभाई
वह आज भी हजूर साहिब की पहचान है।
उससे भी पहले
स्वाध्याय परिवार के पांडुरंग शास्त्री आठवले जी की तीर्थयात्रा के समय
सिक्ख परिवारों ने
गुरु महाराज की प्रेम, सेवा और समानता की शिक्षा को कर्म में उतारकर
पूरी दुनिया को दिखाया था कि
सिक्खी क्या होती है।
आज फिर वही ऐतिहासिक अवसर हमारे सामने खड़ा है।
इतने विशाल समागम में
अब हमारा भी कर्तव्य नहीं,
धार्मिक ज़िम्मेदारी बनती है कि
हम गुरु महाराज की सीख पर स्वयं चलें,
प्रेम, विनम्रता और सेवा से हर श्रद्धालु का स्वागत करें,
सही और सटीक मार्गदर्शन दें,
मधुर वाणी और शालीन व्यवहार रखें,
और अपने आचरण से यह सिद्ध करें कि
सिक्खी केवल पहनावे में नहीं,
बल्कि सोच, व्यवहार और सेवा में होती है।
याद रखें
लाखों आँखें हमें देखेंगी,
लाखों मन हमसे सीखेंगे।
यदि हम इस अवसर को केवल आयोजन समझकर चूक गए,
तो शायद आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा न करें।
यह कोई लेख नहीं,
मेरे मन में उठी हजूरी सिक्खी की पुकार है,
जिसे मैंने गुरु महाराज की संगत के सामने विनम्रता से रखने का प्रयास किया है।
भूल-चूक की क्षमा।
वाहेगुरु जी हम सबको
हजूरी सिक्खी को समझने नहीं,
जीने की शक्ति प्रदान करें।
वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।
राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड
7700063999
